• अब वही करने लगे दीदार से आगे की बात;<br/>
जो कभी कहते थे बस दीदार होना चाहिए!
    अब वही करने लगे दीदार से आगे की बात;
    जो कभी कहते थे बस दीदार होना चाहिए!
    ~ Zafar Iqbal
  • कब वो ज़ाहिर होगा और हैरान कर देगा मुझे,
    जितनी भी मुश्किल में हूँ आसान कर देगा मुझे;

    रू-ब-रू कर के कभी अपने महकते सुर्ख़ होंठ,
    एक दो पल के लिए गुलदान कर देगा मुझे;

    रूह फूँकेगा मोहब्बत की मेरे पैकर में वो,
    फिर वो अपने सामने बे-जान कर देगा मुझे;

    ख़्वाहिशों का ख़ूँ बहाएगा सर-ए-बाज़ार-ए-शौक़,
    और मुकम्मल बे-ए-सर-ओ-सामान कर देगा मुझे;

    मुनहदिम कर देगा आ कर सारी तामीरात-ए-दिल,
    देखते ही देखते वीरान कर देगा मुझे;

    या तो मुझ से वो छुड़ा देगा ग़ज़ल-गोई 'ज़फ़र',
    या किसी दिन साहब-ए-दीवान कर देगा मुझे।
    ~ Zafar Iqbal
  • यहाँ किसी को भी कुछ हस्ब-ए-आरज़ू न मिला;
    किसी को हम न मिले और हम को तू न मिला;

    ग़ज़ाल-ए-अश्क सर-ए-सुब्ह दूब-ए-मिज़गाँ पर;
    कब आँख अपनी खुली और लहू लहू न मिला;

    चमकते चाँद भी थे शहर-ए-शब के ऐवाँ में;
    निगार-ए-ग़म सा मगर कोई शम्मा-रू न मिला;

    उन्ही की रम्ज़ चली है गली गली में यहाँ;
    जिन्हें उधर से कभी इज़्न-ए-गुफ़्तुगू न मिला;

    फिर आज मय-कदा-ए-दिल से लौट आए हैं;
    फिर आज हम को ठिकाने का हम-सबू न मिला।
    ~ Zafar Iqbal
  • जिस से चाहा था, बिखरने से बचा ले मुझको;<br />
कर गया तुन्द हवाओं के हवाले मुझ को;<br />
मैं वो बुत हूँ कि तेरी याद मुझे पूजती है;<br />
फिर भी डर है ये कहीं तोड़ न डाले मुझको।
    जिस से चाहा था, बिखरने से बचा ले मुझको;
    कर गया तुन्द हवाओं के हवाले मुझ को;
    मैं वो बुत हूँ कि तेरी याद मुझे पूजती है;
    फिर भी डर है ये कहीं तोड़ न डाले मुझको।
    ~ Zafar Iqbal
  • बस एक बार किसी ने गले लगाया था;
    फिर उस के बाद न मैं था न मेरा साया था;

    गली में लोग भी थे मेरे उस के दुश्मन लोग;
    वो सब पे हँसता हुआ मेरे दिल में आया था;

    उस एक दश्त में सौ शहर हो गए आबाद;
    जहाँ किसी ने कभी कारवाँ लुटाया था;

    वो मुझ से अपना पता पूछने को आ निकले;
    कि जिन से मैं ने ख़ुद अपना सुराग़ पाया था;

    उसी ने रूप बदल कर जगा दिया आख़िर;
    जो ज़हर मुझ पे कभी नींद बन के छाया था;

    'ज़फर' की ख़ाक में है किस की हसरत-ए-तामीर;
    ख़याल-ओ-ख़्वाब में किस ने ये घर बनाया था।
    ~ Zafar Iqbal
  • कोई सूरत निकलती...

