• आप की खातिर से हम करते हैं जब्त-ए-इज्तिराब;<br/>
देखकर बेताब मुझको और घबराते हैं आप।<br/><br/>
Meaning:<br/>
1. जब्त-ए-इज्तिराब - बेचैनी या बेकरारी पर काबू <br/>
2. बेताब - व्याकुल, बेचैनUpload to Facebook
    आप की खातिर से हम करते हैं जब्त-ए-इज्तिराब;
    देखकर बेताब मुझको और घबराते हैं आप।

    Meaning:
    1. जब्त-ए-इज्तिराब - बेचैनी या बेकरारी पर काबू
    2. बेताब - व्याकुल, बेचैन
    ~ Bahadur Shah Zafar
  • उम्र-ए-दराज मॉंग कर लाये थे चार दिन, दो आरजू में कट गये, दो इंतज़ार में;<br/>
कितना है बदनसीब 'जफर', दफ्न के लिये दो गज जमीं भी न मिली कू-ए-यार में।<br/><br/>
Meaning:<br/>
 उम्र-ए-दराज - लंबी, तवील <br/>
 कू-ए-यार - प्रेमिका की गलीUpload to Facebook
    उम्र-ए-दराज मॉंग कर लाये थे चार दिन, दो आरजू में कट गये, दो इंतज़ार में;
    कितना है बदनसीब 'जफर', दफ्न के लिये दो गज जमीं भी न मिली कू-ए-यार में।

    Meaning:
    उम्र-ए-दराज - लंबी, तवील
    कू-ए-यार - प्रेमिका की गली
    ~ Bahadur Shah Zafar
  • क्या कुछ न किया और हैं क्या कुछ नहीं करते;
    कुछ करते हैं ऐसा ब-ख़ुदा कुछ नहीं करते;

    अपने मर्ज़-ए-ग़म का हकीम और कोई है;
    हम और तबीबों की दवा कुछ नहीं करते;

    मालूम नहीं हम से हिजाब उन को है कैसा;
    औरों से तो वो शर्म ओ हया कुछ नहीं करते;

    गो करते हैं ज़ाहिर को सफ़ा अहल-ए-कुदूरत;
    पर दिल को नहीं करते सफ़ा कुछ नहीं करते;

    वो दिल-बरी अब तक मेरी कुछ करते हैं लेकिन;
    तासीर तेरे नाले दिला कुछ नहीं करते;

    करते हैं वो इस तरह 'ज़फ़र' दिल पे जफ़ाएँ;
    ज़ाहिर में ये जानो के जफ़ा कुछ नहीं करते।
    ~ Bahadur Shah Zafar
  • हवा में फिरते हो क्या हिर्स और हवा के लिए;
    ग़ुरूर छोड़ दो ऐ ग़ाफ़िलो ख़ुदा के लिए;

    गिरा दिया है हमें किस ने चाह-ए-उल्फ़त में;
    हम आप डूबे किसी अपने आशना के लिए;

    जहाँ में चाहिए ऐवान ओ क़स्र शाहों को;
    ये एक गुम्बद-ए-गर्दूं है बस गदा के लिए;

    वो आईना है के जिस को है हाजत-ए-सीमाब;
    इक इज़्तिराब है काफ़ी दिल-ए-सफ़ा के लिए;

    तपिश से दिल का हो क्या जाने सीने में क्या हाल;
    जो तेरे तीर का रोज़न न हो हवा के लिए;

    जो हाथ आए 'ज़फ़र' ख़ाक-पा-ए-फ़ख़रूद्दीन;
    तो मैं रखूँ उसे आँखों के तूतया के लिए।
    ~ Bahadur Shah Zafar
  • देख दिल को मेरे ओ काफ़िर-ए-बे-पीर न तोड़;
    घर है अल्लाह का ये इस की तो तामीर न तोड़;

    ग़ुल सदा वादी-ए-वहशत में रखूँगा बरपा;
    ऐ जुनूँ देख मेरे पाँव की ज़ंजीर न तोड़;

    देख टुक ग़ौर से आईना-ए-दिल को मेरे;
    इस में आता है नज़र आलम-ए-तस्वीर न तोड़;

    ताज-ए-ज़र के लिए क्यूँ शमा का सर काटे है;
    रिश्ता-ए-उल्फ़त-ए-परवाना को गुल-गीर न तोड़;

    अपने बिस्मिल से ये कहता था दम-ए-नज़ा वो शोख़;
    था जो कुछ अहद सो ओ आशिक़-ए-दिल-गीर न तोड़;

    सहम कर ऐ 'ज़फ़र' उस शोख़ कमाँ-दार से कह;
    खींच कर देख मेरे सीने से तू तीर न तोड़।
    ~ Bahadur Shah Zafar
  • तू कहीं हो दिल-ए-दीवाना वहाँ पहुँचेगा;
    शमा होगी जहाँ परवाना वहाँ पहुँचेगा।
    ~ Bahadur Shah Zafar
  • लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में;
    किसकी बनी है आलम-ए-ना पैदार में;
    कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें;
    इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दागदार में।
    ~ Bahadur Shah Zafar
  • तुम न आये एक दिन...

    तुम न आये एक दिन का वादा कर दो दिन तलक;
    हम पड़े तड़पा किये दो-दो पहर दो दिन तलक;

    दर्द-ए-दिल अपना सुनाता हूँ कभी जो एक दिन;
    रहता है उस नाज़नीं को दर्द-ए-सर दो दिन तलक;

    देखते हैं ख़्वाब में जिस दिन किस की चश्म-ए-मस्त;
    रहते हैं हम दो जहाँ से बेख़बर दो दिन तलक;

    गर यक़ीं हो ये हमें आयेगा तू दो दिन के बाद;
    तो जियें हम और इस उम्मीद पर दो दिन तलक;

    क्या सबब क्या वास्ता क्या काम था बतलाइये;
    घर से जो निकले न अपने तुम "ज़फ़र" दो दिन तलक।
    ~ Bahadur Shah Zafar
  • क्या कुछ न किया है और क्या कुछ नहीं करते;
    कुछ करते हैं ऐसा ब-खुदा कुछ नहीं करते;
    अपने मर्ज़-ए-गम का हकीम और कोई है;
    हम और तबीबों की दवा कुछ नहीं करते।
    ~ Bahadur Shah Zafar
  • तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें;
    हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया।
    ~ Bahadur Shah Zafar