• मुझ से लाग़र तेरी आँखों में खटकते तो रहे;<br/>
तुझ से नाज़ुक मेरी नज़रों में समाते भी नहीं!
    मुझ से लाग़र तेरी आँखों में खटकते तो रहे;
    तुझ से नाज़ुक मेरी नज़रों में समाते भी नहीं!
    ~ Daagh Dehlvi
  • आज रात भी मुमकिन है सो न पाऊं मैं;<br/>
याद फ़िर आये हैं नींदों को उड़ाने वाले!
    आज रात भी मुमकिन है सो न पाऊं मैं;
    याद फ़िर आये हैं नींदों को उड़ाने वाले!
  • धनक धनक मेरी पोरों के ख़्वाब कर देगा;<br/>
वो लम्स मेरे बदन को गुलाब कर देगा!<br/><br/>

धनक: इन्द्रधनुष<br/>
लम्स: स्पर्श
    धनक धनक मेरी पोरों के ख़्वाब कर देगा;
    वो लम्स मेरे बदन को गुलाब कर देगा!

    धनक: इन्द्रधनुष
    लम्स: स्पर्श
    ~ Parveen Shakir
  • मोहबबत में नहीं है फ़र्क जी ने और मरने का;<br/>
उसी को देख कर जीते हैं जिस क़ाफ़िर पे दम निकले!
    मोहबबत में नहीं है फ़र्क जी ने और मरने का;
    उसी को देख कर जीते हैं जिस क़ाफ़िर पे दम निकले!
    ~ Mirza Ghalib
  • अंदाज़ा लगा लेते हैं सब दर्द का मेरे;<br/>
मुस्काते हुए चहरे का नुक़्सान यही हैं;<br/>
बहक जाती हैं तक़दीरें इश्क का मुरीद होकर;<br/>
सिर्फ़ दर्द से रिश्ता कोई शौक़ से नहीं करता।
    अंदाज़ा लगा लेते हैं सब दर्द का मेरे;
    मुस्काते हुए चहरे का नुक़्सान यही हैं;
    बहक जाती हैं तक़दीरें इश्क का मुरीद होकर;
    सिर्फ़ दर्द से रिश्ता कोई शौक़ से नहीं करता।
  • दम भर मेरे पहलू में उन्हें चैन कहाँ है;<br/>
बैठे कि बहाने से किसी काम से उठे!<br/><br/>

पहलू: पसली, (पास)
    दम भर मेरे पहलू में उन्हें चैन कहाँ है;
    बैठे कि बहाने से किसी काम से उठे!

    पहलू: पसली, (पास)
    ~ Bekhud Dehlvi
  • हर मर्ज़ का इलाज नहीं दवाखाने में;<br/>
कुछ दर्द चले जाते है, परिवार और दोस्तो के साथ मुस्कुराने मे!
    हर मर्ज़ का इलाज नहीं दवाखाने में;
    कुछ दर्द चले जाते है, परिवार और दोस्तो के साथ मुस्कुराने मे!
  • रहने दो मुझको यूँ उलझा हुआ सा अपने सब दोस्तों में;<br/>
सुना है सुलझ जाने से धागे अलग अलग हो जाते हैं!
    रहने दो मुझको यूँ उलझा हुआ सा अपने सब दोस्तों में;
    सुना है सुलझ जाने से धागे अलग अलग हो जाते हैं!
  • हथेली पर रखकर नसीब, तु क्यो अपना मुकद्दर ढूँढ़ता है;<br/>
सीख उस समन्दर से, जो टकराने के लिए पत्थर ढूँढ़ता है!
    हथेली पर रखकर नसीब, तु क्यो अपना मुकद्दर ढूँढ़ता है;
    सीख उस समन्दर से, जो टकराने के लिए पत्थर ढूँढ़ता है!
  • शाम-ए-ग़म कुछ उस निग़ाह-ए-नाज़ की बातें करो;<br/>
बेखुदी बढ़ती चली है, राज़ की बातें करो!<br/><br/>

शाम-ए-ग़म: दर्द भरी शाम<br/>
निग़ाह-ए-नाज़: प्रेमिका की नज़र<br/>
बेखुदी: बेहोशी
    शाम-ए-ग़म कुछ उस निग़ाह-ए-नाज़ की बातें करो;
    बेखुदी बढ़ती चली है, राज़ की बातें करो!

    शाम-ए-ग़म: दर्द भरी शाम
    निग़ाह-ए-नाज़: प्रेमिका की नज़र
    बेखुदी: बेहोशी
    ~ Firaq Gorakhpuri