• शिखर पर खड़ी हूँ मंज़िल के मैं;
    पैरों को घेरे यह फिर कैसे भंवर हैं।
    ~ Parveen Sethi
  • चल रहे हैं इस ‪‎दौर में ‪रिश्वतों‬ के ‪सिलसिले‬;<br />
‪तुम‬ भी कुछ ‪‎ले देके‬ ‪मेरे‬ क्यों नही हो जाते?Upload to Facebook
    चल रहे हैं इस ‪‎दौर में ‪रिश्वतों‬ के ‪सिलसिले‬;
    ‪तुम‬ भी कुछ ‪‎ले देके‬ ‪मेरे‬ क्यों नही हो जाते?
  • हम तो जी रहे थे उनका नाम लेकर;<br />
वो गुज़रते थे हमारा सलाम लेकर;<br />
कल वो कह गए भुला दो हमको;<br />
हमने पूछा कैसे, वो चले गए हाथों मे जाम देकर।Upload to Facebook
    हम तो जी रहे थे उनका नाम लेकर;
    वो गुज़रते थे हमारा सलाम लेकर;
    कल वो कह गए भुला दो हमको;
    हमने पूछा कैसे, वो चले गए हाथों मे जाम देकर।
  • उदासी तुम पे बीतेगी तो तुम भी जान जाओगे कि,
    कितना दर्द होता है नज़र अंदाज़ करने से।
  • कुछ भी हो वो अब दिल से जुदा हो नहीं सकते;
    हम मुजरिम-ए-तौहीन-ए-वफ़ा हो नहीं सकते;

    ऐ मौज-ए-हवादिस तुझे मालूम नहीं क्या;
    हम अहल-ए-मोहब्बत हैं फ़ना हो नहीं सकते;

    इतना तो बता जाओ ख़फ़ा होने से पहले;
    वो क्या करें जो तुम से ख़फ़ा हो नहीं सकते;

    इक आप का दर है मेरी दुनिया-ए-अक़ीदत;
    ये सजदे कहीं और अदा हो नहीं सकते;

    अहबाब पे दीवाने 'असद' कैसा भरोसा;
    ये ज़हर भरे घूँट रवा हो नहीं सकते।
    ~ Asad Bhopali
  • क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता;
    आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता।
    ~ Wasim Barelvi
  • कल तेरा जिक्र हुआ महफ़िल में,<br />
और महफ़िल देर तक महकती रही।Upload to Facebook
    कल तेरा जिक्र हुआ महफ़िल में,
    और महफ़िल देर तक महकती रही।
  • एक पल का एहसास बन कर आते हो तुम;
    दूसरे ही पल ख्वाब बन कर उड़ जाते हो तुम;
    जानते हो कि लगता है डर तनहाइयों से;
    फिर भी बार बार तनहा छोड़ जाते हो तुम।
  • हम तो सोचते थे कि लफ्ज़ ही चोट करते हैं;<br />
मगर कुछ खामोशियों के ज़ख्म तो और भी गहरे निकले।Upload to Facebook
    हम तो सोचते थे कि लफ्ज़ ही चोट करते हैं;
    मगर कुछ खामोशियों के ज़ख्म तो और भी गहरे निकले।
  • वो खफा है तो कोई बात नहीं;
    इश्क मोहताज-ए-इल्त्फाक नहीं;

    दिल बुझा हो अगर तो दिन भी है रात नहीं;
    दिन हो रोशन तो रात रात नहीं;

    दिल-ए-साकी मैं तोड़ू-ए-वाइल;
    जा मुझे ख्वाइश-ए-नजात नहीं;

    ऐसी भूली है कायनात मुझे;
    जैसे मैं जिस्ब-ए-कायनात नहीं;

    पीर की बस्ती जा रही है मगर;
    सबको ये वहम है कि रात नहीं;

    मेरे लायक नहीं हयात "ख़ुमार";
    और मैं लायक-ए-हयात नहीं।
    ~ Khumar Barabankvi