• क्या मज़ा देती है बिजली की चमक मुझ को 'रियाज़';
    मुझ से लिपटे हैं मेरे नाम से डरने वाले।
    ~ Riyaz Khairabadi
  • दिल के दर्द को दिल तोड़ने वाले क्या जाने;<br/>
प्यार की रस्मों को यह ज़माने वाले क्या जाने;<br/>
होती है कितनी तकलीफ कब्र के नीचे;<br/>
यह ऊपर से फूल चढ़ाने वाले क्या जाने।
    दिल के दर्द को दिल तोड़ने वाले क्या जाने;
    प्यार की रस्मों को यह ज़माने वाले क्या जाने;
    होती है कितनी तकलीफ कब्र के नीचे;
    यह ऊपर से फूल चढ़ाने वाले क्या जाने।
  • रूठी हो अगर ज़िंदगी तो मना लेंगे हम;<br/>
मिले जो गम अगर वो भी सह लेंगे हम;<br/>
बस आप रहना हमेशा साथ हमारे तो;<br/>
निकलते हुए आँसुओं में भी मुस्कुरा लेंगे हम।
    रूठी हो अगर ज़िंदगी तो मना लेंगे हम;
    मिले जो गम अगर वो भी सह लेंगे हम;
    बस आप रहना हमेशा साथ हमारे तो;
    निकलते हुए आँसुओं में भी मुस्कुरा लेंगे हम।
  • यूँ नज़रों से आपने बात की और दिल चुरा ले गए;
    हम तो समझे थे अजनबी आपको;
    पर दे कर बस एक मुस्कुराहट अपनी;
    आप तो हमें अपना बना गए।
  • मोहब्बतों में दिखावे की...

    मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती ना मिला;
    अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी ना मिला;

    घरों पे नाम थे, नामों के साथ ओहदे थे;
    बहुत तलाश किया कोई आदमी ना मिला;

    तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड आया था;
    फिर इसके बाद मुझे कोई अजनबी ना मिला;

    बहुत अजीब है ये कुरबतों की दूरी भी;
    वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी ना मिला;

    खुदा की इतनी बड़ी कायनात में मैंने;
    बस एक शख्स को मांगा मुझे वही ना मिला।
    ~ Bashir Badr
  • उनके आने की बंधी थी आस जब तक हमनशीं;
    सुबह हो जाती थी अक्सर जानिब-ए-दर देखते।
    ~ Asar Lakhnavi
  • मेरी आंखों के आंसू कह रहे हैं मुझसे,<br/>
अब दर्द इतना है कि सहा नहीं जाता;<br/>
मत रोक पलको से खुल कर छलकने दे;<br/>
अब यूं इन आँखों में थम कर रहा नहीं जाता।
    मेरी आंखों के आंसू कह रहे हैं मुझसे,
    अब दर्द इतना है कि सहा नहीं जाता;
    मत रोक पलको से खुल कर छलकने दे;
    अब यूं इन आँखों में थम कर रहा नहीं जाता।
  • हमने भी कभी चाहा था एक ऐसे शख्स को;<br/>
जो आइने से भी नाज़ुक था मगर था पत्थर का।
    हमने भी कभी चाहा था एक ऐसे शख्स को;
    जो आइने से भी नाज़ुक था मगर था पत्थर का।
  • ताबीर जो मिल जाएं तो एक ख्वाब बहुत था;
    जो शख्स गंवा बैठी हूं नायाब बहुत था;
    मैं भला कैसे बचा लेती कश्ती-ए-दिल को सागर से;
    दरिया-ए- मोहब्बत में सैलाब बहुत था।
  • ये ठीक है कि...

    ये ठीक है कि तेरी गली में न आयें हम;
    लेकिन ये क्या कि शहर तेरा छोड़ जाएँ हम;

    मुद्दत हुई है कूए बुताँ की तरफ़ गए;
    आवारगी से दिल को कहाँ तक बचाएँ हम;

    शायद बकैदे-जीस्त ये साअत न आ सके;
    तुम दास्ताने-शौक़ सुनो और सुनाएँ हम;

    उसके बगैर आज बहुत जी उदास है;
    'जालिब' चलो कहीं से उसे ढूँढ लायें हम।
    ~ Habib Jalib