• दिल ना-उम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है;<br/>
लंबी है गम की शाम, मगर शाम ही तो है।Upload to Facebook
    दिल ना-उम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है;
    लंबी है गम की शाम, मगर शाम ही तो है।
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • इक तर्जे-तगाफुल है सो वह उनको मुबारक;<br/>
इक अर्जे-तमन्ना है, सो हम करते रहेंगे। <br/><br/>
अर्थ:<br/>
1. तर्जे-तगाफुल - उपेक्षा या बेतवज्जुही की आदत या स्वभाव<br/>
2. अर्जे-तमन्ना - ख्वाहिश या आरजू की अभिव्यक्तिUpload to Facebook
    इक तर्जे-तगाफुल है सो वह उनको मुबारक;
    इक अर्जे-तमन्ना है, सो हम करते रहेंगे।

    अर्थ:
    1. तर्जे-तगाफुल - उपेक्षा या बेतवज्जुही की आदत या स्वभाव
    2. अर्जे-तमन्ना - ख्वाहिश या आरजू की अभिव्यक्ति
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • आते-आते आयेगा उनको ख्याल;<br/>
जाते-जाते बेख्याली जायेगी।<br/><br/>
Meaning:<br/>
बेख्याली - बेखुदी, बेखबरीUpload to Facebook
    आते-आते आयेगा उनको ख्याल;
    जाते-जाते बेख्याली जायेगी।

    Meaning:
    बेख्याली - बेखुदी, बेखबरी
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • कर रहा था गम-ए-जहान का हिसाब;<br/>
आज तुम याद बेहिसाब आये।Upload to Facebook
    कर रहा था गम-ए-जहान का हिसाब;
    आज तुम याद बेहिसाब आये।
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • वो आ रहे हैं वो आते हैं आ रहे होंगे,<br/>
शब-ए-फ़िराक़ ये कह कर गुज़ार दी हम ने।Upload to Facebook
    वो आ रहे हैं वो आते हैं आ रहे होंगे,
    शब-ए-फ़िराक़ ये कह कर गुज़ार दी हम ने।
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं;
    किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं।
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • आए तो यूँ कि जैसे हमेशा थे मेहरबान,<br/>
भूले तो यूँ कि गोया कभी आश्ना न थे।Upload to Facebook
    आए तो यूँ कि जैसे हमेशा थे मेहरबान,
    भूले तो यूँ कि गोया कभी आश्ना न थे।
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है;<br />
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है।Upload to Facebook
    दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है;
    लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है।
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • तेरी सूरत जो दिलनशीं की है;
    आशना शक्ल हर हसीं की है;

    हुस्न से दिल लगा के हस्ती की;
    हर घड़ी हमने आतशीं की है;

    सुबह-ए-गुल हो की शाम-ए-मैख़ाना;
    मदह उस रू-ए-नाज़नीं की है;

    शैख़ से बे-हिरास मिलते हैं;
    हमने तौबा अभी नहीं की है;

    ज़िक्र-ए-दोज़ख़, बयान-ए-हूर-ओ-कुसूर;
    बात गोया यहीं कहीं की है;

    फ़ैज़ औज-ए-ख़याल से हमने;
    आसमां सिन्ध की ज़मीं की है।
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • दिल से हर मामला कर के चले थे साफ़ हम,<br />
कहने में उनके सामने बात बदल गयी।Upload to Facebook
    दिल से हर मामला कर के चले थे साफ़ हम,
    कहने में उनके सामने बात बदल गयी।
    ~ Faiz Ahmad Faiz