• हमें क्या पता था, मौसम ऐसे रो पड़ेगा;<br />
हमने तो आसमां को बस अपनी दास्ताँ सुनाई थी।Upload to Facebook
    हमें क्या पता था, मौसम ऐसे रो पड़ेगा;
    हमने तो आसमां को बस अपनी दास्ताँ सुनाई थी।
  • कभी खुशी भी मिले हरपल गम अच्छा नहीं लगता हसीन<br />
कितना भी हो हमेशा एक जैंसा मौसम अच्छा नहीं लगता!Upload to Facebook
    कभी खुशी भी मिले हरपल गम अच्छा नहीं लगता हसीन
    कितना भी हो हमेशा एक जैंसा मौसम अच्छा नहीं लगता!
  • मजबूरियॉ ओढ के निकलता हूं घर से आजकल, <br />
वरना शौक तो आज भी है बारिशों में भीगनें काUpload to Facebook
    मजबूरियॉ ओढ के निकलता हूं घर से आजकल,
    वरना शौक तो आज भी है बारिशों में भीगनें का
  • मेरा यही अंदाज इस जमाने को खलता है;
    कि इतना पीने के बाद भी सीधा कैसे चलता है!
  • खुलेगी इस नज़र पे चश्म-ए-तर आहिस्ता आहिस्ता;
    किया जाता है पानी में सफ़र आहिस्ता आहिस्ता;
    कोई ज़ंजीर फिर वापस वहीं पर ले के आती है;
    कठिन हो राह तो छूटता है घर आहिस्ता आहिस्ता।
    ~ Parveen Shakir
  • सब फ़साने हैं दुनियादारी के,<br />
किस से किस का सुकून लूटा है;<br />
सच तो ये है कि इस ज़माने में,<br />
मैं भी झूठा हूँ तू भी झूठा है।Upload to Facebook
    सब फ़साने हैं दुनियादारी के,
    किस से किस का सुकून लूटा है;
    सच तो ये है कि इस ज़माने में,
    मैं भी झूठा हूँ तू भी झूठा है।
  • ख्याल में आता है जब भी उसका चेहरा;<br />
तो लबों पे अक्सर फरियाद आती है;<br />
भूल जाता हूँ सारे ग़म और सितम उसके;<br />
जब ही उसकी थोड़ी सी मोहब्बत याद आती है।Upload to Facebook
    ख्याल में आता है जब भी उसका चेहरा;
    तो लबों पे अक्सर फरियाद आती है;
    भूल जाता हूँ सारे ग़म और सितम उसके;
    जब ही उसकी थोड़ी सी मोहब्बत याद आती है।
  • फिर उसके जाते ही दिल सुनसान हो कर रह गया;
    अच्छा भला इक शहर वीरान हो कर रह गया;

    हर नक्श बतल हो गया अब के दयार-ए-हिज्र में;
    इक ज़ख्म गुज़रे वक्त की पहचान हो कर रह गया;

    रुत ने मेरे चारों तरफ खींचें हिसार-ए-बाम-ओ-दर;
    यह शहर फिर मेरे लिए ज़ान्दान हो कर रह गया;

    कुछ दिन मुझे आवाज़ दी लोगों ने उस के नाम से;
    फिर शहर भर में वो मेरी पहचान हो कर रह गया;

    इक ख्वाब हो कर रह गई गुलशन से अपनी निस्बतें;
    दिल रेज़ा रेज़ा कांच का गुलदान हो कर रह गया;

    ख्वाहिश तो थी "साजिद" मुझे तशीर-ए-मेहर-ओ-माह की;
    लेकिन फ़क़त मैं साहिब-ए-दीवान हो कर रह गया।
    ~ Aitbar Sajid
  • अर्ज़ किया है:<br />
वो कहती अपने भाइयों से, मेरे आशिक़ को यूँ ना पीटो;<br />

ज़रा गौर फरमाइये:<br />
वो कहती अपने भाइयों से, मेरे आशिक़ को यूँ ना पीटो;<br />
बड़ा ज़िद्दी है ये कमीना, पहले कुत्ते की तरह घसीटो।Upload to Facebook
    अर्ज़ किया है:
    वो कहती अपने भाइयों से, मेरे आशिक़ को यूँ ना पीटो;
    ज़रा गौर फरमाइये:
    वो कहती अपने भाइयों से, मेरे आशिक़ को यूँ ना पीटो;
    बड़ा ज़िद्दी है ये कमीना, पहले कुत्ते की तरह घसीटो।
  • तू कहीं हो दिल-ए-दीवाना वहाँ पहुँचेगा;
    शमा होगी जहाँ परवाना वहाँ पहुँचेगा।
    ~ Bahadur Shah Zafar