    कोई सूरत निकलती क्यों नहीं है;
    यहाँ हालत बदलती क्यों नहीं है;

    ये बुझता क्यों नहीं है उनका सूरज;
    हमारी शमा जलती क्यों नहीं है;

    अगर हम झेल ही बैठे हैं इसको;
    तो फिर ये रात ढलती क्यों नहीं है;

    मोहब्बत सिर को चढ़ जाती है, अक्सर;
    मेरे दिल में मचलती क्यों नहीं है।
    ~ Zafar Iqbal
  • खोलिए आँख तो...

    खोलिए आँख तो मंज़र है नया और बहुत;
    तू भी क्या कुछ है मगर तेरे सिवा और बहुत;

    जो खता की है जज़ा खूब ही पायी उसकी;
    जो अभी की ही नहीं, उसकी सज़ा और बहुत;

    खूब दीवार दिखाई है ये मज़बूरी की;
    यही काफी है बहाने न बना, और बहुत;

    सर सलामत है तो सज़दा भी कहीं कर लूँगा;
    ज़ुस्तज़ु चाहिए , बन्दों को खुदा और बहुत।
    ~ Zafar Iqbal
  • अभी आँखें खुली हैं...

    अभी आँखें खुली हैं और क्या क्या देखने को;
    मुझे पागल किया उस ने तमाशा देखने को;

    वो सूरत देख ली हम ने तो फिर कुछ भी न देखा;
    अभी वर्ना पड़ी थी एक दुनिया देखने को;

    तमन्ना की किसे परवाह कि सोने जागने मे;
    मुयस्सर हैं बहुत ख़्वाब-ए-तमन्ना देखने को;

    ब-ज़ाहिर मुतमइन मैं भी रहा इस अंजुमन में;
    सभी मौजूद थे और वो भी ख़ुश था देखने को;

    अब उस को देख कर दिल हो गया है और बोझल;
    तरसता था यही देखो तो कितना देखने को;

    छुपाया हाथ से चेहरा भी उस ना-मेहरबाँ ने;
    हम आए थे 'ज़फ़र' जिस का सरापा देखने को।
    ~ Zafar Iqbal
  • यहाँ किसी को भी...

    यहाँ किसी को भी कुछ हस्ब-ए-आरज़ू न मिला;
    किसी को हम न मिले और हम को तू न मिला;

    ग़ज़ाल-ए-अश्क सर-ए-सुब्ह दूब-ए-मिज़गाँ पर;
    कब आँख अपनी खुली और लहू लहू न मिला;

    चमकते चाँद भी थे शहर-ए-शब के ऐवाँ में;
    निगार-ए-ग़म सा मगर कोई शम्मा-रू न मिला;

    उन्ही की रम्ज़ चली है गली गली में यहाँ;
    जिन्हें उधर से कभी इज़्न-ए-गुफ़्तुगू न मिला;

    फिर आज मय-कदा-ए-दिल से लौट आए हैं;
    फिर आज हम को ठिकाने का हम-सबू न मिला।
    ~ Zafar Iqbal
  • कब वो ज़ाहिर होगा...

    कब वो ज़ाहिर होगा और हैरान कर देगा मुझे;
    जितनी भी मुश्किल में हूँ आसान कर देगा मुझे;

    रू-ब-रू कर के कभी अपने महकते सुर्ख होंठ;
    एक दो पल के लिए गुलदान कर देगा मुझे;

    रूह फूँकेगा मोहब्बत की मेरे पैकर में वो;
    फिर वो अपने सामने बे-जान कर देगा मुझे;

    ख़्वाहिशों का खून बहाएगा सर-ए-बाज़ार-ए-शौक़;
    और मुकम्मल बे-ए-सर-ओ-सामान कर देगा मुझे;

    एक ना-मौजूदगी रह जाएगी चारों तरफ़;
    रफ़्ता रफ़्ता इस क़दर सुनसान कर देगा मुझे;

    या तो मुझ से वो छुड़ा देगा ग़ज़ल-गोई 'ज़फ़र';
    या किसी दिन साहब-ए-दीवान कर देगा मुझे।
    ~ Zafar Iqbal