नींद से मेरा ताल्लुक़ ही नहीं बरसों से;
ख्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं।
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ग़म इस कदर मिला कि घबरा के पी गए;
ख़ुशी थोड़ी सी मिली तो मिला के पी गए;
यूँ तो ना थे जन्म से पीने की आदत;
शराब को तनहा देखा तो तरस खा के पी गए।
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फूलों की याद आती है काँटों को छूने पर;
रिश्तों की समझ आती है फासलों पे रहने पर;
कुछ जज़्बात ऐसे भी होते हैं जो आँखों से बयां नहीं होते;
वो तो महसूस होते हैं ज़ुबान से कहने पर।
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हर वक़्त तेरी यादें तडपाती हैं मुझे;
आखिर इतना क्यों ये सताती है मुझे;
इश्क तो किया था तूने भी बड़े शौंक से;
अब क्यों नहीं यह एहसास दिलाती है तुझे।
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खोलिए आँख तो...

खोलिए आँख तो मंज़र है नया और बहुत;
तू भी क्या कुछ है मगर तेरे सिवा और बहुत;

जो खता की है जज़ा खूब ही पायी उसकी;
जो अभी की ही नहीं, उसकी सज़ा और बहुत;

खूब दीवार दिखाई है ये मज़बूरी की;
यही काफी है बहाने न बना, और बहुत;

सर सलामत है तो सज़दा भी कहीं कर लूँगा;
ज़ुस्तज़ु चाहिए , बन्दों को खुदा और बहुत।
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दिल की बात लबों पर लाकर अब तक हम दुःख सहते हैं;
हम ने सुना था इस बस्ती में दिल वाले भी रहते हैं;
बीत गया सावन का महीना मौसम ने नज़रें बदलीं;
लेकिन इन प्यासी आँखों से अब तक आँसू बहते हैं।
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तेरे हर ग़म को अपनी रूह में उतार लूँ;
ज़िंदगी अपनी तेरी चाहत में सवार लूँ;
मुलाक़ात हो तुझसे कुछ इस तरह मेरी;
सारी उम्र बस एक मुलाक़ात में गुज़ार लूँ।
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काश उसे चाहने का अरमान ना होता;
मैं होश में रहते हुए अनजान ना होता;
ना प्यार होता किसी पत्थर दिल से हमको;
या फिर कोई पत्थर दिल इंसान ना होता।
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ना जाने कौन सी बात पर वो रूठ गयी है;
मेरी सहने की हदें भी अब टूट गयी हैं;
कहती थी जो कि कभी नहीं रूठेगी मुझसे;
आज वो अपनी ही बातें भूल गयी है।
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तेरी उम्मीद तेरा इंतज़ार...

तेरी उम्मीद तेरा इंतज़ार जब से है;
न शब को दिन से शिकायत न दिन को शब से है;

किसी का दर्द हो करते हैं तेरे नाम रक़म;
गिला है जो भी किसी से तेरी सबब से है;

हुआ है जब से दिल-ए-नासबूर बेक़ाबू;
कलाम तुझसे नज़र को बड़ी अदब से है;

अगर शरर है तो भड़के, जो फूल है तो खिले;
तरह तरह की तलब तेरे रंग-ए-लब से है;

कहाँ गये शब-ए-फ़ुरक़त के जागने वाले;
सितारा-ए-सहर हम-कलाम कब से है।
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