• हम जानते तो इश्क़ न करते किसी के साथ;
    ले जाते दिल को ख़ाक में इस आरज़ू के साथ।
    ~ Mir Taqi Mir
  • इस अहद में इलाही...

    इस अहद में इलाही मोहब्बत को क्या हुआ;
    छोड़ा वफ़ा को उन्ने मुरव्वत को क्या हुआ;

    उम्मीदवार वादा-ए-दीदार मर चले;
    आते ही आते यारों क़यामत को क्या हुआ;

    बख्शिश ने मुझ को अब्र-ए-करम की किया ख़िजल;
    ए चश्म-ए-जोश अश्क-ए-नदामत को क्या हुआ;

    जाता है यार तेग़ बकफ़ ग़ैर की तरफ़;
    ए कुश्ता-ए-सितम तेरी ग़ैरत को क्या हुआ।
    ~ Mir Taqi Mir
  • पैमाना कहे है कोई मय-ख़ाना कहे है;
    दुनिया तेरी आँखों को भी क्या क्या न कहे है।
    ~ Mir Taqi Mir
  • न सोचा न समझा...

    न सोचा न समझा न सीखा न जाना;
    मुझे आ गया ख़ुदबख़ुद दिल लगाना;

    ज़रा देख कर अपना जल्वा दिखाना;
    सिमट कर यहीं आ न जाये ज़माना;

    ज़ुबाँ पर लगी हैं वफ़ाओं कि मुहरें;
    ख़मोशी मेरी कह रही है फ़साना;

    गुलों तक लगायी तो आसाँ है लेकिन;
    है दुशवार काँटों से दामन बचाना;

    करो लाख तुम मातम-ए-नौजवानी;
    प 'मीर' अब नहीं आयेगा वो ज़माना।
    ~ Mir Taqi Mir
  • अब कर के फ़रामोश तो नाशाद करोगे;<br/>
पर हम जो न होंगे तो बहुत याद करोगे।Upload to Facebook
    अब कर के फ़रामोश तो नाशाद करोगे;
    पर हम जो न होंगे तो बहुत याद करोगे।
    ~ Mir Taqi Mir
  • दिल वो नगर नहीं है कि फिर आबाद हो सके;
    पछताओगे सुनो हो ये बस्ती उजाड़ कर।
    ~ Mir Taqi Mir
  • जीते-जी कूचा-ए-दिलदार से...

    जीते-जी कूचा-ए-दिलदार से जाया न गया;
    उसकी दीवार का सर से मेरे साया न गया;

    गुल में उसकी सी जो बू आई तो आया न गया;
    हमको बिन दोश-ए-सबा बाग से लाया न गया;

    दिल में रह दिल में कि मे मीर-ए-कज़ा से अब तक;
    ऐसा मतबूअ मकां कोई बनाया न गया;

    क्या तुनुक हौसला थे दीदा-ओ-दिल अपने, आह;
    एक दम राज़ मोहब्बत का छुपाया न गया;

    शहर-ए-दिल आह अजब जगह थी पर उसके गए;
    ऐसा उजड़ा कि किसी तरह बसाया ना गया।
    ~ Mir Taqi Mir
  • हम जानते तो इश्क़ न करते किसी के साथ;
    ले जाते दिल को ख़ाक में इस आरज़ू के साथ।
    ~ Mir Taqi Mir
  • अश्क आंखों में...

    अश्क आँखों में कब नहीं आता;
    लहू आता है जब नहीं आता;

    होश जाता नहीं रहा लेकिन;
    जब वो आता है तब नहीं आता;

    दिल से रुखसत हुई कोई ख्वाहिश;
    गिरिया कुछ बे-सबब नहीं आता;

    इश्क का हौसला है शर्त वरना;
    बात का किस को ढब नहीं आता;

    जी में क्या-क्या है अपने ऐ हमदम;
    हर सुखन ता बा-लब नहीं आता।
    ~ Mir Taqi Mir
  • जाये है जी नजात के ग़म में;
    ऐसी जन्नत गयी जहन्नुम में;
    आप में हम नहीं तो क्या है अज़ब;
    दूर उससे रहा है क्या हम में;
    बेखुदी पर न 'मीर' की जाओ;
    तुमने देखा है और आलम में।
    ~ Mir Taqi Mir