• सब का तो मुदावा कर डाला अपना ही मुदावा कर न सके;
    सब के तो गिरेबाँ सी डाले अपना ही गिरेबाँ भूल गए।
    ~ Asrar ul Haq Majaz
  • प्यार की तरह आधा अधूरा सा अल्फाज था मैं;<br />
तुमसे क्या जुडा ज़िंदगी की तरह पूरी गजल बन गया।Upload to Facebook
    प्यार की तरह आधा अधूरा सा अल्फाज था मैं;
    तुमसे क्या जुडा ज़िंदगी की तरह पूरी गजल बन गया।
  • दिल को आता है जब भी ख्याल उनका;
    तस्वीर से पूछते हैं फिर हाल उनका;
    वो कभी हमसे पूछा करते थे जुदाई क्या है; आज समझ आया है हमें सवाल उनका।
  • यादें आँसू होती तो छलक जाती;<br />
यादें लिखावट होती तो मिट जाती;<br />
यादें तो जिंदगी में बसा वो एहसास हैं;<br />
जो लाख कोशिश के बाद भी लफ़्ज़ों में बयान नहीं होती।Upload to Facebook
    यादें आँसू होती तो छलक जाती;
    यादें लिखावट होती तो मिट जाती;
    यादें तो जिंदगी में बसा वो एहसास हैं;
    जो लाख कोशिश के बाद भी लफ़्ज़ों में बयान नहीं होती।
  • माने जो कोई बात, तो एक बात बहुत है;
    सदियों के लिए पल की मुलाक़ात बहुत है;

    दिन भीड़ के पर्दे में छुपा लेगा हर एक बात;
    ऐसे में न जाओ, कि अभी रात बहुत है;

    महीने में किसी रोज़, कहीं चाय के दो कप;
    इतना है अगर साथ, तो फिर साथ बहुत है;

    रसमन ही सही, तुमने चलो ख़ैरियत पूछी;
    इस दौर में अब इतनी मदारात बहुत है;

    दुनिया के मुक़द्दर की लक़ीरों को पढ़ें हम;
    कहते है कि मज़दूर का बस हाथ बहुत है;

    फिर तुमको पुकारूँगा कभी कोहे 'अना' से;
    ऐ दोस्त अभी गर्मी-ए-हालात बहुत है।
    ~ Ana Qasimi
  • क्यों हिज्र के शिकवे करता है क्यों दर्द के रोने रोता है;
    अब इश्क़ किया तो सब्र भी कर इस में तो यही कुछ होता है।
    ~ Hafeez Jalandhari
  • मेरी यादों में तुम हो, या मुझ में ही तुम हो;<br />
मेरे खयालों में तुम हो, या मेरा ख़याल ही तुम हो।Upload to Facebook
    मेरी यादों में तुम हो, या मुझ में ही तुम हो;
    मेरे खयालों में तुम हो, या मेरा ख़याल ही तुम हो।
  • दावे मोहब्बत के मुझे नहीं आते यारो;<br />
एक जान है जब दिल चाहे माँग लेना।Upload to Facebook
    दावे मोहब्बत के मुझे नहीं आते यारो;
    एक जान है जब दिल चाहे माँग लेना।
  • कब तक रह पाओगे आखिर यूँ दूर हम से;
    मिलना पड़ेगा आखिर कभी ज़रूर हम से;
    नज़रें चुराने वाले ये बेरुखी है कैसी;
    कह दो अगर हुआ है कोई कसूर हम से।
  • मोहब्बत करने वालों के बहार-अफ़रोज़ सीनों में;
    रहा करती है शादाबी ख़ज़ाँ के भी महीनों में;

    ज़िया-ए-महर आँखों में है तौबा मह-जबीनों में;
    के फ़ितरत ने भरा है हुस्न ख़ुद अपना हसीनों में;

    हवा-ए-तुंद है गर्दाब है पुर-शोर धारा है;
    लिए जाते हैं ज़ौक-ए-आफ़ियत सी शय सफीनों में;

    मैं उन में हूँ जो हो कर आस्ताँ-ए-दोस्त से महरूम;
    लिए फिरते हैं सजदों की तड़प अपनी जबीनों में;

    मेरी ग़ज़लें पढ़ें सब अहल-ए-दिल और मस्त हो जाएँ;
    मय-ए-जज़्बात लाया हूँ मैं लफ़्ज़ी आब-गीनों में।