• ग़म-ए-हयात ने आवारा कर दिया वर्ना,<br/>
थी आरजू तेरे दर पे सुबह-ओ-शाम करें!<br/><br/>


ग़म-ए-हयात  =  ज़िन्दगी का ग़म
    ग़म-ए-हयात ने आवारा कर दिया वर्ना,
    थी आरजू तेरे दर पे सुबह-ओ-शाम करें!

    ग़म-ए-हयात = ज़िन्दगी का ग़म
    ~ Majrooh Sultanpuri
  • सैर-ए-साहिल कर चुके ऐ मौज-ए-साहिल सिर ना मार;<br/>
तुझ से क्या बहलेंगे तूफानों के बहलाए हुए!
    सैर-ए-साहिल कर चुके ऐ मौज-ए-साहिल सिर ना मार;
    तुझ से क्या बहलेंगे तूफानों के बहलाए हुए!
    ~ Majrooh Sultanpuri
  • बचा लिया मुझे तूफां की मौज ने वर्ना;<br/>
किनारे वाले सफीना मेरा डुबो देते।<br/><br/>
अर्थ:<br/>
सफीना - नाव
    बचा लिया मुझे तूफां की मौज ने वर्ना;
    किनारे वाले सफीना मेरा डुबो देते।

    अर्थ:
    सफीना - नाव
    ~ Majrooh Sultanpuri
  • मैं अकेला ही चला था जानिबे-मंजिल मगर;<br/>
लोग आते गए और कारवां बनता गया।
    मैं अकेला ही चला था जानिबे-मंजिल मगर;
    लोग आते गए और कारवां बनता गया।
    ~ Majrooh Sultanpuri
  • दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें;<br/>
तुमको ना हो ख्याल तो हम क्या जवाब दें।
    दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें;
    तुमको ना हो ख्याल तो हम क्या जवाब दें।
    ~ Majrooh Sultanpuri
  • अलग बैठे थे फिर भी आँख साकी की पड़ी मुझ पर;<br/>
अगर है तिश्नगी कामिल तो पैमाने भी आयेंगे। <br/><br/>

अर्थ:<br/>
तिश्नगी -  प्यास, पिपासा, तृष्णा, लालसा, अभिलाषा, इश्तियाक <br/>
कामिल - पूरा, सम्पूर्ण, मुकम्मल <br/>
पैमाने - शराब का गिलास, पानपात्र
    अलग बैठे थे फिर भी आँख साकी की पड़ी मुझ पर;
    अगर है तिश्नगी कामिल तो पैमाने भी आयेंगे।

    अर्थ:
    तिश्नगी - प्यास, पिपासा, तृष्णा, लालसा, अभिलाषा, इश्तियाक
    कामिल - पूरा, सम्पूर्ण, मुकम्मल
    पैमाने - शराब का गिलास, पानपात्र
    ~ Majrooh Sultanpuri
  • हम को जुनूँ क्या सिखलाते हो हम थे परेशाँ तुमसे ज्यादा,
    चाक किये हैं हमने अज़ीज़ों चार गरेबाँ तुमसे ज्यादा;

    चाक-ए-जिगर मुहताज-ए-रफ़ू है आज तो दामन सिर्फ़ लहू है,
    एक मौसम था हम को रहा है शौक़-ए-बहाराँ तुमसे ज्यादा;

    जाओ तुम अपनी बाम की ख़ातिर सारी लवें शमों की कतर लो,
    ज़ख़्मों के महर-ओ-माह सलामत जश्न-ए-चिराग़ाँ तुमसे ज्यादा;

    ज़ंजीर-ओ-दीवार ही देखी तुमने तो "मजरूह" मगर हम,
    कूचा-कूचा देख रहे हैं आलम-ए-ज़िंदाँ तुमसे ज्यादा।
    ~ Majrooh Sultanpuri
  • डरा के मौज-ओ-तलातुम से हमनशीनों को;
    यही तो हैं जो डुबोया किए सफ़ीनों को;

    शराब हो ही गई है बक़द्रे-पैमाना;
    ब-अ़ज़्मे-तर्क निचोड़ा जो आस्‍तीनों को;

    जमाले-सुबह दिया रू-ए-नौबहार दिया;
    मेरी निग़ाह भी देता ख़ुदा हसीनों को;

    हमारी राह में आए हज़ार मैख़ाने;
    भुला सके न मगर होश के क़रीनों को;

    कभी नज़र भी उठाई न सू-ए-बादा-ए-नाब;
    कभी चढ़ा गए पिघला के आबगीनों को;

    हुए है क़ाफ़िले जुल्मत की वादियों में रवाँ;
    चिराग़े राह किए ख़ूंचका जबीनों को;

    तुझे न माने कोई तुझको इससे क्या 'मजरूह';
    चल अपनी राह, भटकने दे नुक़्ताचीनों को।
    ~ Majrooh Sultanpuri
  • पहले सौ बार...

    पहले सौ बार इधर और उधर देखा है;
    तब कहीं डर के तुम्हें एक नज़र देखा है;

    हम पे हँसती है जो दुनियाँ उसे देखा ही नहीं;
    हम ने उस शोख को अए दीदा-ए-तर देखा है;

    आज इस एक नज़र पर मुझे मर जाने दो;
    उस ने लोगों बड़ी मुश्किल से इधर देखा है;

    क्या ग़लत है जो मैं दीवाना हुआ, सच कहना;
    मेरे महबूब को तुम ने भी अगर देखा है।
    ~ Majrooh Sultanpuri
  • अब सोचते हैं लाएँगे तुझ सा कहाँ से हम;
    उठने को उठ तो आए तेरे आस्ताँ से हम।
    ~ Majrooh Sultanpuri