• हमारे अहद की तहज़ीब में क़बा ही नहीं;<br/>
अगर क़बा हो तो बंद-ए-क़बा की बात करें!<br/><br/>
तहज़ीब: सभ्यता<br/>
क़बा: गाउन, चोंगा<br/>
बंद-ए-क़बा: कपड़े की गाँठ
    हमारे अहद की तहज़ीब में क़बा ही नहीं;
    अगर क़बा हो तो बंद-ए-क़बा की बात करें!

    तहज़ीब: सभ्यता
    क़बा: गाउन, चोंगा
    बंद-ए-क़बा: कपड़े की गाँठ
    ~ Sahir Ludhianvi
  • रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल;<br/>
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है!
    रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल;
    जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है!
    ~ Mirza Ghalib
  • दिल टूटने से थोड़ी सी तकलीफ़ तो हुई;<br/>
लेकिन तमाम उम्र को आराम हो गया!
    दिल टूटने से थोड़ी सी तकलीफ़ तो हुई;
    लेकिन तमाम उम्र को आराम हो गया!
  • दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है;<br/>
ये नगर सौ मर्तबा लूटा गया!
    दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है;
    ये नगर सौ मर्तबा लूटा गया!
  • मत बनाओ मुझे फुर्सत के लम्हों का खिलोना;<br/>
मैं भी इंसान हूँ, दर्द मुझे भी होता है!
    मत बनाओ मुझे फुर्सत के लम्हों का खिलोना;
    मैं भी इंसान हूँ, दर्द मुझे भी होता है!
  • अंदाज़ा लगा लेते हैं सब दर्द का मेरे;<br/>
मुस्काते हुए चहरे का नुक़्सान यही हैं;<br/>
बहक जाती हैं तक़दीरें इश्क का मुरीद होकर;<br/>
सिर्फ़ दर्द से रिश्ता कोई शौक़ से नहीं करता।
    अंदाज़ा लगा लेते हैं सब दर्द का मेरे;
    मुस्काते हुए चहरे का नुक़्सान यही हैं;
    बहक जाती हैं तक़दीरें इश्क का मुरीद होकर;
    सिर्फ़ दर्द से रिश्ता कोई शौक़ से नहीं करता।
  • कितनी बेचैनियाँ हैं जेहन में तुझे लेकर;<br/>
मगर तुझ सा सुकून भी कहीं और नहीं!
    कितनी बेचैनियाँ हैं जेहन में तुझे लेकर;
    मगर तुझ सा सुकून भी कहीं और नहीं!
  • कुछ सोच के इक राह-ए-पुर-ख़ार से गुज़रा था;<br/>
काँटे भी न रास आए दामन भी न काम आया!
    कुछ सोच के इक राह-ए-पुर-ख़ार से गुज़रा था;
    काँटे भी न रास आए दामन भी न काम आया!
    ~ Nushur Wahidi
  • है रश्क-ए-इरम वादी-ए-पुर-ख़ार-ए-मोहब्बत;<br/>
शायद उसे सींचा है किसी आबला-पा ने!
    है रश्क-ए-इरम वादी-ए-पुर-ख़ार-ए-मोहब्बत;
    शायद उसे सींचा है किसी आबला-पा ने!
    ~ Iqbal Suhail
  • जुदाइयों के तसव्वुर ही से रुलाऊं उसे;<br/>
मैं झूठ मूठ का किस्सा कोई सुनाऊं उसे!
    जुदाइयों के तसव्वुर ही से रुलाऊं उसे;
    मैं झूठ मूठ का किस्सा कोई सुनाऊं उसे!
    ~ Hamid Iqbal Siddiqui