• ख़ुदा की मोहब्बत को:

    ख़ुदा की मोहब्बत को फ़ना कौन करेगा,
    सभी बन्दे नेक हों तो गुनाह कौन करेगा;

    ऐ ख़ुदा मेरे दोस्तों को सलामत रखना,
    वरना मेरी सलामती की दुआ कौन करेगा;

    और रखना मेरे दुश्मनों को भी महफूज़,
    वरना मेरी तेरे पास आने की दुआ कौन करेगा!
    ~ Mirza Ghalib
  • रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल;<br/>
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है!
    रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल;
    जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है!
    ~ Mirza Ghalib
  • मोहबबत में नहीं है फ़र्क जी ने और मरने का;<br/>
उसी को देख कर जीते हैं जिस क़ाफ़िर पे दम निकले!
    मोहबबत में नहीं है फ़र्क जी ने और मरने का;
    उसी को देख कर जीते हैं जिस क़ाफ़िर पे दम निकले!
    ~ Mirza Ghalib
  • मोहबबत में नहीं है फ़र्क जी ने और मरने का;<BR/>
उसी को देख कर जीते हैं जिस क़ाफ़िर पे दम निकले!
    मोहबबत में नहीं है फ़र्क जी ने और मरने का;
    उसी को देख कर जीते हैं जिस क़ाफ़िर पे दम निकले!
    ~ Mirza Ghalib
  • आगे आती थी हाल-ए-दिल पर हंसी;<br/>
अब किसी बात पर नहीं आती!
    आगे आती थी हाल-ए-दिल पर हंसी;
    अब किसी बात पर नहीं आती!
    ~ Mirza Ghalib
  • आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक;<br/>
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक!
    आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक;
    कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक!
    ~ Mirza Ghalib
  • बना कर फ़क़ीरों का हम भेस ग़ालिब;<br/>
तमाशा-ए-अहल-ए-करम देख़ते हैं!
    बना कर फ़क़ीरों का हम भेस ग़ालिब;
    तमाशा-ए-अहल-ए-करम देख़ते हैं!
    ~ Mirza Ghalib
  • इश्क पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब';<br/>
जो लगाये न लगे और बुझाये न बने!
    इश्क पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब';
    जो लगाये न लगे और बुझाये न बने!
    ~ Mirza Ghalib
  • दर पे रहने को कहा और कह के कैसा फिर गया;<br/>
जितने अर्से में मेरा लिपटा हुआ बिस्तर खुला!
    दर पे रहने को कहा और कह के कैसा फिर गया;
    जितने अर्से में मेरा लिपटा हुआ बिस्तर खुला!
    ~ Mirza Ghalib
  • दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यों;<br/>
रोयेंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यों।
    दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यों;
    रोयेंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यों।
    ~ Mirza Ghalib