इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना;
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना।
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रौशनी करता हूँ अँधेरा मिटाने के लिए;
शराब पीता हूँ मैं तुझको भुलाने के लिए;
क्यों न बन सकी तुम मेरी ज़िंदगी;
आज भी रोता हूँ सोच कर गुज़रे ज़माने के लिए।
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हम भटकते रहे थे अनजान राहों में;
रात दिन काट रहे थे यूँ ही बस आहों में;
अब तम्मना हुई है फिर से जीने की हमें;
कुछ तो बात है सनम तेरी इस निगाहों में।
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करिये तो कोशिश हमको याद करने की;
फुर्सत के लम्हे तो अपने आप मिल जायेंगे;
दिल में अगर है चाहत हमसे मिलने की;
बहाने मिलने के खुद-ब-खुद बन जायेंगे।
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शायद अभी है राख में कोई...

शायद अभी है राख में कोई शरार भी;
क्यों इंतज़ार भी है इज़्तिरार भी;

ध्यान आ गया है मर्ग-ए-दिल-ए-नामुराद का;
मिलने को मिल गया है सुकूँ भी क़रार भी;

अब ढूँढने चले हो मुसाफ़िर को दोस्तो;
हद-ए-निगाह तक न रहा जब ग़ुबार भी;

हर आस्ताँ पे नासियाफ़र्सा हैं आज वो;
जो कल न कर सके थे तेरा इन्तज़ार भी;

इक राह रुक गई तो ठिठक क्यों गई आद;
आबाद बस्तियाँ हैं पहाड़ों के पार भी।
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ख़मोशी से मुसीबत और भी संगीन होती है;
तड़प ऐ दिल तड़पने से ज़रा तस्कीन होती है।
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तू नहीं तो ज़िंदगी में और क्या रह जायेगा;
दूर तक तन्हाइयों का सिलसिला रह जायेगा;
आँखें ताज़ा मंज़रों में खो तो जायेंगी मगर;
दिल पुराने मौसमों को ढूंढ़ता रह जायेगा।
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अजनबी शहर के अजनबी रास्ते, मेरी तन्हाई पर मुस्कुराते रहे;
मैं बहुत दूर तक यूँ ही चलता रहा, तुम बहुत देर तक याद आते रहे।
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फुर्सत किसे है ज़ख्मों को सरहाने की;
निगाहें बदल जाती हैं अपने बेगानों की;
तुम भी छोड़कर चले गए हमें;
अब तम्मना न रही किसी से दिल लगाने की।
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जागती रात अकेली...

जागती रात अकेली-सी लगे;
ज़िंदगी एक पहेली-सी लगे;

रुप का रंग-महल, ये दुनिया;
एक दिन सूनी हवेली-सी लगे;

हम-कलामी तेरी ख़ुश आए उसे;
शायरी तेरी सहेली-सी लगे;

मेरी इक उम्र की साथी ये ग़ज़ल;
मुझ को हर रात नवेली-सी लगे;

रातरानी सी वो महके ख़ामोशी;
मुस्कुरादे तो चमेली-सी लगे;

फ़न की महकी हुई मेंहदी से रची;
ये बयाज़ उस की हथेली-सी लगे।
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