• पानी पानी कर गयी मुझको कलंदर की वो बात;<br/>
तू झुका जो ग़ैर के आगे न तन तेरा न मन तेरा!
    पानी पानी कर गयी मुझको कलंदर की वो बात;
    तू झुका जो ग़ैर के आगे न तन तेरा न मन तेरा!
    ~ Allama Iqbal
  • हम तेरी धुन मैं परेशान ज़िन्दगी-ऐ-ज़िन्दगी;<br/>
और तू हम से गुरेजा ज़िन्दगी-ऐ-ज़िन्दगी;<br/>
तू कहीं साकी गली में खो गयी है और यहाँ;<br/>
डंस गया इंसान को इंसान ज़िन्दगी-ऐ-ज़िन्दगी!
    हम तेरी धुन मैं परेशान ज़िन्दगी-ऐ-ज़िन्दगी;
    और तू हम से गुरेजा ज़िन्दगी-ऐ-ज़िन्दगी;
    तू कहीं साकी गली में खो गयी है और यहाँ;
    डंस गया इंसान को इंसान ज़िन्दगी-ऐ-ज़िन्दगी!
  • गज़ब किया जो तेरे वादे पे एतबार किया;<br/>
तमाम रात हमने क़यामत का इंतज़ार किया;<br/>
न पूछ दिल की हक़ीक़त मगर यह कहतें है;<br/>
वो बेक़रार रहे जिसने बेक़रार किया!
    गज़ब किया जो तेरे वादे पे एतबार किया;
    तमाम रात हमने क़यामत का इंतज़ार किया;
    न पूछ दिल की हक़ीक़त मगर यह कहतें है;
    वो बेक़रार रहे जिसने बेक़रार किया!
    ~ Daagh Dehlvi
  • ऐसा नहीं देखा कहीं हाल किसी और का;<br/>
पहलू में कोई और ख्याल और किसी का!
    ऐसा नहीं देखा कहीं हाल किसी और का;
    पहलू में कोई और ख्याल और किसी का!
  • फूल की पती से कट सकता है हीरे का जिगर;<br/>
मर्दे नादाँ पर कलाम-ऐ-नरम-ऐ-नाज़ुक बेअसर!
    फूल की पती से कट सकता है हीरे का जिगर;
    मर्दे नादाँ पर कलाम-ऐ-नरम-ऐ-नाज़ुक बेअसर!
  • कहा से सीखें हुनर उसे मानाने का;<br/>
कोई जवाज़ न था उस के रूठ जाने का;<br/>
हर बात में सजा भी मुझे ही मिलनी थी;<br/>
के जुर्म मैंने किया था उनसे दिल लगाने का!
    कहा से सीखें हुनर उसे मानाने का;
    कोई जवाज़ न था उस के रूठ जाने का;
    हर बात में सजा भी मुझे ही मिलनी थी;
    के जुर्म मैंने किया था उनसे दिल लगाने का!
  • मैं नादान था जो वफ़ा को तलाश करता रहा ग़ालिब;<br/>
यह न सोचा के एक दिन अपनी साँस भी बेवफा हो जाएगी!
    मैं नादान था जो वफ़ा को तलाश करता रहा ग़ालिब;
    यह न सोचा के एक दिन अपनी साँस भी बेवफा हो जाएगी!
    ~ Mirza Ghalib
  • खुशबू की तरह आया वो तेज़ हवाओं में;<br/>
माँगा था जिसे हम ने दिन रात दुआओं में;<br/> 
तुम चाट पे नहीं आये मैं घर से नहीं निकल;<br/>
यह चाँद बहुत भटकता है सावन की घटाओं में!
    खुशबू की तरह आया वो तेज़ हवाओं में;
    माँगा था जिसे हम ने दिन रात दुआओं में;
    तुम चाट पे नहीं आये मैं घर से नहीं निकल;
    यह चाँद बहुत भटकता है सावन की घटाओं में!
  • बहुत मुश्किल से सुलाया था खुद को `फ़राज़` मैंने आज;<br/>
अपनी आँखों को तेरे ख्वाब का लालच दे कर!
    बहुत मुश्किल से सुलाया था खुद को `फ़राज़` मैंने आज;
    अपनी आँखों को तेरे ख्वाब का लालच दे कर!
    ~ Ahmad Faraz
  • तेरा ज़िक्र मेरी हर बात मैं है;<br/>
तुम पास नहीं पर साथ में है;<br/>
मैं तुझसे बिछड़ कर जाऊं कहाँ;<br/>
तेरा इश्क़ तो मेरी जात में है!
    तेरा ज़िक्र मेरी हर बात मैं है;
    तुम पास नहीं पर साथ में है;
    मैं तुझसे बिछड़ कर जाऊं कहाँ;
    तेरा इश्क़ तो मेरी जात में है!