इश्क़ फिर वो रंग लाया है कि जी जाने है;
दिल का ये रंग बनाया है कि जी जाने है;
नाज़ उठाने में जफ़ाएं तो उठाई लेकिन;
लुत्फ़ भी ऐसा उठाया है कि जी जाने है।
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मैं तेरे प्यार में इतना ग़ुम होने लगा हूँ;
जहाँ भी जाऊं बस तुम्हें ही सामने पाने लगा हूँ;
हालात यह हैं कि हर चेहरे में तू ही तू दिखता है;
ऐ मेरे खुदा अब तो मैं खुद को भी भुलाने लगा हूँ।
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कहाँ से लाऊँ हुनर उसे मनाने का;
कोई जवाब नहीं था उसके रूठ जाने का;
मोहब्बत में सजा मुझे ही मिलनी थी;
क्योंकि जुर्म मेरा था उनसे दिल लगाने का।
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प्यार किसी से जितना किया रुस्वाई ही मिली है;
वफ़ा चाहे जितनी भी की बेवफाई ही मिली है;
जितना भी किसी को अपना बना कर देखा;
जब आँख खुली तो तन्हाई ही मिली है।
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आज किसी ने बातों बातों में...

आज किसी ने बातों बातों में, जब उन का नाम लिया;
दिल ने जैसे ठोकर खाई, दर्द ने बढ़कर थाम लिया;

घर से दामन झाड़ के निकले, वहशत का सामान न पूछ;
यानी गर्द-ए-राह से हमने, रख़्त-ए-सफ़र का काम लिया;

दीवारों के साये-साये, उम्र बिताई दीवाने;
मुफ़्त में तनासानि-ए-ग़म का अपने पर इल्ज़ाम लिया;

राह-ए-तलब में चलते चलते, थक के जब हम चूर हुए;
ज़ुल्फ़ की ठंडी छांव में बैठे, पल दो पल आराम लिया;

होंठ जलें या सीना सुलगे, कोई तरस कब खाता है;
जाम उसी का जिसने 'ताबाँ', जुर्रत से कुछ काम लिया।
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मुझे शिकवा नहीं कुछ बेवफ़ाई का तेरी हरगिज़;
गिला तब हो अगर तू ने किसी से भी निभाई हो।
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दिल के लुट जाने का इज़हार ज़रूरी तो नहीं;
यह तमाशा सरे बाजार ज़रूरी तो नहीं;
मुझे था इश्क़ तेरी रूह से और अब भी है;
जिस्म से कोई सरोकार ज़रूरी तो नहीं।
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उन्हें एहसास हुआ है इश्क़ का हमें रुलाने के बाद;
अब हम पर प्यार आया है दूर चले जाने के बाद;
क्या बताएं किस कदर बेवफ़ा है यह दुनिया;
यहाँ लोग भूल जाते ही किसी को दफनाने के बाद।
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उसकी याद में हम बरसों रोते रहे;
बेवफ़ा वो निकले बदनाम हम होते रहे;
प्यार में मदहोशी का आलम तो देखिये;
धूल चेहरे पे थी और हम आईना साफ़ करते रहे।
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मेरे क़ाबू में न...

मेरे क़ाबू में न पहरों दिल-ए-नाशाद आया;
वो मेरा भूलने वाला जो मुझे याद आया;

दी मुअज्जिन ने शब-ए-वस्ल अज़ान पिछली रात;
हाए कम-बख्त के किस वक्त ख़ुदा याद आया;

लीजिए सुनिए अब अफ़साना-ए-फुर्कत मुझ से;
आप ने याद दिलाया तो मुझे याद आया;

आप की महिफ़ल में सभी कुछ है मगर 'दाग़' नहीं'
मुझ को वो ख़ाना-ख़राब आज बहुत याद आया।
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