• क्या मज़ा देती है बिजली की चमक मुझ को रियाज़;
    मुझ से लिपटे हैं मिरे नाम से डरने वाले।
    ~ Riyaz Khairabadi
  • लोग तो बेवजह ही खरीदते हैं आईने;<br />
आँखें बंद करके भी अपनी हकीकत जानी जा सकती है।Upload to Facebook
    लोग तो बेवजह ही खरीदते हैं आईने;
    आँखें बंद करके भी अपनी हकीकत जानी जा सकती है।
  • मैं थोड़ी देर तक बैठा रहा उसकी आँखों के मैखाने में;<br />
दुनिया मुझे आज तक नशे का आदि समझती है।Upload to Facebook
    मैं थोड़ी देर तक बैठा रहा उसकी आँखों के मैखाने में;
    दुनिया मुझे आज तक नशे का आदि समझती है।
  • निकलता नहीं है कोई दिल में बस जाने के बाद;
    दिल दुखता है बिछड़ जाने के बाद;
    पास जो होता है तो क़दर नहीं होती उसकी;
    महसूस होती है कमी उनके दूर जाने के बाद।
  • कितने ऐश उड़ाते होंगे कितने इतराते होंगे;
    जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे;

    उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा;
    यूँ ही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे;

    बंद रहे जिन का दरवाज़ा ऐसे घरों की मत पूछो;
    दीवारें गिर जाती होंगी आँगन रह जाते होंगे;

    मेरी साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएंगे;
    यानी मेरे बाद भी यानी साँस लिये जाते होंगे;

    यारो कुछ तो बात बताओ उस की क़यामत बाहों की;
    वो जो सिमटते होंगे इन में वो तो मर जाते होंगे।
    ~ Jon Elia
  • ख़ंजर चले किसी पे तड़पते हैं हम 'अमीर';
    सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है।
    ~ Ameer Minai
  • कोई मुझ से पूछ बैठा `बदलना` किसे कहते हैं?<br />
सोच में पड़ गया हूँ मिसाल किस की दूँ?<br />
`मौसम` की या `अपनों` की।Upload to Facebook
    कोई मुझ से पूछ बैठा "बदलना" किसे कहते हैं?
    सोच में पड़ गया हूँ मिसाल किस की दूँ?
    "मौसम" की या "अपनों" की।
  • वो खुद पर गरूर करते है, तो इसमें हैरत की कोई बात नहीं;
    जिन्हें हम चाहते है, वो आम हो ही नहीं सकते।
  • उसकी मोहब्बत का सिलसिला भी क्या अजीब सिलसिला था;<br />
अपना भी नहीं बनाया और किसी का होने भी नहीं दिया।Upload to Facebook
    उसकी मोहब्बत का सिलसिला भी क्या अजीब सिलसिला था;
    अपना भी नहीं बनाया और किसी का होने भी नहीं दिया।
  • समुंदर में उतरता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं;
    तिरी आँखों को पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं;

    तुम्हारा नाम लिखने की इजाज़त छिन गई जब से;
    कोई भी लफ़्ज़ लिखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं;

    तिरी यादों की ख़ुशबू खिड़कियों में रक़्स करती है;
    तिरे ग़म में सुलगता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं;

    न जाने हो गया हूँ इस क़दर हस्सास मैं कब से;
    किसी से बात करता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं;

    हज़ारों मौसमों की हुक्मरानी है मिरे दिल पर;
    'वसी' मैं जब भी हँसता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं।
    ~ Syed Wasi Shah