• सारी बस्ती में ये जादू नज़र आए मुझको:

    सारी बस्ती में ये जादू नज़र आए मुझको,
    जो दरीचा भी खुले तू नज़र आए मुझको;

    सदियों का रत जगा मेरी रातों में आ गया,
    मैं एक हसीन शख्स की बातों में आ गया;

    जब तस्सवुर मेरा चुपके से तुझे छू आए,
    देर तक अपने बदन से तेरी खुशबू आए;

    गुस्ताख हवाओं की शिकायत न किया कर,
    उड़ जाए दुपट्टा तो खनक औढ लिया कर;

    तुम पूछो और में न बताउ ऐसे तो हालात नहीं,
    एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं;

    रात के सन्नाटे में हमने क्या-क्या धोके खाए है,
    अपना ही जब दिल धड़का तो हम समझे वो आए है!
    ~ Qateel Shifai
  • दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं;<br/>
लोग अब मुझ को तेरे नाम से पहचानते हैं।Upload to Facebook
    दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं;
    लोग अब मुझ को तेरे नाम से पहचानते हैं।
    ~ Qateel Shifai
  • मैं घर से तेरी तमन्ना पहन के जब निकलूँ,<br/>
बरहना शहर में कोई नज़र ना आए मुझे।Upload to Facebook
    मैं घर से तेरी तमन्ना पहन के जब निकलूँ,
    बरहना शहर में कोई नज़र ना आए मुझे।
    ~ Qateel Shifai
  • वफ़ा के शीश महल में सजा लिया मैनें;
    वो एक दिल जिसे पत्थर बना लिया मैनें;

    ये सोच कर कि न हो ताक में ख़ुशी कोई;
    ग़मों कि ओट में ख़ुद को छुपा लिया मैनें;

    कभी न ख़त्म किया मैं ने रोशनी का मुहाज़;
    अगर चिराग़ बुझा, दिल जला लिया मैनें;

    कमाल ये है कि जो दुश्मन पे चलाना था;
    वो तीर अपने कलेजे पे खा लिया मैनें;

    "क़तील" जिसकी अदावत में एक प्यार भी था;
    उस आदमी को गले से लगा लिया मैनें।
    ~ Qateel Shifai
  • अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको,
    मैं हूँ तेरा तो नसीब अपना बना ले मुझको;

    मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के माने,
    ये तेरी सादा-दिली मार ना डाले मुझको;

    ख़ुद को मैं बाँट ना डालूँ कहीं दामन-दामन,
    कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको;

    बादाह फिर बादाह है मैं ज़हर भी पी जाऊँ 'क़तील',
    शर्त ये है कोई बाहों में सम्भाले मुझको।
    ~ Qateel Shifai
  • पहले तो अपने दिल की...

    पहले तो अपने दिल की रज़ा जान जाइये;
    फिर जो निगाह-ए-यार कहे मान जाइये;

    पहले मिज़ाज-ए-राहगुज़र जान जाइये;
    फिर गर्द-ए-राह जो भी कहे मान जाइये;

    कुछ कह रही है आपके सीने की धड़कने;
    मेरी सुनें तो दिल का कहा मान जाइये;

    इक धूप सी जमी है निगाहों के आस पास;
    ये आप हैं तो आप पे क़ुर्बान जाइये;

    शायद हुज़ूर से कोई निस्बत हमें भी हो;
    आँखों में झाँक कर हमें पहचान जाइये।
    ~ Qateel Shifai
  • अपने अपने किये पे हैं हम दोनों इतने शर्मिंदा;
    दिल हम से कतराता है और हम दिल से कतराते हैं।
    ~ Qateel Shifai
  • बेचैन बहारों में क्या-क्या है जान की ख़ुश्बू आती है;
    जो फूल महकता है उससे तूफ़ान की ख़ुश्बू आती है;

    कल रात दिखा के ख़्वाब-ए-तरब जो सेज को सूना छोड़ गया;
    हर सिलवट से फिर आज उसी मेहमान की ख़ुश्बू आती है;

    तल्कीन-ए-इबादत की है मुझे यूँ तेरी मुक़द्दस आँखों ने;
    मंदिर के दरीचों से जैसे लोबान की ख़ुश्बू आती है;

    कुछ और भी साँसें लेने पर मजबूर-सा मैं हो जाता हूँ;
    जब इतने बड़े जंगल में किसी इंसान की ख़ुश्बू आती है;

    डरता हूँ कहीं इस आलम में जीने से न मुनकिर हो जाऊँ;
    अहबाब की बातों से मुझको एहसान की ख़ुश्बू आती है।
    ~ Qateel Shifai
  • दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं;
    लोग अब मुझ को तेरे नाम से पहचानते हैं।
    ~ Qateel Shifai
  • उसे मैं ढाँप लेना चाहता हूँ अपनी पलकों में;
    इलाही उस के आने तक मेरी आँखों में दम रखना।
    ~ Qateel Shifai