• कुछ खाया पिया कर!

    एक बार छगन अपनी बीवी के साथ ट्रेन में यात्रा कर रहा था।

    छगन की बीवी को सर्दी लगने लगी तो उसने खिड़की बंद करने को कहा। छगन उठकर खिड़की बंद करने की कोशिश करने लगा पर उससे नहीं हुआ।

    तभी सामने की सीट पर बैठा एक बुड्ढा उठा और एक झटके में खिड़की बंद करके छगन से बोला - `बेटा, कुछ खाया-पीया कर !`

    छगन झेंपकर रह गया।

    थोड़ी देर बाद उसकी बीवी फिर बोली - `गर्मी लग रही है ... खिड़की खोल दो न प्लीज !`

    छगन उठकर खिड़की खोलने लगा मगर उससे नहीं खुली।

    बुड्ढा फिर उठा और एक झटके में खिड़की खोलकर बोला - `बेटा, कुछ खाया-पिया कर !`

    अब तो छगन को बहुत शर्म महसूस हुई। बुड्ढे ने दो बार बेइज्जती कर दी थी। वो बदला लेने की सोचने लगा।

    कुछ देर बाद वो उठा और ट्रेन रोकने वाली चैन को पकड़ कर ऐसे हाव-भाव करने लगा जैसे वो चैन को खींचना चाहता हो...

    यह देखकर बुड्ढा फिर उठा और छगन को एक ओर हटाकर एक झटके में जंजीर खींचकर बोला - `बेटा, कुछ खाया-पिया कर !`

    छगन कुछ नहीं बोला बस मुस्कुराकर रह गया।

    जंजीर खींचने से ट्रेन रुक गई और रेलवे पुलिस जंजीर खींचने वाले को तलाशते हुए उसी डब्बे में आ गई और बिना कारण जंजीर खींचने के जुर्म में बुड्ढे को पकड़ लिया।

    जब पुलिस बुड्ढे को ले जाने लगी तो उसने गुस्से से छगन की ओर देखा ...

    छगन मुस्कुराते हुए बोला - `ताऊ, थोडा कम खाया-पिया कर !!!`
  • फिल्म की ऑफर!

    पति -तुम मेरी फिल्म में काम करोगी... ?

    पत्नी - हाँ करूंगी. क्या करना होगा?

    पति -कुछ नहीं बस नदी में जाकर खड़ी हो जाना...

    पत्नी-फिल्म का नाम क्या है??

    पति - गई भैंस पानी में !!!

    पत्नी तिलमिलाकर रह गई. फिर बोली -

    पत्नी -तुम मेरी फिल्म में काम करोगे?

    पति -हाँ, क्या करना है?

    पत्नी -बस घर जाना है फिर वापस यहीं नदी किनारे आना है.ऐसा दो तीन बार करना है...

    पति -ठीक है. पर फिल्म का नाम क्या है?

    पत्नी -धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का !!!
  • व्यापारी और बन्दर!

    एक बार एक टोपियों का व्यापारी जंगल से गुजर रहा था। थकान मिटाने के लिए एक पेड़ के नीचे लेट गया। कुछ देर में ही उसे नींद आ गई। जब उसकी नींद खुली तो उसने देखा कि उसके थैले से सारी टोपियां गायब हैं। घबरा कर उसने यहां-वहां देखा तो उसे पेड़ के ऊपर बहुत सारे बन्दर उसकी टोपियां अपने सिर पर पहने हुए उछल कूद करते दिखे।

    व्यापारी को बंदरों की नकल करने की बात याद आई। तो उसने अपनी टोपी को सिर से निकाला। सारे बंदरों ने भी यही किया, फिर व्यापारी ने अपनी टोपी को जमीन पर फेंक दिया। सारे बंदरों ने भी अपनी-अपनी टोपियां जमीन पर फेक दीं।

    व्यापारी ने सारी टोपियां अपने थैले में भरीं और खुशी-खुशी अपने घर आ गया।

    उसने ये किस्सा अपने पोतों को सुनाया। बहुत साल बाद उसका पोता भी उसी जंगल से टोपियां लेकर गुजरा और एक पेड़ के नीचे सो गया, जब उसकी नींद खुली तो उसने देखा की उसकी सारी टोपियां थैले से गायब हैं और पेड़ पर बहुत सारे बन्दर उसकी टोपियां पहने उछल रहे हैं।

    पहले तो वो घबरा गया तभी उसे दादा की सुनाई कहानी याद आई। उसने मुस्कुराते हुए अपने सिर की टोपी उतारी और उसे जमीन पर फेंक दिया।

