• ऐसी भी होशियारी अच्छी नहीं!

    एक जाट के पड़ोस में बनिया रहता था। बनिया की बीवी गुजर गई। जाट ने सोचा बनिया के पास बहुत पैसे हैं, कुछ आमदनी की जाये।

    जाट छाती पीटता हुआ बनिये के घर जा कर रोते हुए कहने लगा, "मेरा तुम्हारी बीवी से बहुत प्यार था। मैं उसके बिना कैसे जीऊंगा, मुझे भी इसके साथ जला आओ।"

    बनिया हाथ जोड़ कर बोला, "चौधरी दूर- दूर से रिस्तेदार आने वाले हैं। ऐसे मत कर। बहुत बेइज्जती होगी।"

    जाट: ठीक है, एक लाख रुपए दे दे, मैं चुपचाप चला जाऊंगा।

    बनिये ने एक लाख रुपए दे दिए और जाट खुशी खुशी अपने घर चला गया।

    कुछ दिन बाद जाट की घरवाली मर गई। बनिये ने सोचा अब मौका आया है जाट से ब्याज समेत पैसे वापिस लाऊंगा।

    बनिया रोता हुआ जाट के घर जा कर बोला, "मेरा और तुम्हारी घरवाली का बहुत प्यार था। मैं भी इसके साथ मरूंगा, मने भी इसके साथ फूँक आओ।"

    यह सुनकर जाट अपने लड़कों से बोला, "छोरो, थारी माँ कहे तो करै थी कि मेरा एक बनिये तै प्यार है। अच्छा तो ये ही है वो बनिया, फूँक आओ इस ने भी अपनी माँ के साथ।"

    बनिया: चौधरी माफ कर दे। मैं तो मजाक कर रहा था।

    जाट: ठीक है, दो लाख रुपये ले आ, वरना लड़के तनै फूकण नै तैयार खड़े हैं।
  • मैं औऱ मेरी तनहाई!

    मैं औऱ मेरी तनहाई! मैं औऱ मेरी तनहाई,
    अक्सर ये बाते करते हैं;

    ज्यादा पीऊं या कम,
    व्हिस्की पीऊं या रम;

    या फिर तौबा कर लूं,
    कुछ तो अच्छा कर लूं;

    हर सुबह तौबा हो जाती है,
    शाम होते होते फिर याद आती है;

    क्या रखा है जीने में,
    असल मजा है पीने में;

    फिर ढक्कन खुल जाता है,
    फिर नामुराद जिंदगी का मजा आता है;

    रात गहराती है,
    मस्ती आती है;

    कुछ पीता हूं,
    कुछ छलकाता हूं;

    कई बार पीते पीते,
    लुढ़क जाता हूं;

    फिर वही सुबह,
    फिर वही सोच;

    क्या रखा है पीने में,
    ये जीना भी है कोई जीने में;

    सुबह कुछ औऱ,
    शाम को कुछ औऱ;

    मैं औऱ मेरी तनहाई,
    अक्सर ये बाते करते हैं।
  • भलाई का ज़माना नहीं रहा!

    एक बार मार्किट साइड से जा रहे थे तो क्या देखते हैं कि एक सुंदर सी लड़की बेचारी लंगड़ा लँगड़ा के चल रही थी। हमारा दिल पसीज गया। ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते पूछ लिए, "मैडम कोई मदद कर दूँ?"

    वो नहीं मानी और बोली, "मैं ठीक हूँ।"

    हमने सोचा बड़ी खुद्दार है ये तो। फिर हम बोले, "अरे आपको तकलीफ हो रही होगी। आप ऐसा करो मेरी गाड़ी में बैठ जाओ मैं ड्राप कर दूंगा।"

    वो फिर नहीं मानी।

    हम बोले, "चलो बाहों का सहारा दे दूँ, ठीक से चल पाओगी आप।"

    वो बोली, "नो थैंक्स।"

    हमने सोचा पुण्य तो कमा के ही रहेंगे आज। आखिरी बार बोला, "मैडम चलो न मेरी न आपकी, आपको बाहों में उठा लूँ क्या?"

    वो बोली, "आगे दस कदम की दूरी पे मोची की दुकान है। मेरी सैंडल टूट गई है साले। और तू घुसी जा रहा है। बाहों में उठा लूँ, गोद में बिठा लूँ। चल भाग यहाँ से।"
  • समझदारी का फैंसला!

    एक गाँव में एक बूढ़ा बुजुर्ग अकेला रहता था। उसने अपने जीवन में शादी ही नहीं की थी। एक बार किसी युवक ने उस बुजुर्ग से पूछा, "बाबा आपने जीवन भर शादी क्यों नहीं की?"

    बुजुर्ग थोड़ा मुस्कुराया और बोला, "बेटा यह मेरी जवानी की बात है, एक बार मैं एक पार्टी में गया था, वहाँ अनजाने में मेरा पैर आगे खडी एक खूबसूरत युवती के लटकते पल्लू पर पड़ गया। वो सांप की तरह फुफकार मारकर एकदम पीछे पल्टी और शेर की तरह दहाडी, 'ब्लडी हैल, अंधे हो क्या?"

    युवक: फिर क्या हुआ?

    बुजुर्ग: मैं हकलाकर माफी मांगने लगा। फिर उसकी नजर मेरे चेहरे पर पडी और वो बडे़ ही मधुर स्वर में बोली, 'ओह माफ कीजिये, मैंने समझा मेरे पति हैं।' बस जनाब उस दिन के बाद से आज तक मेरा शादी करने का कभी हौंसला ही नहीं हुआ।"