मुझे शिकवा नहीं कुछ बेवफ़ाई का तेरी हरगिज़;
गिला तब हो अगर तू ने किसी से भी निभाई हो।
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दिल के लुट जाने का इज़हार ज़रूरी तो नहीं;
यह तमाशा सरे बाजार ज़रूरी तो नहीं;
मुझे था इश्क़ तेरी रूह से और अब भी है;
जिस्म से कोई सरोकार ज़रूरी तो नहीं।
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उन्हें एहसास हुआ है इश्क़ का हमें रुलाने के बाद;
अब हम पर प्यार आया है दूर चले जाने के बाद;
क्या बताएं किस कदर बेवफ़ा है यह दुनिया;
यहाँ लोग भूल जाते ही किसी को दफनाने के बाद।
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उसकी याद में हम बरसों रोते रहे;
बेवफ़ा वो निकले बदनाम हम होते रहे;
प्यार में मदहोशी का आलम तो देखिये;
धूल चेहरे पे थी और हम आईना साफ़ करते रहे।
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मेरे क़ाबू में न...

मेरे क़ाबू में न पहरों दिल-ए-नाशाद आया;
वो मेरा भूलने वाला जो मुझे याद आया;

दी मुअज्जिन ने शब-ए-वस्ल अज़ान पिछली रात;
हाए कम-बख्त के किस वक्त ख़ुदा याद आया;

लीजिए सुनिए अब अफ़साना-ए-फुर्कत मुझ से;
आप ने याद दिलाया तो मुझे याद आया;

आप की महिफ़ल में सभी कुछ है मगर 'दाग़' नहीं'
मुझ को वो ख़ाना-ख़राब आज बहुत याद आया।
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किस फ़िक्र किस ख्याल में खोया हुआ सा है;
दिल आज तेरी याद को भूला हुआ सा है;
गुलशन में इस तरह कब आई थी फसल-ए-गुल;
हर फूल अपनी शाख से टूटा हुआ सा है।

शब्दार्थ:
फसल-ए-गुल = बहार का मौसम
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दुःख में ख़ुशी की वजह बनती है मोहब्बत;
दर्द में यादों की वजह बनती है मोहब्बत;
जब कुछ भी अच्छा ना लगे हमें दुनिया में;
तब हमारे जीने की वजह बनती है मोहब्बत।
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तन्हाई मेरे दिल में समाती चली गयी;
किस्मत भी अपना खेल दिखाती चली गयी;
महकती फ़िज़ा की खुशबू में जो देखा प्यार को;
बस याद उनकी आई और रुलाती चली गयी।
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मोहब्बत का मेरा यह सफर आख़िरी है;
ये कागज, ये कलम, ये गजल आख़िरी है;
फिर ना मिलेंगे अब तुमसे हम कभी;
क्योंकि तेरे दर्द का अब ये सितम आख़िरी है।
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कुछ हिज्र के मौसम...

कुछ हिज्र के मौसम ने सताया नहीं इतना;
कुछ हम ने तेरा सोग मनाया नहीं इतना;

कुछ तेरी जुदाई की अज़िय्यत भी कड़ी थी;
कुछ दिल ने भी ग़म तेरा मनाया नहीं इतना;

क्यों सब की तरह भीग गई हैं तेरी पलकें;
हम ने तो तुझे हाल सुनाया नहीं इतना;

कुछ रोज़ से दिल ने तेरी राहें नहीं देखीं;
क्या बात है तू याद भी आया नहीं इतना;

क्या जानिए इस बे-सर-ओ-सामानी-ए-दिल ने;
पहले तो कभी हम को रुलाया नहीं इतना।
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