• तेग़-बाज़ी का शौक़ अपनी जगह;<br/>
आप तो क़त्ल-ए-आम कर रहे हैं!<br/><br/>
Meaning:<br/>
तेग़-बाज़ी  =  तलवार बाज़ी, तलवार चलाना
    तेग़-बाज़ी का शौक़ अपनी जगह;
    आप तो क़त्ल-ए-आम कर रहे हैं!

    Meaning:
    तेग़-बाज़ी = तलवार बाज़ी, तलवार चलाना
    ~ Jon Elia
  • हम हैं मसरूफ़-ए-इंतिज़ाम मगर;<br/>
जाने क्या इंतिज़ाम कर रहे हैं।
    हम हैं मसरूफ़-ए-इंतिज़ाम मगर;
    जाने क्या इंतिज़ाम कर रहे हैं।
    ~ Jon Elia
  • कितने ऐश उड़ाते होंगे कितने इतराते होंगे,
    जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे;

    उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा,
    यूँ ही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे;

    बंद रहे जिन का दरवाज़ा ऐसे घरों की मत पूछो,
    दीवारें गिर जाती होंगी आँगन रह जाते होंगे;

    मेरी साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएंगे,
    यानी मेरे बाद भी यानी साँस लिये जाते होंगे;

    यारो कुछ तो बात बताओ उस की क़यामत बाहों की,
    वो जो सिमटते होंगे इन में वो तो मर जाते होंगे।
    ~ Jon Elia
  • महक उठा है आँगन...

    महक उठा है आँगन इस ख़बर से;
    वो ख़ुशबू लौट आई है सफ़र से;

    जुदाई ने उसे देखा सर-ए-बाम;
    दरीचे पर शफ़क़ के रंग बरसे;

    मैं इस दीवार पर चढ़ तो गया था;
    उतारे कौन अब दीवार पर से;

    गिला है एक गली से शहर-ए-दिल की;
    मैं लड़ता फिर रहा हूँ शहर भर से;

    उसे देखे ज़माने भर का ये चाँद;
    हमारी चाँदनी छाए तो तरसे;

    मेरे मानन गुज़रा कर मेरी जान;
    कभी तू खुद भी अपनी रहगुज़र से।
    ~ Jon Elia
  • तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो;
    जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो;

    तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू;
    औए इतने ही बेमुरव्वत हो;

    तुम हो पहलू में पर क़रार नहीं;
    यानी ऐसा है जैसे फुरक़त हो;

    है मेरी आरज़ू के मेरे सिवा;
    तुम्हें सब शायरों से वहशत हो;

    किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ;
    तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो;

    किस लिए देखते हो आईना;
    तुम तो ख़ुद से भी ख़ूबसूरत हो;

    दास्ताँ ख़त्म होने वाली है;
    तुम मेरी आख़िरी मोहब्बत हो।
    ~ Jon Elia
  • रूह प्यासी...

    रूह प्यासी कहाँ से आती है;
    ये उदासी कहाँ से आती है;

    दिल है शब दो का तो ऐ उम्मीद ;
    तू निदासी कहाँ से आती है;

    शौक में ऐशे वत्ल के हन्गाम;
    नाशिफासी कहाँ से आती है;

    एक ज़िन्दान-ए-बेदिली और शाम;
    ये सबासी कहाँ से आती है;

    तू है पहलू में फिर तेरी खुशबू;
    होके बासी कहाँ से आती है।
    ~ Jon Elia
  • कितने ऐश उड़ाते होंगे कितने इतराते होंगे;
    जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे;

    उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा;
    यूँ ही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे;

    बंद रहे जिन का दरवाज़ा ऐसे घरों की मत पूछो;
    दीवारें गिर जाती होंगी आँगन रह जाते होंगे;

    मेरी साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएंगे;
    यानी मेरे बाद भी यानी साँस लिये जाते होंगे;

    यारो कुछ तो बात बताओ उस की क़यामत बाहों की;
    वो जो सिमटते होंगे इन में वो तो मर जाते होंगे।
    ~ Jon Elia
  • महक उठा है आँगन...

    महक उठा है आँगन इस ख़बर से;
    वो ख़ुशबू लौट आई है सफ़र से;

    जुदाई ने उसे देखा सर-ए-बाम;
    दरीचे पर शफ़क़ के रंग बरसे;

    मैं इस दीवार पर चढ़ तो गया था;
    उतारे कौन अब दीवार पर से;

    गिला है एक गली से शहर-ए-दिल की;
    मैं लड़ता फिर रहा हूँ शहर भर से;

    उसे देखे ज़माने भर का ये चाँद;
    हमारी चाँदनी छाए तो तरसे;

    मेरे मानन गुज़रा कर मेरी जान;
    कभी तू खुद भी अपनी रहगुज़र से।
    ~ Jon Elia
  • तू भी चुप है मैं भी चुप हूँ यह कैसी तन्हाई है;
    तेरे साथ तेरी याद आई, क्या तू सचमुच आई है;

    शायद वो दिन पहला दिन था पलकें बोझल होने का;
    मुझ को देखते ही जब उन की अँगड़ाई शरमाई है;

    उस दिन पहली बार हुआ था मुझ को रफ़ाक़ात का एहसास;
    जब उस के मलबूस की ख़ुश्बू घर पहुँचाने आई है;

    हुस्न से अर्ज़ ए शौक़ न करना हुस्न को ज़ाक पहुँचाना है;
    हम ने अर्ज़ ए शौक़ न कर के हुस्न को ज़ाक पहुँचाई है;

    एक तो इतना हब्स है फिर मैं साँसें रोके बैठा हूँ;
    वीरानी ने झाड़ू दे के घर में धूल उड़ाई है।
    ~ Jon Elia
  • इक हुनर है जो कर गया हूँ मैं;
    सब के दिल से उतर गया हूँ मैं;
    कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँ;
    सुन रहा हूँ कि घिर गया हूँ मैं।
    ~ Jon Elia