• 99 रूपए का फेर!

    एक मंत्री जी भाषण दे रहे थे, उसमें उन्होंने एक कहानी सुनाई!

    एक व्यक्ति के तीन बेटे थे, उसने तीनों को 100-100 रुपये दिए, और ऐसी वस्तु लाने को कहा जिससे कमरा पूरी तरह भर जाये!

    पहला पुत्र 100 रुपये की घास लाया...पर कमरा पूरी तरह नहीं भरा!

    दूसरा पुत्र 100 रुपये की कपास लाया... उससे भी कमरा पूरी तरह नहीं भरा!

    तीसरा पुत्र 1 रुपये की मोमबत्ती लाया... और उससे पूरा कमरा प्रकाशित हो गया!

    आगे उस मंत्री ने कहा... हमारे राहुल जी उस तीसरे पुत्र की तरह हैं! जिस दिन से राजनीति में आये हैं उस दिन से हमारा देश उज्जवल प्रकाश और समृद्धि से जगमगा रहा है...

    तभी पीछे से अन्ना की आवाज़ आई... "बाकी के 99 रुपये कहा है?!"
  • राजनीती का सबक़!

    नेता का बेटा अपने पिता से बोला, "पापा मुझे भी राजनीति में आना हैं, मुझे कुछ टिप्स दो।"

    नेता: बेटा, राजनीति के तीन कठोर नियम होते हैं। चलो सबसे पहले मैं तुम्हें पहला और सबसे अहम नियम समझाता हूँ। यह कहकर नेता जी ने बेटे को छत पर भेज दिया और ख़ुद नीचे आकर खड़ा हो गया।

    नेता जी: छत से नीचे कूद जाओ।

    बेटा: पापा, इतनी ऊंचाई से कुदूंगा तो हाथ पैर टूट जायेंगे।

    नेता जी: बेझिझक कूद जा, मैं हूँ ना, पकड़ लूँगा।

    लड़के ने हिम्मत की और कूद गया, पर नेताजी नीचे से हट गए।

    बेटा धड़ाम से औंधे मुंह गिरा और कराहते हुए बोला, "आपने तो कहा था मुझे पकड़ोगे, फिर हट क्यों गए?"

    नेता जी: ये है पहला सबक, "राजनीति में अपने बाप का भी भरोसा मत करो।"
  • उलझन!

    संबित पात्रा: मोदी जी ने पाकिस्तान पर हमला कर 350 आतंकी मार दिये!

    राजीव तयागी: तो इसमें कौन सी बड़ी बात है, मनमोहन सिंह ने तो पाकिस्तान में घुसकर हमला करके 1 लाख आतंकवादी मार दिये थे।

    संबित पात्रा: हमने तो ना सुना ना देखा!

    राजीव तयागी: क्योंकि वो मोदी की तरह बोलते नहीं थे ना!

    संबित पात्रा: सुबूत क्या है?

    राजीव: ये लो, सेना की कार्यवाही पर अब तुम्हें सुबूत चाहिए, गद्दार, देशद्रोही, पाकिस्तानी हो तुम!

    संबित पात्रा: ये क्या बकवास कर रहे हो?

    राजीव तयागी: शुरू किसने किया?
  • अनोखा दौर!

    चाणक्य से जब ये प्रश्न पूछा गया कि - आप भी तो योग्य हैं, फिर चंद्रगुप्त को राजा क्यों बनाना चाहते हैं?

    चाणक्य ने कहा, "राजा सामाजिक जीवन जीने वाला, पत्नी, पुत्र व पुत्रियों से सम्पन्न, समृद्धशाली व्यक्ति ही होना चाहिये, जिससे वो हर रिश्ते के दुःख को समझ सके और जनता से सही व्यवहार कर सके। इसलिए मैं सन्यासी होने के कारण इस पद हेतु सर्वदा अनुचित हूं। जिस राजा का परिवार ही नहीं वो देश के लोगों की मुश्किलें क्या समझेगा।"

    यही कारण है कि 3 साल से भारत के लोग इसी दौर से गुजर रहे हैं।