• यह कैसी गोली है?

    एक आदमी नाई की दुकान पर दाढ़ी बनवाने गया। जब नाई उसके चेहरे पर ब्रश से बढ़िया क्रीम से उतना ही बढ़िया झाग बना रहा था तो उस आदमी ने अपने चेहरे के पिचके गालों की ओर इशारा करते हुए बोला, "मेरे गालों के इस गड्ढे के कारण दाढ़ी बढ़िया नहीं बन पाती और कुछ बाल छूट जाते हैं।"

    आगे से नाई बोला, "कोई बात नहीं, मेरे पास इसका इलाज है।" उसने पास के दराज में से लकड़ी की एक छोटी से गोली निकाली और उसे देते हुए बोला, "इसे अपने मुँह में मसूड़ों और गाल के बीच रख लो।"

    उस आदमी ने वह गोली मुँह में रख ली जिससे उसका गाल फूल गया और नाई ने उसकी अब तक की सबसे शानदार, सबसे बढ़िया दाढ़ी बनाई।

    गोली उसके मुह में ही फंसी हुई थी, इसलिए उस आदमी ने कठिनाई से बोलते हुए पूछा, "यदि यह गोली गलती से उसके पेट में चली जाए तो?"

    नाई बोला, "कोई बात नहीं। कल लेते आना, जैसे कि बहुत से लोग अब तक लेते आए हैं।"
  • उल्टा-पुल्टा!

    एक बार एक आदमी के घोड़े को कब्ज़ हो गयी तो वह जानवरों के डॉक्टर के पास गया बोला, "डॉक्टर साहब मेरे घोड़े को बहुत ही बुरी तरह से कब्ज़ हो गयी है, जिस वजह से वह ठीक तरह से शौच भी नहीं जा पा रहा है।"

    आदमी की बात सुन कर डॉक्टर ने उसे एक गोली दी और बोला, "यह लो यह पेट साफ़ करने की गोली है, तुम इसे पशुओं को दवाई देने वाली नली में रख कर इसका एक सिरा घोड़े के मुंह में डाल देना और दूसरी तरफ से फूंक मार देना ताकि गोली घोड़े के पेट में चली जाए, और कुछ देर बाद ही तुम देखोगे की घोड़े के शौच एकदम सामान्य हो जायेंगे और उसका पेट भी बिल्कुल साफ़ हो जाएगा।"

    डॉक्टर की बात सुन आदमी दवाई लेकर घर चला गया।

    कुछ देर बाद जब डॉक्टर अपने चिकित्सालय में बैठा था तो आदमी बदहवास सा अपना पेट पकडे डॉक्टर के पास आया, जिसे देख कर डॉक्टर ने उस से पूछा, "अरे भाई क्या हुआ तुम्हारी तो हालत बड़ी ही खराब लग रही है?"

    आदमी: अरे डॉक्टर साहब क्या बताऊँ ये सब घोड़े को दवाई देने के चक्कर में हो गया।

    डॉक्टर: वो कैसे?

    आदमी: अरे डॉक्टर साहब आपने घोड़े को दवाई देने का जो तरीका बताया था, मैंने बिल्कुल वैसा ही किया बस किस्मत ही खराब थी की मेरे से पहले घोड़े ने फूँक मार दी।
  • कुछ आधुनिक कबीर दोहे!

    यदि कबीर जिन्दा होते तो आजकल के दोहे यह होते:

    नयी सदी से मिल रही, दर्द भरी सौगात;
    बेटा कहता बाप से, तेरी क्या औकात;

    पानी आँखों का मरा, मरी शर्म औ लाज;
    कहे बहू अब सास से, घर में मेरा राज;

    भाई भी करता नहीं, भाई पर विश्वास;
    बहन पराई हो गयी, साली खासमखास;

    मंदिर में पूजा करें, घर में करें कलेश;
    बापू तो बोझा लगे, पत्थर लगे गणेश;

    बचे कहाँ अब शेष हैं, दया, धरम, ईमान;
    पत्थर के भगवान हैं, पत्थर दिल इंसान;

    पत्थर के भगवान को, लगते छप्पन भोग;
    मर जाते फुटपाथ पर, भूखे, प्यासे लोग;

    फैला है पाखंड का, अन्धकार सब ओर;
    पापी करते जागरण, मचा-मचा कर शोर;

    पहन मुखौटा धरम का, करते दिन भर पाप;
    भंडारे करते फिरें, घर में भूखा बाप।
  • ज़माना बदल गया!

    एक बार एक बूढी महिला अपने घर के आँगन मैं बैठी स्वेटर बुन रही थी कि तभी अचानक एक आदमी उसकी आँख बचाते हुए उसकी कुर्सी के नीचे बम रख कर भाग गया।

    आदमी को इतनी जल्दी में भागते हुए देख, कुछ लोगों को शक हुआ तो उन्होंने आँगन में झाँक कर देखा तो उनकी नज़र बुढिया की कुर्सी के नीचे रखे बम पर पड़ी।

    यह देख कर उन लोगों ने बुढिया को आगाह करने के लिए घर के बाहर से ही चिल्लाना शुरू कर दिया "बुढिया बम है, बुढिया बम है।"

    यह शोर-गुल सुन कर बुढिया एक पल के लिए चौंकी और फिर शर्माते हुए बोली, " अरे अब वो बात कहाँ, बम तो मैं जवानी में होती थी।"