    तभी एक बन्दर कूदकर जमीन पर आया और उसकी टोपी उठाकर व्यापारी को थप्पड़ मारते हुए बोला- ओए व्यापारी, तू क्या समझता है, क्या हमारे दादा हमें कहानियां नहीं सुनाते?
  • ये सच नहीं हो सकता

    रामलालजी को किस्से कहानियां सुनने का बड़ा शौक था। वे बुला बुला कर दूसरों के किस्सों को बड़े चाव से सुनते, लेकिन आखिर में सुनाने वाले से एक ही बात कहते - `ये सच नहीं हो सकता ।।!`

    यह सुनते ही कहानी किस्सा सुनाने वाले का पूरा मजा किरकिरा हो जाता।

    धीरे-धीरे गाँववाले उनसे कतराने लगे और उनसे बात करने से बचने लगे। रामलाल जी ठहरे कहानी किस्सों के तलबी ! किस्सा सुने बिना उनका खाना हजम होना बंद हो गया।

    एक दिन उनके घर के दरवाजे से स्कूल का मास्टर उनसे बचने की कोशिश करता हुआ जल्दी जल्दी जा रहा था कि उन्होंने देख लिया। फिर तो रामलाल जी लगे गिडगिडाने - `यार मास्टर, कुछ तो सुनाते जाओ, यहाँ सबने मुझसे बोलना बंद कर दिया है।। ऐसे तो मैं पागल हो जाऊँगा ।।`

    बहुत अनुनय-विनय के बाद मास्टर जी एक शर्त पर किस्सा सुनाने को राजी हुए। मास्टर जी बोले - `मैं तुम्हें एक किस्सा सुनाऊँगा, पर यदि तुमने आखिर में कहा कि 'ये सच नहीं हो सकता' तो तुम्हें मुझे एक हजार रुपये देने होंगे...`

    रामलाल जी ने फ़ौरन शर्त मान ली और उतावले होकर बोले - `नहीं कहूँगा, बिलकुल नहीं कहूँगा ... तुम सुनाओ !`

    मास्टर जी ने किस्सा शुरू किया - `एक बार चीन में एक बड़ा दयालु राजा था। एक दिन वह नगर भ्रमण के लिए निकला। अभी वह पालकी में बैठने ही वाला था कि अचानक एक चिड़िया ने उसकी पोशाक पर बीट कर दी।

    राजा ने मुस्कुरा कर चिड़िया की ओर देखा, फिर अपने नौकर से नई पोशाक घर से मंगवा कर पहनी और गन्दी पोशाक उसके हाथ में देकर पालकी में बैठकर चल दिया।

    थोड़ी दूर जाकर राजा ने अपनी तलवार से पालकी का पर्दा खोलकर देखा कि कहाँ आ गए हैं, तभी चिड़िया फिर उडती हुई आई और तलवार पर बीट करके चली गई।

    राजा ने चिड़िया पर क्रोध न करते हुए फिर नौकर को भेजा और घर से नई तलवार मंगवा ली। गन्दी तलवार नौकर के हाथ में थमाई और आगे बढ़ गया।

    थोड़ी दूर जाकर राजा ने यह देखने के लिए कि कहाँ तक आ गए हैं, अपना सिर पालकी से बाहर निकाला कि तभी चिड़िया फिर उडती हुई आई और राजा के सिर पर बीट करके उड़ गई।

    राजा ने फिर भी चिड़िया पर क्रोध नहीं किया और नौकर को घर से नया सिर लाने भेज दिया। नौकर नया सिर लेकर आया तो उसने तलवार से अपना गन्दा सिर काटकर नौकर को पकड़ा दिया और नया सिर लगा कर आगे चल दिया ......।`

    `अरे यार क्या मुझे बेवकूफ समझ रहे हो ...। ये सच नहीं हो सकता !`, रामलाल जी बोले।

    `बिलकुल सच नहीं हो सकता ...`, मास्टर जी ने विजेता भाव से कहा, `लेकिन रामलालजी, मैंने पहले ही कह दिया था कि आप 'ये सच नहीं हो सकता' नहीं बोलेंगे ...। लाइए शर्त के एक हजार रुपये ...`

    कुनमुनाते हुए रामलाल जी ने मास्टर जी के हाथ में एक हजार रुपये थमाए और उस दिन के बाद फिर कभी किसी से किस्से-कहानी सुनाने के लिए नहीं कहा।