• क्रोध में मनुष्य अपने मन की बात नहीं कहता, वह केवल दूसरों का दिल दुखाना चाहता है।
    क्रोध में मनुष्य अपने मन की बात नहीं कहता, वह केवल दूसरों का दिल दुखाना चाहता है।
    ~ Premchand
  • जिस प्रकार नेत्रहीन के लिए दर्पण बेकार है उसी प्रकार बुद्धिहीन के लिए विद्या बेकार है।
    जिस प्रकार नेत्रहीन के लिए दर्पण बेकार है उसी प्रकार बुद्धिहीन के लिए विद्या बेकार है।
    ~ Premchand
  • निराशा सम्भव को असम्भव बना देती है।
    निराशा सम्भव को असम्भव बना देती है।
    ~ Premchand
  • धन खोकर अगर हम अपनी आत्मा को पा सकें तो यह कोई महंगा सौदा नहीं।
    धन खोकर अगर हम अपनी आत्मा को पा सकें तो यह कोई महंगा सौदा नहीं।
    ~ Premchand
  • आत्म सम्मान की रक्षा, हमारा सबसे पहला धर्म है।
    आत्म सम्मान की रक्षा, हमारा सबसे पहला धर्म है।
    ~ Premchand
  • जीवन की दुर्घटनाओं में अक्‍सर बड़े महत्‍व के नैतिक पहलू छिपे होते है​​।
    जीवन की दुर्घटनाओं में अक्‍सर बड़े महत्‍व के नैतिक पहलू छिपे होते है​​।
    ~ Premchand
  • अन्याय का साथ देना, अन्याय करने के ही समान है।
    अन्याय का साथ देना, अन्याय करने के ही समान है।
    ~ Premchand
  • जीवन का वास्तविक सुख, दूसरों को सुख देने में हैं, उनका सुख लूटने में नहीं।
    जीवन का वास्तविक सुख, दूसरों को सुख देने में हैं, उनका सुख लूटने में नहीं।
    ~ Premchand
  • केवल बुद्धि के द्वारा ही मानव का मनुष्यत्व प्रकट होता है।
    केवल बुद्धि के द्वारा ही मानव का मनुष्यत्व प्रकट होता है।
    ~ Premchand
  • कर्तव्य कभी आग और पानी की परवाह नहीं करता। कर्तव्य-पालन में ही चित्त की शांति है।
    कर्तव्य कभी आग और पानी की परवाह नहीं करता। कर्तव्य-पालन में ही चित्त की शांति है।
    ~ Premchand