• हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी,
    फिर भी तनहाइयों का शिकार आदमी;

    सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ,
    अपनी ही लाश का खुद मज़ार आदमी;

    हर तरफ भागते दौड़ते रास्ते,
    हर तरफ आदमी का शिकार आदमी;

    रोज जीता हुआ रोज मरता हुआ,
    हर नए दिन नया इंतज़ार आदमी;

    ज़िंदगी का मुक़द्दर सफ़र-दर-सफ़र,
    आखिरी सांस तक बेक़रार आदमी!
    ~ Nida Fazli
  • लेके तन के नाप को, घूमे बस्ती गाँव;<br/>
हर चादर के घेर से, बाहर निकले पाँव।
    लेके तन के नाप को, घूमे बस्ती गाँव;
    हर चादर के घेर से, बाहर निकले पाँव।
    ~ Nida Fazli
  • छोटा कर के देखिए जीवन का विस्तार;<br/>
आँखों भर आकाश है, बाहों भर संसार।
    छोटा कर के देखिए जीवन का विस्तार;
    आँखों भर आकाश है, बाहों भर संसार।
    ~ Nida Fazli
  • मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार;<br/>
दुःख ने दुःख से बात की, बिन चीठी बिन तार।
    मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार;
    दुःख ने दुःख से बात की, बिन चीठी बिन तार।
    ~ Nida Fazli
  • अच्छा-सा कोई मौसम तन्हा-सा कोई आलम;<br/>
हर वक़्त का रोना तो बेकार का रोना है।
    अच्छा-सा कोई मौसम तन्हा-सा कोई आलम;
    हर वक़्त का रोना तो बेकार का रोना है।
    ~ Nida Fazli
  • कहीं छत थी, दीवार-ओ-दर थे कहीं, मिला मुझे घर का पता देर से;<br/>
दिया तो बहुत ज़िन्दगी ने मुझे, मगर जो दिया, वो दिया देर से।
    कहीं छत थी, दीवार-ओ-दर थे कहीं, मिला मुझे घर का पता देर से;
    दिया तो बहुत ज़िन्दगी ने मुझे, मगर जो दिया, वो दिया देर से।
    ~ Nida Fazli
  • शहर में सबको कहाँ मिलती है रोने की जगह,<br/>
अपनी इज़्ज़त भी यहाँ हँसने हंसाने से रही।
    शहर में सबको कहाँ मिलती है रोने की जगह,
    अपनी इज़्ज़त भी यहाँ हँसने हंसाने से रही।
    ~ Nida Fazli
  • अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं​;<br />
​रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं​;​<br />
​​
​​पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता हैं​;​<br />
​अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं​।
    अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं​;
    ​रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं​;​
    ​​ ​​पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता हैं​;​
    ​अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं​।
    ~ Nida Fazli
  • नयी-नयी आँखें हों तो...

    नयी-नयी आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है;
    कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन, अब घर अच्छा लगता है;

    मिलने-जुलने वालों में तो सारे अपने जैसे हैं;
    जिससे अब तक मिले नहीं वो अक्सर अच्छा लगता है;

    मेरे आँगन में आये या तेरे सर पर चोट लगे;
    सन्नाटों में बोलने वाला पत्थर अच्छा लगता है;

    चाहत हो या पूजा सबके अपने-अपने साँचे हैं;
    जो मूरत में ढल जाये वो पैकर अच्छा लगता है;

    हमने भी सोकर देखा है नये-पुराने शहरों में;
    जैसा भी है अपने घर का बिस्तर अच्छा लगता है।
    ~ Nida Fazli
  • अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं;
    रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं।
    ~ Nida Fazli