• दयार-ए-दिल की राह में चराग़ सा जला गया;<br/>
मिला नहीं तो क्या हुआ, वो शक़्ल तो दिखा गया!
    दयार-ए-दिल की राह में चराग़ सा जला गया;
    मिला नहीं तो क्या हुआ, वो शक़्ल तो दिखा गया!
    ~ Nasir Kazmi
  • किसी कली ने भी देखा न आँख भर के मुझे;
    गुज़र गयी जरस-ए-गुल उदास करके मुझे;
    मैं सो रहा था किसी याद के शबिस्ताँ में;
    जगा के छोड़ गए काफिले सहर के मुझे।

    शब्दार्थ:
    जरस-ए-गुल = फूलों की लड़ी
    शबिस्ताँ = बिस्तर
    ~ Nasir Kazmi
  • ये सानेहा भी मोहब्बत में बार-हा गुज़रा;<br/>
कि उस ने हाल भी पूछा तो आँख भर आई।<br/><br/>

शब्दार्थ:<br/>
सानेहा = घटना
    ये सानेहा भी मोहब्बत में बार-हा गुज़रा;
    कि उस ने हाल भी पूछा तो आँख भर आई।

    शब्दार्थ:
    सानेहा = घटना
    ~ Nasir Kazmi
  • कहते हैं ग़ज़ल क़ाफ़िया-पैमाई है नासिर;
    ये क़ाफ़िया-पैमाई ज़रा कर के तो देखो।
    ~ Nasir Kazmi
  • इन को 'नासिर' न कभी आँख से गिरने देना;
    उन को लगते हैं मेरी आँख में प्यारे आँसू।
    ~ Nasir Kazmi
  • शहर में हमदम पुराने बहुत थे नासिर;
    वक़्त पड़ने पर मेरे काम ना आया कोई।
    ~ Nasir Kazmi
  • तेरे मिलने को...

    तेरे मिलने को बेकल हो गये हैं;
    मगर ये लोग पागल हो गये हैं;

    बहारें लेके आये थे जहाँ तुम;
    वो घर सुनसान जंगल हो गये हैं;

    यहाँ तक बढ़ गये आलाम-ए-हस्ती;
    कि दिल के हौसले शल हो गये हैं;

    कहाँ तक ताब लाये नातवाँ दिल;
    कि सदमे अब मुसलसल हो गये हैं;

    निगाह-ए-यास को नींद आ रही है;
    मुसर्दा पुरअश्क बोझल हो गये हैं;

    उन्हें सदियों न भूलेगा ज़माना;
    यहाँ जो हादसे कल हो गये हैं;

    जिन्हें हम देख कर जीते थे 'नासिर';
    वो लोग आँखों से ओझल हो गये है।
    ~ Nasir Kazmi
  • तेरे ख़याल से...

    तेरे ख़याल से लौ दे उठी है तन्हाई;
    शब-ए-फ़िराक़ है या तेरी जलवाआराई;

    तू किस ख़याल में है ऐ मन्ज़िलों क्के शादाई;
    उन्हें भी देख जिन्हें रास्ते में नींद आई;

    पुकार ऐ जरस-ए-कारवान-ए-सुबह-ए-तरब;
    भटक रहे हैं अँधेरों में तेरे सौदाई;

    रह-ए-हयात में कुछ मरकले देख लिये;
    ये और बात तेरी आरज़ू न रास आई;

    ये सानिहा भी मुहब्बत में बारहा गुज़रा;
    कि उस ने हाल भी पूछा तो आँख भर आई;

    फिर उस की याद में दिल बेक़रार है 'नासिर';
    बिछड़ के जिस से हुई शहर शहर रुसवाई।
    ~ Nasir Kazmi
  • ज़बाँ सुख़न को सुख़न...

    ज़बाँ सुख़न को सुख़न बाँकपन को तरसेगा;
    सुख़नकदा मेरी तर्ज़-ए-सुख़न को तरसेगा;

    नये प्याले सही तेरे दौर में साक़ी;
    ये दौर मेरी शराब-ए-कोहन को तरसेगा;

    मुझे तो ख़ैर वतन छोड़ के अमन न मिली;
    वतन भी मुझ से ग़रीब-उल-वतन को तरसेगा;

    उन्हीं के दम से फ़रोज़ाँ हैं मिल्लतों के चराग़;
    ज़माना सोहबत-ए-अरबाब-ए-फ़न को तरसेगा;

    बदल सको तो बदल दो ये बाग़बाँ वरना;
    ये बाग़ साया-ए-सर्द-ओ-समाँ को तरसेगा;

    हवा-ए-ज़ुल्म यही है तो देखना एक दिन;
    ज़मीं पानी को सूरज किरन को तरसेगा।
    ~ Nasir Kazmi