ये सानेहा भी मोहब्बत में बार-हा गुज़रा;
कि उस ने हाल भी पूछा तो आँख भर आई।

शब्दार्थ:
सानेहा = घटना
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आँखों के इंतज़ार का दे कर हुनर चला गया;
चाहा था एक शख़्स को जाने किधर चला गया;
दिन की वो महफिलें गईं, रातों के रतजगे गए;
कोई समेट कर मेरे शाम-ओ-सहर चला गया।
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हमें कोई ग़म नहीं था ग़म-ए-आशिक़ी से पहले;
न थी दुश्मनी किसी से तेरी दोस्ती से पहले;
है ये मेरी बदनसीबी तेरा क्या कुसूर इसमें;
तेरे ग़म ने मार डाला मुझे ज़िन्दग़ी से पहले।
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जब प्यार नहीं है तो भुला क्यों नहीं देते;
ख़त किसलिए रखे हैं जला क्यों नहीं देते;
किस वास्ते लिखा है हथेली पे मेरा नाम;
मैं हर्फ़ ग़लत हूँ तो मिटा क्यों नहीं देते।
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कोई समझाए ये...

कोई समझाए ये क्या रंग है मैख़ाने का;
आँख साकी की उठे नाम हो पैमाने का;

गर्मी-ए-शमा का अफ़साना सुनाने वालों;
रक्स देखा नहीं तुमने अभी परवाने का;

चश्म-ए-साकी मुझे हर गम पे याद आती है;
रास्ता भूल न जाऊँ कहीं मैख़ाने का;

अब तो हर शाम गुज़रती है उसी कूचे में;
ये नतीजा हुआ ना से तेरे समझाने का;

मंज़िल-ए-ग़म से गुज़रना तो है आसाँ 'इक़बाल';
इश्क है नाम ख़ुद अपने से गुज़र जाने का।
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इब्तिदा-ए-इश्क़ है लुत्फ़-ए-शबाब आने को है;
सब्र रुख़्सत हो रहा है इज़्तिराब आने को है।

अनुवाद:
इब्तिदा-ए-इश्क़ = इश्क़ की शुरुआत
लुत्फ़-ए-शबाब = जवानी का मज़ा
इज़्तिराब = बेचैनी
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आँखों में चाहत दिल में कशिश है;
फिर क्यों ना जाने मुलाकात में बंदिश है;
मोहब्बत है हम दोनों को एक-दूसरे से;
फिर भी दिलों में ना जाने यह रंजिश क्यों है।
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दिल की हालत बताई नहीं जाती;
हमसे उनकी चाहत छुपाई नहीं जाती;
बस एक याद बची है उनके चले जाने के बाद;
हमसे तो वो याद भी दिल से निकाली नहीं जाती।
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एक बार रोये तो रोते चले गए;
दामन अश्कों से भिगोते चले गए;
जब जाम मिला बेवफाई का तो;
खुद को पैमाने में डुबोते चले गए।
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आफत की शोख़ियां हैं...

आफत की शोख़ियां हैं तुम्हारी निगाह में;
मेहशर के फितने खेलते हैं जल्वा-गाह में;

वो दुश्मनी से देखते हैं देखते तो हैं;
मैं शाद हूँ कि हूँ तो किसी कि निगाह में;

आती है बात बात मुझे याद बार बार;
कहता हूं दौड़ दौड़ के कासिद से राह में;

इस तौबा पर है नाज़ मुझे ज़ाहिद इस कदर;
जो टूट कर शरीक हूँ हाल-ए-तबाह में;

मुश्ताक इस अदा के बहुत दर्दमंद थे;
ऐ 'दाग़' तुम तो बैठ गये एक आह में।
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