थप्पड़ रिव्यु: समाज की रूढ़िवादी सोच पर एक थप्पड़
Saturday, February 29, 2020 16:44 IST
By Santa Banta News Network
कास्ट: तापसी पन्नू, पवैल गुलाटी, दिया मिर्ज़ा

निर्देशक: अनुभव सिन्हा

रेटिंग: ***1/2

अमृता (तापसी पन्नू) एक ट्रेंड क्लासिकल डांसर थी जो की चाहती तो बहुत आगे जा सकती थी अगर वह अपने सपने चुनती तो. लेकिन बजाये उसके उसने एक परफेक्ट हाउसवाइफ बनना चुना. उसके पति विक्रम (पवैल गुलाटी ) के लिए उसका करियर सबसे ज़रूरी है और अपने सपने पूरे करने के लिए वह कुछ भी करने का जज़्बा रखता है. लेकिन उसके सपने अधूरे रह जाते हैं जब ऑफिस पॉलिटिक्स के कारण उसकी तरक्की में बाधा आ जाती है और इसके गुस्से में अपना आपा खो कर वह एक दिन एक पार्टी में सबके सामने सामने अपनी पत्नी अमृता को एक थप्पड़ मार देता है.

इस घटना से अमृता के मन में गहन विचारों की बाढ़ आ जाती है और वे आज तक लिए अपने सभी फैसलों पर पुनः विचार करने लगती है. वहीँ दूसरी तरफ विक्रम के लिए ये घटना कोई बड़ी बात नहीं है, उसके लिए ये सिर्फ एक थप्पड़ है, छोटी सी बात. इसके बाद अमृता जो कदम उठाती है उससे इन दोनों की जिंदगियों में क्या बदलाव आते हैं यह कहानी है अनुभव सिन्हा की फिल्म की.


थप्पड़ एक गहन फिल्म है जो आपको बाँध कर तो रखती ही है साथ ही ये आपको घरेलु हिंसा से जुड़े कई अलग पहलुओं से मिलवाती और उन पर बात करने को मजबूर करती है. एक शादीशुदा औरत और घरेलु हिंसा के बाद उसकी मानसिक स्थिति को ये फिल्म बखूबी समझने में मदद करती है. हमारे समाज में जहां आज भी औरत को मर्द से कम आंका जाता है खासकर जब वह एक हाउसवाइफ हो वहां ये फिल्म शादी से जुड़े और भी कई अहम पहलुओं को उजागर करती है.

अनुभव सिन्हा का निर्देशन मज़बूत है और फिल्म का स्क्रीनप्ले भी असरदार है. अनुभव सिन्हा भारत जैसे देश में आज के समय में पढ़े - लिखी घरों में भी होने वाली हिंसा या घटनाओं और रूढ़िवादी सोच को परदे पर लाने में कामयाब रहते हैं. एक आदर्श भारतीय पत्नी के रूप में अमृता हर कदम पर विक्रम का साथ देती है और उसके साथ अपनी पूरी ज़िन्दगी सोच चुकी होती है मगर एक थप्पड़ सब कुछ बदल कर रख देता है.

यह फिल्म हमारे समज में आज भी औरतों के हाल को बयान करती है, सवाल उठाती है की पति - पत्नी के बीच क्या सही और किस हद तक सही है. साथी ही अलग - अलग वर्ग की शादीशुदा औरतों के दुःख को भी बयान करती है जो इसे कड़वा मगर खूबसूरत बना देता है.


तपसी पन्नू ने अपने किरदार को बखूबी निभाया है. एक आदर्श पत्नी के रूप में उनका अभिनय परिपूर्ण है और पति के उसे थप्पड़ मारने के बाद उसके मन में जो तूफ़ान आता है उसके जज्बातों को तापसी के शब्दों से ज्यादा उनकी आँखों ने बयान किया है. उनका प्रदर्शन मज़बूत है और उनके एक्सप्रेशन भी काबिल'ए'तारीफ. अमृता का पति विक्रम जिसकी ज़िन्दगी उसकी नौकरी और तरक्की के आस पास ही घूमती है इस किरदार में पवैल गुलाटी काफी अच्छे लगे हैं. उनके किरदार से आपको नफरत हो जाएगी मगर यही बताता है की उनके अभिनय में दम है.

कुमुद मिश्रा अमृता के पिता की भूमिका में सहज दिखे हैं और उनकी और अमृता की केमिस्ट्री बताती है की ज़्यादातर लडकियां मां से ज्यादा पिता के करीब क्यूँ होती हैं. रत्ना पाठक शाह, तनवी आज़मी, और बाकि कलाकारों का प्रदर्शन भी ठीक है. फिल्म का संगीत कहानी के हिसाब से चलता है जो की ठीक है.

कुल मिलाकर थप्पड़ अनुभव सिन्हा की अब तक की सबसे असरदार और बेहतरीन फिल्मों में से एक है. ये फिल्म समाज को आइना दिखाती है. यह फिल्म लोवर क्लास से लेकर अपर क्लास तक होने वाली घरेलु हिंसा को हमारे समक्ष रखती है और यह बताती है की कम हो या ज़्यादा इसे बर्दाश्त न करें. यह हमारे समाज की रूढ़िवादी सोच पर एक थप्पड़ है जिसे ज़रूर देखें.
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