• उनका तगाफुल उनकी तवज्जो;<br/>
एक दिल, उस पे लाख तहल्के। <br/><br/>
Meaning:<br/>
1.तगाफुल - उपेक्षा, वेबवज्जुही<br/>
2.तवज्जो - विशेष ध्यानUpload to Facebook
    उनका तगाफुल उनकी तवज्जो;
    एक दिल, उस पे लाख तहल्के।

    Meaning:
    1.तगाफुल - उपेक्षा, वेबवज्जुही
    2.तवज्जो - विशेष ध्यान
    ~ Ada Jafri
  • ख़ुद हिजाबों सा ख़ुद जमाल सा था;
    दिल का आलम भी बे-मिसाल सा था;

    अक्स मेरा भी आइनों में नहीं;
    वो भी कैफ़ियत-ए-ख़याल सा था;

    दश्त में सामने था ख़ेमा-ए-गुल;
    दूरियों में अजब कमाल सा था;

    बे-सबब तो नहीं था आँखों में;
    एक मौसम के ला-ज़वाल सा था;

    ख़ौफ़ अँधेरों का डर उजालों से;
    सानेहा था तो हस्ब-ए-हाल सा था;

    क्या क़यामत है हुज्ला-ए-जाँ में;
    उस के होते हुए मलाल सा था;

    जिस की जानिब 'अदा' नज़र न उठी;
    हाल उस का भी मेरे हाल सा था।
    ~ Ada Jafri
  • शायद अभी है राख में कोई...

    शायद अभी है राख में कोई शरार भी;
    क्यों इंतज़ार भी है इज़्तिरार भी;

    ध्यान आ गया है मर्ग-ए-दिल-ए-नामुराद का;
    मिलने को मिल गया है सुकूँ भी क़रार भी;

    अब ढूँढने चले हो मुसाफ़िर को दोस्तो;
    हद-ए-निगाह तक न रहा जब ग़ुबार भी;

    हर आस्ताँ पे नासियाफ़र्सा हैं आज वो;
    जो कल न कर सके थे तेरा इन्तज़ार भी;

    इक राह रुक गई तो ठिठक क्यों गई आद;
    आबाद बस्तियाँ हैं पहाड़ों के पार भी।
    ~ Ada Jafri
  • घर का रस्ता...

    घर का रस्ता भी मिला था शायद;
    राह में संग-ए-वफ़ा था शायद;

    इस क़दर तेज़ हवा के झोंके;
    शाख़ पर फूल खिला था शायद;

    जिस की बातों के फ़साने लिखे;
    उस ने तो कुछ न कहा था शायद;

    लोग बे-मेहर न होते होंगे;
    वहम सा दिल को हुआ था शायद;

    तुझ को भूले तो दुआ तक भूले;
    और वही वक़्त-ए-दुआ था शायद;

    ख़ून-ए-दिल में तो डुबोया था क़लम;
    और फिर कुछ न लिखा था शायद;

    दिल का जो रंग है ये रंग-ए-'अदा'
    पहले आँखों में रचा था शायद।
    ~ Ada Jafri
  • काँटा सा जो चुभा था...

    काँटा सा जो चुभा था वो लौ दे गया है क्या;
    घुलता हुआ लहू में ये ख़ुर्शीद सा है क्या;

    पलकों के बीच सारे उजाले सिमट गए;
    साया न साथ दे ये वही मरहला है क्या;

    मैं आँधियों के पास तलाश-ए-सबा में हूँ;
    तुम मुझ से पूछते हो मेरा हौसला है क्या;

    साग़र हूँ और मौज के हर दाएरे में हूँ;
    साहिल पे कोई नक़्श-ए-क़दम खो गया है क्या;

    सौ सौ तरह लिखा तो सही हर्फ़-ए-आरज़ू;
    इक हर्फ़-ए-आरज़ू ही मेरी इंतिहा है क्या;

    क्या फिर किसी ने क़र्ज़-ए-मुरव्वत अदा किया;
    क्यों आँख बे-सवाल है दिल फिर दुखा है क्या।
    ~ Ada Jafri
  • होंठो पे कभी उनके मेरा नाम ही आये;
    आये तो सही बर-सर-ए-इलज़ाम ही आये;
    हैरान हैं लब-बस्ता हैं दिल-गीर हैं गुंचे;
    खुशबू की जुबानी तेरा पैगाम ही आये।
    ~ Ada Jafri
  • गुलों को छू के शमीम-ए-दुआ नहीं आई;
    खुला हुआ था दरीचा सबा नहीं आई;
    हवा-ए-दश्त अभी तो जुनूँ का मौसम था;
    कहाँ थे हम तेरी आवाज़ नहीं आई।
    ~ Ada Jafri
  • घर का रास्ता भी मिला था शायद...

    घर का रास्ता भी मिला था शायद;
    राह में संग-ए-वफ़ा था शायद;

    इस क़दर तेज़ हवा के झोंके;
    शाख़ पर फूल खिला था शायद;

    जिस की बातों के फ़साने लिखे;
    उस ने तो कुछ न कहा था शायद;

    लोग बे-मेहर न होते होंगे;
    वहम सा दिल को हुआ था शायद;

    तुझ को भूले तो दुआ तक भूले;
    और वही वक़्त-ए-दुआ था शायद;

    ख़ून-ए-दिल में तो डुबोया था क़लम;
    और फिर कुछ न लिखा था शायद;

    दिल का जो रंग है ये रंग-ए-'अदा';
    पहले आँखों में रचा था शायद।
    ~ Ada Jafri
  • बदले तो नहीं हैं वो दिल-ओ-जान के क़रीने;
    आँखों की जलन, दिल की चुभन अब भी वही है।
    ~ Ada Jafri