• कभी मुझको साथ लेके, <br/>
कभी मेरे साथ चल के,<br/>
वह बदल गये अचानक,<br/> 
मेरी ज़िन्दगी बदल कर। Upload to Facebook
    कभी मुझको साथ लेके,
    कभी मेरे साथ चल के,
    वह बदल गये अचानक,
    मेरी ज़िन्दगी बदल कर।
    ~ Ehsaan Danish
  • हुए जिस पे मेहरबां तुम कोई खुशनसीब होगा;<br/>
मेरी हसरतें तो निकली मेरे आँसुओं में ढलकर।Upload to Facebook
    हुए जिस पे मेहरबां तुम कोई खुशनसीब होगा;
    मेरी हसरतें तो निकली मेरे आँसुओं में ढलकर।
    ~ Ehsaan Danish
  • यह उड़ी-उड़ी सी रंगत, ये खुले-खुले से गेसूं;<br/>
तेरी सुबह कह रही है, तेरी रात का फसाना।<br/><br/>
Meaning:<br/>
गेसूं - बाल, केश, ज़ुल्फUpload to Facebook
    यह उड़ी-उड़ी सी रंगत, ये खुले-खुले से गेसूं;
    तेरी सुबह कह रही है, तेरी रात का फसाना।

    Meaning:
    गेसूं - बाल, केश, ज़ुल्फ
    ~ Ehsaan Danish
  • कभी मुझ को साथ लेकर, कभी मेरे साथ चल के;
    वो बदल गए अचानक, मेरी ज़िन्दगी बदल के;

    हुए जिस पे मेहरबाँ, तुम कोई ख़ुशनसीब होगा;
    मेरी हसरतें तो निकलीं, मेरे आँसूओं में ढल के;

    तेरी ज़ुल्फ़-ओ-रुख़ के, क़ुर्बाँ दिल-ए-ज़ार ढूँढता है;
    वही चम्पई उजाले, वही सुरमई धुंधल के;

    कोई फूल बन गया है, कोई चाँद कोई तारा;
    जो चिराग़ बुझ गए हैं, तेरी अंजुमन में जल के;

    मेरे दोस्तो ख़ुदारा, मेरे साथ तुम भी ढूँढो;
    वो यहीं कहीं छुपे हैं, मेरे ग़म का रुख़ बदल के;

    तेरी बेझिझक हँसी से, न किसी का दिल हो मैला;
    ये नगर है आईनों का, यहाँ साँस ले संभल के।
    ~ Ehsaan Danish
  • आज भड़की रग-ए-वहशत तेरे दीवानों की;
    क़िस्मतें जागने वाली हैं बयाबानों की;

    फिर घटाओं में है नक़्क़ारा-ए-वहशत की सदा;
    टोलियाँ बंध के चलीं दश्त को दीवानों की;

    आज क्या सूझ रही है तिरे दीवानों को;
    धज्जियाँ ढूँढते फिरते हैं गरेबानों की;

    रूह-ए-मजनूँ अभी बेताब है सहराओं में;
    ख़ाक बे-वजह नहीं उड़ती बयाबानों की;

    उस ने 'एहसान' कुछ इस नाज़ से मुड़ कर देखा;
    दिल में तस्वीर उतर आई परी-ख़ानों की।
    ~ Ehsaan Danish
  • जब रूख़-ए-हुस्न से नक़ाब उठा;
    बन के हर ज़र्रा आफ़्ताब उठा;

    डूबी जाती है ज़ब्त की कश्ती;
    दिल में तूफ़ान-ए-इजि़्तराब उठा;

    मरने वाले फ़ना भी पर्दा है;
    उठ सके गर तो ये हिजाब उठा;

    शाहिद-ए-मय की ख़ल्वतों में पहुँच;
    पर्दा-ए-नश्शा-ए-शराब उठा;

    हम तो आँखों का नूर खो बैठे;
    उन के चेहरे से क्या नक़ाब उठा;

