• पत्नी के साथ वक़्त!

    पत्नी: पूरे टाइम मोबाइल में चिपके रहते हो। कम से कम छुट्टी के दिन तो कुछ वक्त मेरे लिए भी निकाल लिया करो।

    पति ने मोबाइल चार्जिंग में लगाया और बोला, "ठीक है बेगम... आज का पूरा दिन तुम्हारे नाम।"

    फिर पति ने घूम कर पूरे घर का जायज़ा लिया और पत्नी से बोला...

    आज खाने में बाई का नहीं बल्कि तुम्हारे हाथ का खाने का मन है।

    देखो घर में हर तरफ जाले लगे हैं इनको साफ कर दो।

    एक कप बढ़िया कॉफ़ी पीने का मन है... ज़रा बना दो।

    इस महीने तुमने कितने की शॉपिंग करी बताओ।

    किटी पार्टी में कितना खर्चा किया।

    मेरी 2-3 शर्ट के बटन टूट गए हैं... उनको ठीक कर दो।

    पत्नी: ये लो जी... आपका मोबाइल फुल चार्ज हो गया।
  • श्लोक का रहस्य!

    एक छात्र ने संस्कृत के शिक्षक से पूछा: गुरुजी, एरिक तम नपाम्रधू। एरिक तम नपाद्यम।।

    इस श्लोक का अर्थ क्या होता है। गुरूजी ने यह श्लोक सभी संस्कृत की पुस्तकों एवं ग्रंथों में खूब ढूंढा, सभी संस्कृत के ज्ञाताओं से भी इस श्लोक का अर्थ पूछा, खूब मेहनत की, रात दिन एक कर दिए लेकिन कहीं भी इसका अर्थ उन्हें नहीं मिला

    लेकिन छात्र उनसे बार बार यही प्रश्न पूछता अब तो गुरुजी छात्र को देखकर अपना रास्ता ही बदल देते थे।

    आखिर हारकर गुरुजी ने छात्र से पूछा कि बताओ यह श्लोक तुमने कहां पढ़ा तब छात्र ने कहा कि उसने यह श्लोक प्रिंसिपल के केबिन के बाहर पढ़ा।

    गुरुजी उसे तत्काल प्रिंसिपल के कैबिन की ओर ले गए वहां छात्र ने उन्हें वह श्लोक कांच के गेट पर लिखा हुआ दिखाया...

    गुरुजी ने छात्र को चप्पल टूटने तक मारा क्योंकि वह कांच की उल्टी साइड से पढ़ रहा था सीधी साइड पर लिखा था:

    धूम्रपान मत करिए।
    मद्यपान मत करिए।।
  • बिना टिकट यात्रा!

    एक पहलवान बस में चढ़ा।

    कंडक्टर: भाई साहब, टिकट!

    पहलवान: हम टिकट नहीं लेते।

    कंडक्टर ने पहलवान की तरफ देखा पर चाहकर भी कुछ न बोल सका।

    ऐसे पहलवान हर रोज चढ़ता, पर टिकट न लेता और यही बात कंडक्टर के दिल पर लग गई।

    ऐसे ही 6 महीने बीत गए और अब कंडक्टर ने भी पहलवान की तरह अपनी बॉडी बना ली।

    अब पहलवान चढ़ा, तो कंडक्टर बोला: टिकट।

    पहलवान: हम टिकट नहीं लेते।

    कंडक्टर (छाती चौड़ी करके): क्यों नहीं लेते?

    पहलवान: क्योंकि हमने पास बनवा रखा है।
  • पुरुष!

    भगवान की ऐसी रचना जो बचपन से ही त्याग और समझौता करना सीखता है।

    वह अपने चॉकलेटस का त्याग करता है अपने दांत बचाने के लिये।

    वह अपने सपनो का त्याग कर माता-पिता की खुशी के लिये उनके अनुसार कैरियर चुनता है।

    वह अपनी पूरी पॉकेट-मनी गर्लफ़्रेंड के लिये गिफ़्ट खरीदने में लगाता है।

    वह अपनी पूरी जवानी बीवी-बच्चों के लिये कमाने में लगाता है।

    वह अपना भविष्य बनाने के लिये लोन लेता है और बाकी की ज़िंदगी उस लोन को चुकाने में लगाता है।

    इन सबके बावज़ूद वह पूरी ज़िंदगी पत्नी, माँ और बॉस से डांट सुनने में लगाता है।

    पूरी ज़िंदगी पत्नी, माँ, बॉस और सास उस पर कंट्रोल करने की कोशिश करते हैं।

    उसकी पूरी ज़िंदगी दूसरों के लिये ही बीतती है।

    इसलिए हमेशा एक पुरुष का सम्मान करें|