मालूम है दुनिया को ये 'हसरत' की हक़ीक़त;
ख़ल्वत में वो मय-ख़्वार है जल्वत में नमाज़ी।
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हर पल कुछ सोचते रहने की आदत गयी है;
हर आहट पे च चौंक जाने की आदत हो गयी है;
तेरे इश्क़ में ऐ बेवफा, हिज्र की रातों के संग;
हमको भी जागते रहने की आदत हो गयी है।
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ऐ आशिक तू सोच तेरा क्या होगा;
क्योंकि हशर की परवाह मैं नहीं करता;
फनाह होना तो रिवायत है तेरी;
इश्क़ नाम है मेरा मैं नहीं मरता।
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आज उसने एक और दर्द दिया तो खुदा याद आया;
कि हमने भी दुआओं में उसके सारे दर्द माँगे थे।
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अज़ाब ये भी किसी...

अज़ाब ये भी किसी और पर नहीं आया;
कि एक उम्र चले और घर नहीं आया;

इस एक ख़्वाब की हसरत में जल बुझीं आँखें;
वो एक ख़्वाब कि अब तक नज़र नहीं आया;

करें तो किस से करें ना-रसाइयों का गिला;
सफ़र तमाम हुआ हम-सफ़र नहीं आया;

दिलों की बात बदन की ज़बाँ से कह देते;
ये चाहते थे मगर दिल इधर नहीं आया;

अजीब ही था मेरे दौर-ए-गुमरही का रफ़ीक़;
बिछड़ गया तो कभी लौट कर नहीं आया;

हरीम-ए-लफ़्ज़-ओ-मआनी से निस्बतें भी रहीं;
मगर सलीक़ा-ए-अर्ज़-ए-हुनर नहीं आया।
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आग़ाज़-ए-मोहब्बत का अंजाम बस इतना है;
जब दिल में तमन्ना थी अब दिल ही तमन्ना है।
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जुदा होकर भी सताने से बाज़ नहीं आते;
दूर रहकर भी वो दिल जलाने से बाज़ नहीं आते;
हम तो भूलना चाहते हैं हर एक याद उनकी;
मगर वो ख्वाबों में आने से भी बाज़ नहीं आते।
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महकता हुआ जिस्म तेरा गुलाब जैसा है;
नींद के सफर में तू एक ख्वाब जैसा है;
दो घूँट पी लेने दे आँखों के इस प्याले से;
नशा तेरी आँखों का शराब के जाम जैसा है।
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दिल के किसी कोने में अब कोई जगह नहीं ऐ सनम;
कि तस्वीर हमने हर तरफ तेरी ही लगा रखी है।
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ख़ातिर से तेरी याद को...

ख़ातिर से तेरी याद को टलने नहीं देते;
सच है कि हम ही दिल को संभलने नहीं देते;

आँखें मुझे तलवों से वो मलने नहीं देते;
अरमान मेरे दिल का निकलने नहीं देते;

किस नाज़ से कहते हैं वो झुंझला के शब-ए-वस्ल;
तुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते;

परवानों ने फ़ानूस को देखा तो ये बोले;
क्यों हम को जलाते हो कि जलने नहीं देते;

हैरान हूँ किस तरह करूँ अर्ज़-ए-तमन्ना;
दुश्मन को तो पहलू से वो टलने नहीं देते;

दिल वो है कि फ़रियाद से लबरेज़ है हर वक़्त;
हम वो हैं कि कुछ मुँह से निकलने नहीं देते।
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