• मेरी ख़बर तो किसी को नहीं मगर 'अख़्तर';
    ज़माना अपने लिए होशियार कैसा है।
    ~ Akhtar Ansari
  • तेरा नज़रिया मेरे नज़रिये से अलग था शायद,<br />
तुझे वक्त गुज़ारना था और मुझे जिन्दगी।Upload to Facebook
    तेरा नज़रिया मेरे नज़रिये से अलग था शायद,
    तुझे वक्त गुज़ारना था और मुझे जिन्दगी।
  • मुझसे नफरत ही करनी है तो इरादे मजबूत रखना;<br />
जरा से भी चूक हुई तो मोहब्बत हो जायेगी।Upload to Facebook
    मुझसे नफरत ही करनी है तो इरादे मजबूत रखना;
    जरा से भी चूक हुई तो मोहब्बत हो जायेगी।
  • मिसाल इसकी कहाँ है ज़माने में,
    कि सारे खोने के ग़म पाये हमने पाने में,
    वो शक्ल पिघली तो हर शय में ढल गयी जैसे,
    अजीब बात हुई है उसे भुलाने में,
    जो मुंतज़िर ना मिला वो तो हम हैं शर्मिंदा,
    कि हमने देर लगा दी पलट के आने में।
  • हवा में फिरते हो क्या हिर्स और हवा के लिए;
    ग़ुरूर छोड़ दो ऐ ग़ाफ़िलो ख़ुदा के लिए;

    गिरा दिया है हमें किस ने चाह-ए-उल्फ़त में;
    हम आप डूबे किसी अपने आशना के लिए;

    जहाँ में चाहिए ऐवान ओ क़स्र शाहों को;
    ये एक गुम्बद-ए-गर्दूं है बस गदा के लिए;

    वो आईना है के जिस को है हाजत-ए-सीमाब;
    इक इज़्तिराब है काफ़ी दिल-ए-सफ़ा के लिए;

    तपिश से दिल का हो क्या जाने सीने में क्या हाल;
    जो तेरे तीर का रोज़न न हो हवा के लिए;

    जो हाथ आए 'ज़फ़र' ख़ाक-पा-ए-फ़ख़रूद्दीन;
    तो मैं रखूँ उसे आँखों के तूतया के लिए।
    ~ Bahadur Shah Zafar
  • पूछिये मयकशों से लुत्फ़-ए-शराब;
    ये मज़ा पाक-बाज़ क्या जाने।
    ~ Daagh Dehlvi
  • बदली सावन की कोई जब भी बरसती होगी;<br />
दिल ही दिल में वह मुझे याद तो करती होगी;<br />
ठीक से सो न सकी होगी कभी ख्यालों से मेरे;<br />
करवटें रात भर बिस्तर पे बदलती होगी।Upload to Facebook
    बदली सावन की कोई जब भी बरसती होगी;
    दिल ही दिल में वह मुझे याद तो करती होगी;
    ठीक से सो न सकी होगी कभी ख्यालों से मेरे;
    करवटें रात भर बिस्तर पे बदलती होगी।
  • उनके लबो पर देखो फिर आज मेरा नाम आया है;<br />
लेकर नाम मेरा देखो महबूब आज कितना शरमाया है;<br />
पूछे मेरी ये आँखे उनसे कि कितनी मोहब्बत है मुझसे;<br />
बोले वो पलके झुका कि मेरी हर साँस में बस तू ही समाया है।Upload to Facebook
    उनके लबो पर देखो फिर आज मेरा नाम आया है;
    लेकर नाम मेरा देखो महबूब आज कितना शरमाया है;
    पूछे मेरी ये आँखे उनसे कि कितनी मोहब्बत है मुझसे;
    बोले वो पलके झुका कि मेरी हर साँस में बस तू ही समाया है।
  • दिल जलाने की आदत उनकी आज भी नहीं गयी;
    वो आज भी फूल बगल वाली कबर पर रख जाते हैं।
  • तुम्हारे जैसे लोग जबसे मेहरबान नहीं रहे;
    तभी से ये मेरे जमीन-ओ-आसमान नहीं रहे;

    खंडहर का रूप धरने लगे है बाग शहर के;
    वो फूल-ओ-दरख्त, वो समर यहाँ नहीं रहे;

    सब अपनी अपनी सोच अपनी फिकर के असीर हैं;
    तुम्हारें शहर में मेरे मिजाज़ दा नहीं रहें;

    उसे ये गम है, शहर ने हमारी बात जान ली;
    हमें ये दुःख है उस के रंज भी निहां नहीं रहे;

    बोहत है यूँ तो मेरे इर्द-गिर्द मेरे आशना;
    तुम्हारे बाद धडकनों के राजदान नहीं रहे;

    असीर हो के रह गए हैं शहर की फिजाओं में;
    परिंदे वाकई चमन के तर्जुमान नहीं रहे।
    ~ Aitbar Sajid