• कुछ सोच के इक राह-ए-पुर-ख़ार से गुज़रा था;<br/>
काँटे भी न रास आए दामन भी न काम आया!
    कुछ सोच के इक राह-ए-पुर-ख़ार से गुज़रा था;
    काँटे भी न रास आए दामन भी न काम आया!
    ~ Nushur Wahidi