• चापलूसी का ज़हरीला प्याला आपको तब तक नुकसान नहीं पहुँचा सकता जब तक कि आपके कान उसे अमृत समझ कर पी न जाएँ।
    ~ Premchand
  • क्रोध में मनुष्य अपने मन की बात नहीं कहता, वह केवल दूसरों का दिल दुखाना चाहता है।
    क्रोध में मनुष्य अपने मन की बात नहीं कहता, वह केवल दूसरों का दिल दुखाना चाहता है।
    ~ Premchand
  • जिस प्रकार नेत्रहीन के लिए दर्पण बेकार है उसी प्रकार बुद्धिहीन के लिए विद्या बेकार है।
    जिस प्रकार नेत्रहीन के लिए दर्पण बेकार है उसी प्रकार बुद्धिहीन के लिए विद्या बेकार है।
    ~ Premchand
  • निराशा सम्भव को असम्भव बना देती है।
    निराशा सम्भव को असम्भव बना देती है।
    ~ Premchand
  • युवावस्था आवेशमय होती है, वह क्रोध से आग हो जाती है तो करुणा से पानी भी।
    ~ Premchand
  • कमज़ोर प्राणियों में सत्य भी गूंगा हो जाता है।
    ~ Premchand
  • ​अपनी भूल अपने ही हाथों से सुधर जाए तो यह उससे कहीं अच्छा है कि कोई दूसरा उसे सुधारे।
    ~ Premchand
  • धन खोकर अगर हम अपनी आत्मा को पा सकें तो यह कोई महंगा सौदा नहीं।
    धन खोकर अगर हम अपनी आत्मा को पा सकें तो यह कोई महंगा सौदा नहीं।
    ~ Premchand
  • आत्म सम्मान की रक्षा, हमारा सबसे पहला धर्म है।
    आत्म सम्मान की रक्षा, हमारा सबसे पहला धर्म है।
    ~ Premchand
  • निराशा सम्भव को असम्भव बना देती है।
    ~ Premchand
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