• तेरी दुआ से कज़ा तो बदल नहीं सकती;
    मगर है इस से यह मुमकिन कि तू बदल जाये; तेरी दुआ है कि हो तेरी आरज़ू पूरी;
    मेरी दुआ है तेरी आरज़ू बदल जाये।

    शब्दार्थ:
    कज़ा - भाग्य
    ~ Allama Iqbal
  • ना जाने क्या सोच कर लहरें साहिल से टकराती हैं;<br />
और फिर समंदर में लौट जाती हैं;<br />
समझ नहीं आता कि किनारों से बेवफाई करती हैं;<br />
या फिर लौट कर समंदर से वफ़ा निभाती हैं।Upload to Facebook
    ना जाने क्या सोच कर लहरें साहिल से टकराती हैं;
    और फिर समंदर में लौट जाती हैं;
    समझ नहीं आता कि किनारों से बेवफाई करती हैं;
    या फिर लौट कर समंदर से वफ़ा निभाती हैं।
  • इश्क़ करने में नही पूछी जाती जात मोहबत की;<br />
चलो कुछ तो है दुनिया में जो मज़हबी नहीं हुआ।Upload to Facebook
    इश्क़ करने में नही पूछी जाती जात मोहबत की;
    चलो कुछ तो है दुनिया में जो मज़हबी नहीं हुआ।
  • क्यों जुड़ता है तू इस जहान से,
    एक दिन ये गुज़र ही जायेगा;
    चाहे कितना भी समेट ले तू इस जहान को,
    मुट्ठी से तो एक दिन फिसल ही जायेगा।
  • भड़का रहे हैं आग...

    भड़का रहे हैं आग लब-ए-नग़्मागार से हम;
    ख़ामोश क्या रहेंगे ज़माने के डर से हम;

    कुछ और बड़ गए अंधेरे तो क्या हुआ;
    मायूस तो नहीं हैं तुलु-ए-सहर से हम;

    ले दे के अपने पास फ़क़त एक नज़र तो है;
    क्यों देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम

    माना कि इस ज़मीं को न गुलज़ार कर सके;
    कुछ ख़ार कम कर गए गुज़रे जिधर से हम।
    ~ Sahir Ludhianvi
  • हमें क्या पता था, मौसम ऐसे रो पड़ेगा;<br />
हमने तो आसमां को बस अपनी दास्ताँ सुनाई थी।Upload to Facebook
    हमें क्या पता था, मौसम ऐसे रो पड़ेगा;
    हमने तो आसमां को बस अपनी दास्ताँ सुनाई थी।
  • कभी खुशी भी मिले हरपल गम अच्छा नहीं लगता हसीन<br />
कितना भी हो हमेशा एक जैंसा मौसम अच्छा नहीं लगता!Upload to Facebook
    कभी खुशी भी मिले हरपल गम अच्छा नहीं लगता हसीन
    कितना भी हो हमेशा एक जैंसा मौसम अच्छा नहीं लगता!
  • मजबूरियॉ ओढ के निकलता हूं घर से आजकल, <br />
वरना शौक तो आज भी है बारिशों में भीगनें काUpload to Facebook
    मजबूरियॉ ओढ के निकलता हूं घर से आजकल,
    वरना शौक तो आज भी है बारिशों में भीगनें का
  • मेरा यही अंदाज इस जमाने को खलता है;
    कि इतना पीने के बाद भी सीधा कैसे चलता है!
  • खुलेगी इस नज़र पे चश्म-ए-तर आहिस्ता आहिस्ता;
    किया जाता है पानी में सफ़र आहिस्ता आहिस्ता;
    कोई ज़ंजीर फिर वापस वहीं पर ले के आती है;
    कठिन हो राह तो छूटता है घर आहिस्ता आहिस्ता।
    ~ Parveen Shakir