• अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल;<br/>
लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे!<br/><br/>

पासबान  =  चौकीदार, गार्डUpload to Facebook
    अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल;
    लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे!

    पासबान = चौकीदार, गार्ड
    ~ Allama Iqbal
  • सख्तियां करता हूँ दिल पर गैर से गाफिल हूँ मैं;<br/>
हाय क्या अच्छी कही जालिम हूँ, जाहिल हूँ मैं!<br/><br/>
Meaning:<br/>
गाफिल - अनजानUpload to Facebook
    सख्तियां करता हूँ दिल पर गैर से गाफिल हूँ मैं;
    हाय क्या अच्छी कही जालिम हूँ, जाहिल हूँ मैं!

    Meaning:
    गाफिल - अनजान
    ~ Allama Iqbal
  • सख्तियां करता हूं दिल पर गैर से गाफिल हूं मैं;<br/>
हाय क्या अच्छी कही जालिम हूं, जाहिल हूं मैं।<br/><br/>
Meaning:<br/>
गाफिल - अनजानUpload to Facebook
    सख्तियां करता हूं दिल पर गैर से गाफिल हूं मैं;
    हाय क्या अच्छी कही जालिम हूं, जाहिल हूं मैं।

    Meaning:
    गाफिल - अनजान
    ~ Allama Iqbal
  • सितारों से आगे जहां और भी हैं;<br/>
अभी इश्क के इम्तिहां और भी हैं।Upload to Facebook
    सितारों से आगे जहां और भी हैं;
    अभी इश्क के इम्तिहां और भी हैं।
    ~ Allama Iqbal
  • मिटा दे अपनी हस्ती को गर कुछ मर्तबा* चाहिए;<br/>
कि दाना खाक में मिलकर, गुले-गुलजार होता है|<br/><br/>
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मर्तबा - इज्जत, पदUpload to Facebook
    मिटा दे अपनी हस्ती को गर कुछ मर्तबा* चाहिए;
    कि दाना खाक में मिलकर, गुले-गुलजार होता है|

    Meaning:
    मर्तबा - इज्जत, पद
    ~ Allama Iqbal
  • दिल की बस्ती अजीब बस्ती है;<br/>
लूटने वाले को तरसती है।Upload to Facebook
    दिल की बस्ती अजीब बस्ती है;
    लूटने वाले को तरसती है।
    ~ Allama Iqbal
  • ढूंढता रहता हूँ ऐ 'इकबाल' अपने आप को;<br/>
आप ही गोया मुसाफिर, आप ही मंजिल हूँ मैं।Upload to Facebook
    ढूंढता रहता हूँ ऐ 'इकबाल' अपने आप को;
    आप ही गोया मुसाफिर, आप ही मंजिल हूँ मैं।
    ~ Allama Iqbal
  • जफा जो इश्क में होती है वह जफा ही नहीं;<br/>
सितम न हो तो मोहब्बत में कुछ मजा ही नहीं।<br/><br/>

Meaning:<br/>
जफा - जुल्मUpload to Facebook
    जफा जो इश्क में होती है वह जफा ही नहीं;
    सितम न हो तो मोहब्बत में कुछ मजा ही नहीं।

    Meaning:
    जफा - जुल्म
    ~ Allama Iqbal
  • अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल;
    लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे।
    ~ Allama Iqbal
  • न आते हमें इसमें तकरार क्या थी,
    मगर वादा करते हुए आर क्या थी;

    तुम्हारे पयामी ने ख़ुद राज़ खोला,
    ख़ता इसमें बन्दे की सरकार क्या थी;

    भरी बज़्म में अपने आशिक़ को ताड़ा,
    तेरी आँख मस्ती में होशियार क्या थी;

    तअम्मुल तो था उनको आने में क़ासिद,
    मगर ये बता तर्ज़े-इन्कार क्या थी;

    खिंचे ख़ुद-ब-ख़ुद जानिबे-तूर मूसा,
    कशिश तेरी ऐ शौक़े-दीदाए क्या थी;

    कहीं ज़िक्र रहता है इक़बाल तेरा,
    फ़ुसूँ था कोई तेरी गुफ़्तार क्या थी।
    ~ Allama Iqbal