अब आएं या न आएं इधर पूछते चलो;
क्या चाहती है उनकी नज़र पूछते चलो;
हम से अगर है तर्क-ए-ताल्लुक तो क्या हुआ;
यारो कोई तो उनकी ख़बर पूछते चलो।

शब्दार्थ:
तर्क-ए-ताल्लुक = टूटा हुआ रिश्ता
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मुद्दत से कोई शख्स रुलाने नहीं आया;
जलती हुई आँखों को बुझाने नहीं आया;
जो कहता था कि रहेंगे उम्र भर साथ तेरे;
अब रूठे हैं तो कोई मनाने नहीं आया।
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वफ़ा में अब यह हुनर इख़्तियार करना है;
वो सच कहें या ना कहें बस ऐतबार करना है;
यह तुझको जागते रहने का शौंक कबसे हो गया;
मुझे तो खैर बस तेरा इंतज़ार करना है।
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तुम ने चाहा ही नहीं हालात बदल सकते थे;
तेरे आाँसू मेरी आँखों से निकल सकते थे;
तुम तो ठहरे रहे झील के पानी की तरह;
दरिया बनते तो बहुत दूर निकल सकते थे।
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ये आरज़ू थी...

ये आरज़ू थी तुझे गुल के रूबरू करते;
हम और बुलबुल-ए-बेताब गुफ़्तगू करते;

पयाम बर न मयस्सर हुआ तो ख़ूब हुआ;
ज़बान-ए-ग़ैर से क्या शर की आरज़ू करते;

मेरी तरह से माह-ओ-महर भी हैं आवारा;
किसी हबीब को ये भी हैं जुस्तजू करते;

जो देखते तेरी ज़ंजीर-ए-ज़ुल्फ़ का आलम;
असीर होने के आज़ाद आरज़ू करते;

न पूछ आलम-ए-बरगश्ता तालि-ए-'आतिश';
बरसती आग में जो बाराँ की आरज़ू करते।
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कोई 'अनीस' कोई आश्ना नहीं रखते;
किसी आस बग़ैर अज खुदा नहीं रखते;
किसी को क्या हो दिलों की शिकस्तगी की खबर;
कि टूटने में यह दिल सदा नहीं रखते।

शब्दार्थ:
शिकस्तगी = उदासी
सदा = आवाज़
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फ़िज़ा में महकती शाम हो तुम;
प्यार में झलकता जाम हो तुम;
सीने में छुपाये फिरते हैं चाहत तुम्हारी;
तभी तो मेरी ज़िंदगी का दूसरा नाम हो तुम।
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मोहब्बत हर इंसान को आज़माती है;
किसी से रूठ जाती है किसी पे मुस्कुराती है;
यह मोहब्बत का खेल ही कुछ ऐसा है;
किसी का कुछ नहीं जाता और किसी की जान चली जाती है।
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अगर मैं हद से गुज़र जाऊं तो मुझे माफ़ करना;
तेरे दिल में उतर जाऊं तो मुझे माफ़ करना;
रात में तुझे तेरे दीदार की खातिर;
अगर मैं सब कुछ भूल जाऊं तो मुझे माफ़ करना।
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जागती रात अकेली-सी लगे;
ज़िंदगी एक पहेली-सी लगे;

रुप का रंग-महल, ये दुनिया;
एक दिन सूनी हवेली-सी लगे;

हम-कलामी तेरी ख़ुश आए उसे;
शायरी तेरी सहेली-सी लगे;

मेरी इक उम्र की साथी ये ग़ज़ल;
मुझ को हर रात नवेली-सी लगे;

रातरानी सी वो महके ख़ामोशी;
मुस्कुरादे तो चमेली-सी लगे;

फ़न की महकी हुई मेंहदी से रची;
ये बयाज़ उस की हथेली-सी लगे।
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