• तुझे बाँहों में भर लेने की ख़्वाहिश यूँ उभरती है;<br/>
कि मैं अपनी नज़र में आप रुस्वा हो सा जाता हूँ।<br/><br/>

रुस्वा  =  बदनामUpload to Facebook
    तुझे बाँहों में भर लेने की ख़्वाहिश यूँ उभरती है;
    कि मैं अपनी नज़र में आप रुस्वा हो सा जाता हूँ।

    रुस्वा = बदनाम
    ~ Jaan Nisar Akhtar
  • हर-चंद ऐतबार में धोखे भी हैं मगर;<br/>
ये तो नहीं किसी पे भरोसा किया न जाए!Upload to Facebook
    हर-चंद ऐतबार में धोखे भी हैं मगर;
    ये तो नहीं किसी पे भरोसा किया न जाए!
    ~ Jaan Nisar Akhtar
  • अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें;<br/>
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं।Upload to Facebook
    अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें;
    कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं।
    ~ Jaan Nisar Akhtar
  • अशआर मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं,,
    कुछ शेर फ़क़त उन को सुनाने के लिए हैं।
    ~ Jaan Nisar Akhtar
  • आज तो मिल के भी जैसे न मिले हों तुझ से,<br/>
चौंक उठते थे कभी तेरी मुलाक़ात से हम।Upload to Facebook
    आज तो मिल के भी जैसे न मिले हों तुझ से,
    चौंक उठते थे कभी तेरी मुलाक़ात से हम।
    ~ Jaan Nisar Akhtar
  • तू इस क़दर मुझे...

    तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है;
    तुझे अलग से जो सोचू अजीब लगता है;

    जिसे ना हुस्न से मतलब ना इश्क़ से सरोकार;
    वो शख्स मुझ को बहुत बदनसीब लगता है;

    हदूद-ए-जात से बाहर निकल के देख ज़रा;
    ना कोई गैर, ना कोई रक़ीब लगता है;

    ये दोस्ती, ये मरासिम, ये चाहते ये खुलूस;
    कभी कभी ये सब कुछ अजीब लगता है;

    उफक़ पे दूर चमकता हुआ कोई तारा;
    मुझे चिराग-ए-दयार-ए-हबीब लगता है;

    ना जाने कब कोई तूफान आयेगा यारो;
    बलंद मौज से साहिल क़रीब लगता है।
    ~ Jaan Nisar Akhtar
  • तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है;
    तुझे अलग से जो सोचू अजीब लगता है;

    जिसे ना हुस्न से मतलब ना इश्क़ से सरोकार;
    वो शख्स मुझ को बहुत बदनसीब लगता है;

    हदूद-ए-जात से बाहर निकल के देख ज़रा;
    ना कोई गैर, ना कोई रक़ीब लगता है;

    ये दोस्ती, ये मरासिम, ये चाहते ये खुलूस;
    कभी कभी ये सब कुछ अजीब लगता है;

    उफक़ पे दूर चमकता हुआ कोई तारा;
    मुझे चिराग-ए-दयार-ए-हबीब लगता है;

    ना जाने कब कोई तूफान आयेगा यारो;
    बलंद मौज से साहिल क़रीब लगता है।
    ~ Jaan Nisar Akhtar
  • हर एक रूह में एक ग़म छुपा लगे हैं मुझे;
    ये ज़िन्दगी तो कोई बद-दुआ लगे है मुझे;

    जो आँसू में कभी रात भीग जाती है;
    बहुत क़रीब वो आवाज़-ए-पा लगे है मुझे;

    मैं सो भी जाऊँ तो मेरी बंद आँखों में;
    तमाम रात कोई झाँकता लगे है मुझे;

    मैं जब भी उस के ख़यालों में खो सा जाता हूँ;
    वो ख़ुद भी बात करे तो बुरा लगे है मुझे;

    मैं सोचता था कि लौटूँगा अजनबी की तरह;
    ये मेरा गाँव तो पहचाना सा लगे है मुझे;

    बिखर गया है कुछ इस तरह आदमी का वजूद;
    हर एक फ़र्द कोई सानेहा लगे है मुझे।
    ~ Jaan Nisar Akhtar
  • तू इस क़दर मुझे...

    तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है;
    तुझे अलग से जो सोचू अजीब लगता है;

    जिसे ना हुस्न से मतलब ना इश्क़ से सरोकार;
    वो शख्स मुझ को बहुत बदनसीब लगता है;

    हदूद-ए-जात से बाहर निकल के देख ज़रा;
    ना कोई गैर, ना कोई रक़ीब लगता है;

    ये दोस्ती, ये मरासिम, ये चाहते ये खुलूस;
    कभी कभी ये सब कुछ अजीब लगता है;

    उफक़ पे दूर चमकता हुआ कोई तारा;
    मुझे चिराग-ए-दयार-ए-हबीब लगता है;

    ना जाने कब कोई तूफान आयेगा यारो;
    बलंद मौज से साहिल क़रीब लगता है।
    ~ Jaan Nisar Akhtar
  • ये किसका ढलक गया है आंचल;
    तारों की निगाह झुक गई है;
    ये किस की मचल गई हैं ज़ुल्फ़ें;
    जाती हुई रात रुक गई है।
    ~ Jaan Nisar Akhtar