• मैं नादान था जो वफ़ा को तलाश करता रहा ग़ालिब;<br/>
यह न सोचा के एक दिन अपनी साँस भी बेवफा हो जाएगी!
    मैं नादान था जो वफ़ा को तलाश करता रहा ग़ालिब;
    यह न सोचा के एक दिन अपनी साँस भी बेवफा हो जाएगी!
    ~ Mirza Ghalib
  • फिर तेरे कूचे को जाता है ख्याल,<br/>
दिल-ऐ-ग़म गुस्ताख़ मगर याद आया;<br/> 
कोई वीरानी सी वीरानी है,<br/>
दश्त को देख के घर याद आया!
    फिर तेरे कूचे को जाता है ख्याल,
    दिल-ऐ-ग़म गुस्ताख़ मगर याद आया;
    कोई वीरानी सी वीरानी है,
    दश्त को देख के घर याद आया!
    ~ Mirza Ghalib
  • चंद तस्वीर-ऐ-बुताँ, चंद हसीनों के खतूत;<br/>
बाद मरने के मेरे घर से यह सामान निकला!
    चंद तस्वीर-ऐ-बुताँ, चंद हसीनों के खतूत;
    बाद मरने के मेरे घर से यह सामान निकला!
    ~ Mirza Ghalib
  • ख़ुदा की मोहब्बत को:

    ख़ुदा की मोहब्बत को फ़ना कौन करेगा,
    सभी बन्दे नेक हों तो गुनाह कौन करेगा;

    ऐ ख़ुदा मेरे दोस्तों को सलामत रखना,
    वरना मेरी सलामती की दुआ कौन करेगा;

    और रखना मेरे दुश्मनों को भी महफूज़,
    वरना मेरी तेरे पास आने की दुआ कौन करेगा!
    ~ Mirza Ghalib
  • रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल;<br/>
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है!
    रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल;
    जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है!
    ~ Mirza Ghalib
  • मोहबबत में नहीं है फ़र्क जी ने और मरने का;<br/>
उसी को देख कर जीते हैं जिस क़ाफ़िर पे दम निकले!
    मोहबबत में नहीं है फ़र्क जी ने और मरने का;
    उसी को देख कर जीते हैं जिस क़ाफ़िर पे दम निकले!
    ~ Mirza Ghalib
  • मोहबबत में नहीं है फ़र्क जी ने और मरने का;<BR/>
उसी को देख कर जीते हैं जिस क़ाफ़िर पे दम निकले!
    मोहबबत में नहीं है फ़र्क जी ने और मरने का;
    उसी को देख कर जीते हैं जिस क़ाफ़िर पे दम निकले!
    ~ Mirza Ghalib
  • आगे आती थी हाल-ए-दिल पर हंसी;<br/>
अब किसी बात पर नहीं आती!
    आगे आती थी हाल-ए-दिल पर हंसी;
    अब किसी बात पर नहीं आती!
    ~ Mirza Ghalib
  • आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक;<br/>
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक!
    आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक;
    कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक!
    ~ Mirza Ghalib
  • बना कर फ़क़ीरों का हम भेस ग़ालिब;<br/>
तमाशा-ए-अहल-ए-करम देख़ते हैं!
    बना कर फ़क़ीरों का हम भेस ग़ालिब;
    तमाशा-ए-अहल-ए-करम देख़ते हैं!
    ~ Mirza Ghalib