    होश नक़्स-ए-ख़ुदी है ऐ 'एहसान';
    ला उठा शीशा-ए-शराब उठा।
    ~ Ehsaan Danish
  • नज़र फ़रेब-ए-कज़ा खा गई तो क्या होगा;
    हयात मौत से टकरा गई तो क्या होगा;

    नई सहर के बहुत लोग मुंतज़िर हैं मगर;
    नई सहर भी कजला गई तो क्या होगा;

    न रहनुमाओं की मजलिस में ले चलो मुझको;
    मैं बे-अदब हूँ हँसी आ गई तो क्या होगा;

    ग़म-ए-हयात से बेशक़ है ख़ुदकुशी आसाँ;
    मगर जो मौत भी शर्मा गई तो क्या होगा;

    शबाब-ए-लाला-ओ-गुल को पुकारनेवालों;
    ख़िज़ाँ-सिरिश्त बहार आ गई तो क्या होगा;

    ख़ुशी छीनी है तो ग़म का भी ऐतमाद न कर;
    जो रूह ग़म से भी उकता गई तो क्या होगा।
    ~ Ehsaan Danish
  • रहे जो ज़िंदगी में ज़िंदगी का आसरा हो कर;
    वही निकले सरीर-आरा क़यामत में ख़ुदा हो कर;

    हक़ीक़त-दर-हक़ीक़त बुत-कदे में है न काबे में;
    निगाह-ए-शौक़ धोखे दे रही है रहनुमा हो कर;

    अभी कल तक जवानी के ख़ुमिस्ताँ थे निगाहों में;
    ये दुनिया दो ही दिन में रह गई है क्या से क्या हो कर;

    मेरे सज़्दों की या रब तिश्ना-कामी क्यों नहीं जाती;
    ये क्या बे-ए'तिनाई अपने बंदे से ख़ुदा हो कर;

    बला से कुछ हो हम 'एहसान' अपनी ख़ू न छोड़ेंगे;
    हमेशा बेवफ़ाओं से मिलेंगे बा-वफ़ा हो कर।
    ~ Ehsaan Danish
  • आज भड़की रग-ए-वहशत...

    आज भड़की रग-ए-वहशत तेरे दीवानों की;
    क़िस्मतें जागने वाली हैं बयाबानों की;

    फिर घटाओं में है नक़्क़ारा-ए-वहशत की सदा;
    टोलियाँ बंध के चलीं दश्त को दीवानों की;

    आज क्या सूझ रही है तेरे दीवानों को;
    धज्जियाँ ढूँढते फिरते हैं गरेबानों की;

    रूह-ए-मजनूँ अभी बेताब है सहराओं में;
    ख़ाक बे-वजह नहीं उड़ती बयाबानों की;

    उस ने 'एहसान' कुछ इस नाज़ से मुड़ कर देखा;
    दिल में तस्वीर उतर आई परी-ख़ानों की।
    ~ Ehsaan Danish
  • इश्क़ की दुनिया में इक हंगामा बरपा कर दिया;
    ऐ ख़याल-ए-दोस्त ये क्या हो गया क्या कर दिया;

    ज़र्रे ज़र्रे ने मेरा अफ़्साना सुन कर दाद दी;
    मैंने वहशत में जहाँ को तेरा शैदा कर दिया;

    तूर पर राह-ए-वफ़ा में बो दिए काँटे कलीम;
    इश्क़ की वुसअत को मस्दूद-ए-तक़ाज़ा कर दिया;

    बिस्तर-ए-मशरिक़ से सूरज ने उठाया अपना सर;
    किस ने ये महफ़िल में ज़िक्र-ए-हुस्न-ए-यक्ता कर दिया;

    मुद्दा-ए-दिल कहूँ 'एहसान' किस उम्मीद पर;
    वो जो चाहेंगे करेंगे और जो चाहा कर दिया।
    ~ Ehsaan Danish