• ऐ दिल वो आशिक़ी के फ़साने किधर गए,
    वो उम्र क्या हुई वो ज़माने किधर गए;

    वीराँ हैं सहन-ओ-बाग़ बहारों को क्या हुआ,
    वो बुलबुलें कहाँ वो तराने किधर गए;

    है नज्द में सुकूत हवाओं को क्या हुआ,
    लैलाएँ हैं ख़मोश दिवाने किधर गए;

    उजड़े पड़े हैं दश्त ग़ज़ालों पे क्या बनी,
    सूने हैं कोहसार दिवाने किधर गए;
    v वो हिज्र में विसाल की उम्मीद क्या हुई,
    वो रंज में ख़ुशी के बहाने किधर गए;

    दिन रात मैकदे में गुज़रती थी ज़िन्दगी,
    'अख़्तर' वो बेख़ुदी के ज़माने किधर गए।
    ~ Akhtar Sheerani
  • कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता;
    तुम न होते न सही ज़िक्र तुम्हारा होता;

    तर्क-ए-दुनिया का ये दावा है फ़ुज़ूल ऐ ज़ाहिद;
    बार-ए-हस्ती तो ज़रा सर से उतारा होता;

    वो अगर आ न सके मौत ही आई होती;
    हिज्र में कोई तो ग़म-ख़्वार हमारा होता;

    ज़िन्दगी कितनी मुसर्रत से गुज़रती या रब;
    ऐश की तरह अगर ग़म भी गवारा होता;

    अज़मत-ए-गिर्या को कोताह-नज़र क्या समझें;
    अश्क अगर अश्क न होता तो सितारा होता;

    कोई हम-दर्द ज़माने में न पाया 'अख़्तर';
    दिल को हसरत ही रही कोई हमारा होता।
    ~ Akhtar Sheerani
  • वो कभी मिल जाएं तो क्या कीजिये;
    रात दिन सूरत को देखा कीजिये;
    चाँदनी रातों में एक एक फूल को;
    बेखुदी कहती है सज़दा कीजिये।
    ~ Akhtar Sheerani
  • एक दिन की बात हो तो उसे भूल जाएँ हम;
    नाज़िल हों दिल पे रोज़ बलाएँ तो क्या करें।
    ~ Akhtar Sheerani
  • वो कभी मिल जाएँ तो...

    वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए;
    रात दिन सूरत को देखा कीजिए;

    चाँदनी रातों में एक एक फूल को;
    बे-ख़ुदी कहती है सजदा कीजिए;

    जो तमन्ना बर न आए उम्र भर;
    उम्र भर उस की तमन्ना कीजिए;

    इश्क़ की रंगीनियों में डूब कर;
    चाँदनी रातों में रोया कीजिए;

    हम ही उस के इश्क़ के क़ाबिल न थे;
    क्यों किसी ज़ालिम का शिकवा कीजिए;

    कहते हैं 'अख़्तर' वो सुन कर मेरे शेर;
    इस तरह हम को न रुसवा कीजिए।
    ~ Akhtar Sheerani
  • वो कभी मिल जाएँ तो...

    वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए;
    रात दिन सूरत को देखा कीजिए;

    चाँदनी रातों में इक इक फूल को;
    बे-ख़ुदी कहती है सजदा कीजिए;

    जो तमन्ना बर न आए उम्र भर;
    उम्र भर उस की तमन्ना कीजिए;

    इश्क़ की रंगीनियों में डूब कर;
    चाँदनी रातों में रोया कीजिए;

    पूछ बैठे हैं हमारा हाल वो;
    बे-ख़ुदी तू ही बता क्या कीजिए;

    हम ही उस के इश्क़ के क़ाबिल न थे;
    क्यों किसी ज़ालिम का शिकवा कीजिए;

    आप ही ने दर्द-ए-दिल बख़्शा हमें;
    आप ही इस का मुदावा कीजिए;

    कहते हैं 'अख़्तर' वो सुन कर मेरे शेर;
    इस तरह हम को न रुसवा कीजिए।
    ~ Akhtar Sheerani
  • आरज़ू वस्ल की रखती है परेशाँ क्या क्या;
    क्या बताऊँ कि मिरे दिल में हैं अरमाँ क्या क्या;
    ग़म अज़ीज़ों का हसीनों की जुदाई देखी;
    देखें दिखलाए अभी गर्दिश-ए-दौराँ क्या क्या।
    ~ Akhtar Sheerani
  • मौसम भी है, उम्र भी, शराब भी है;
    पहलू में वो रश्के-माहताब भी है;
    दुनिया में अब और चाहिए क्या मुझको;
    साक़ी भी है, साज़ भी है, शराब भी है।
    ~ Akhtar Sheerani
  • ऐ दिल वो आशिक़ी के फ़साने...

    ऐ दिल वो आशिक़ी के फ़साने किधर गए;
    वो उम्र क्या हुई वो ज़माने किधर गए;

    वीरान है सहन ओ बाग़ बहारों को क्या हुआ;
    वो बुलबुलें कहाँ वो तराने किधर गए;

    है नज्द में सुकूत हवाओं को क्या हुआ;
    लैलाएँ हैं ख़मोश दीवाने किधर गए;

    उजड़े पड़े हैं दश्त ग़ज़ालों पे क्या बनी;
    सूने हैं कोह-सार दीवाने किधर गए;

    वो हिज्र में विसल की उम्मीद क्या हुई;
    वो रंज में ख़ुशी के बहाने किधर गए;

    दिन रात मयकदे में गुज़रती थी ज़िन्दगी;
    'अख़्तर' वो बे-ख़ुदी के ज़माने किधर गए।
    ~ Akhtar Sheerani
  • जो भी बुरा भला है...

    जो भी बुरा भला है अल्लाह जानता है;
    बंदे के दिल में क्या है अल्लाह जानता है;

    ये फर्श-ओ-अर्श क्या है अल्लाह जानता है;
    पर्दों में क्या छिपा है अल्लाह जानता है;

    जाकर जहाँ से कोई वापिस नहीं है आता;
    वो कौन सी जगह है अल्लाह जानता है;

    नेक़ी-बदी को अपने कितना ही तू छिपाए;
    अल्लाह को पता है अल्लाह जानता है;

    ये धूप-छाँव देखो ये सुबह-शाम देखो;
    सब क्यों ये हो रहा है अल्लाह जानता है;

    क़िस्मत के नाम को तो सब जानते हैं लेकिन क़िस्मत में क्या लिखा है अल्लाह जानता है।
    ~ Akhtar Sheerani