• क्रोध में मनुष्य अपने मन की बात नहीं कहता, वह केवल दूसरों का दिल दुखाना चाहता है।Upload to Facebook
    क्रोध में मनुष्य अपने मन की बात नहीं कहता, वह केवल दूसरों का दिल दुखाना चाहता है।
    ~ Premchand
  • जिस प्रकार नेत्रहीन के लिए दर्पण बेकार है उसी प्रकार बुद्धिहीन के लिए विद्या बेकार है।Upload to Facebook
    जिस प्रकार नेत्रहीन के लिए दर्पण बेकार है उसी प्रकार बुद्धिहीन के लिए विद्या बेकार है।
    ~ Premchand
  • निराशा सम्भव को असम्भव बना देती है।Upload to Facebook
    निराशा सम्भव को असम्भव बना देती है।
    ~ Premchand
  • धन खोकर अगर हम अपनी आत्मा को पा सकें तो यह कोई महंगा सौदा नहीं।Upload to Facebook
    धन खोकर अगर हम अपनी आत्मा को पा सकें तो यह कोई महंगा सौदा नहीं।
    ~ Premchand
  • आत्म सम्मान की रक्षा, हमारा सबसे पहला धर्म है।Upload to Facebook
    आत्म सम्मान की रक्षा, हमारा सबसे पहला धर्म है।
    ~ Premchand
  • जीवन की दुर्घटनाओं में अक्‍सर बड़े महत्‍व के नैतिक पहलू छिपे होते है​​।Upload to Facebook
    जीवन की दुर्घटनाओं में अक्‍सर बड़े महत्‍व के नैतिक पहलू छिपे होते है​​।
    ~ Premchand
  • अन्याय का साथ देना, अन्याय करने के ही समान है।Upload to Facebook
    अन्याय का साथ देना, अन्याय करने के ही समान है।
    ~ Premchand
  • जीवन का वास्तविक सुख, दूसरों को सुख देने में हैं, उनका सुख लूटने में नहीं।Upload to Facebook
    जीवन का वास्तविक सुख, दूसरों को सुख देने में हैं, उनका सुख लूटने में नहीं।
    ~ Premchand
  • केवल बुद्धि के द्वारा ही मानव का मनुष्यत्व प्रकट होता है।Upload to Facebook
    केवल बुद्धि के द्वारा ही मानव का मनुष्यत्व प्रकट होता है।
    ~ Premchand
  • कर्तव्य कभी आग और पानी की परवाह नहीं करता। कर्तव्य-पालन में ही चित्त की शांति है।Upload to Facebook
    कर्तव्य कभी आग और पानी की परवाह नहीं करता। कर्तव्य-पालन में ही चित्त की शांति है।
    ~ Premchand
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