• पहले शराब ज़ीस्त थी अब ज़ीस्त है शराब,<br/>
कोई पिला रहा है पिए जा रहा हूँ मैं।Upload to Facebook
    पहले शराब ज़ीस्त थी अब ज़ीस्त है शराब,
    कोई पिला रहा है पिए जा रहा हूँ मैं।
    ~ Jigar Moradabadi
  • तलाश में बीत गयी सारी ज़िंदगानी ए दिल,<br/>
अब समझा कि खुद से बड़ा कोई हमसफ़र नहीं होता।Upload to Facebook
    तलाश में बीत गयी सारी ज़िंदगानी ए दिल,
    अब समझा कि खुद से बड़ा कोई हमसफ़र नहीं होता।
  • अगर तुम्हें यकीन नहीं तो कहने को कुछ नहीं मेरे पास,<br/>
अगर तुम्हें यकीन हैं तो मुझे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं।Upload to Facebook
    अगर तुम्हें यकीन नहीं तो कहने को कुछ नहीं मेरे पास,
    अगर तुम्हें यकीन हैं तो मुझे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं।
  • हम उनके दिल पर राज़ करते थे,<br/>
मेरा दिल जिनका गुलाम आज भी है।Upload to Facebook
    हम उनके दिल पर राज़ करते थे,
    मेरा दिल जिनका गुलाम आज भी है।
  • हम को जुनूँ क्या सिखलाते हो हम थे परेशाँ तुमसे ज्यादा,
    चाक किये हैं हमने अज़ीज़ों चार गरेबाँ तुमसे ज्यादा;

    चाक-ए-जिगर मुहताज-ए-रफ़ू है आज तो दामन सिर्फ़ लहू है,
    एक मौसम था हम को रहा है शौक़-ए-बहाराँ तुमसे ज्यादा;

    जाओ तुम अपनी बाम की ख़ातिर सारी लवें शमों की कतर लो,
    ज़ख़्मों के महर-ओ-माह सलामत जश्न-ए-चिराग़ाँ तुमसे ज्यादा;

    ज़ंजीर-ओ-दीवार ही देखी तुमने तो "मजरूह" मगर हम,
    कूचा-कूचा देख रहे हैं आलम-ए-ज़िंदाँ तुमसे ज्यादा।
    ~ Majrooh Sultanpuri
  • अब जिस तरफ़ से चाहे गुज़र जाए कारवाँ,<br/>
वीरानियाँ तो सब मेरे दिल में उतर गईं।Upload to Facebook
    अब जिस तरफ़ से चाहे गुज़र जाए कारवाँ,
    वीरानियाँ तो सब मेरे दिल में उतर गईं।
    ~ Kaifi Azmi
  • ये नज़र चुराने की आदत आज भी नहीं बदली उनकी,<br/>
कभी मेरे लिए ज़माने से और अब ज़माने के लिए हमसे।
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    ये नज़र चुराने की आदत आज भी नहीं बदली उनकी,
    कभी मेरे लिए ज़माने से और अब ज़माने के लिए हमसे।
  • काश कोई मिले इस तरह के फिर जुदा ना हो,<br/>
वो समझे मेरे मिज़ाज़ को और कभी खफा ना हो।Upload to Facebook
    काश कोई मिले इस तरह के फिर जुदा ना हो,
    वो समझे मेरे मिज़ाज़ को और कभी खफा ना हो।
  • ये कैसी जुदाई है आँख मेरी भर आई है,<br/>
सावन की हर एक बरसती बूंद में तेरी ही परछाईं है,<br/>
इस हसीन मौसम में फिर क्यों ये जुदाई है।Upload to Facebook
    ये कैसी जुदाई है आँख मेरी भर आई है,
    सावन की हर एक बरसती बूंद में तेरी ही परछाईं है,
    इस हसीन मौसम में फिर क्यों ये जुदाई है।
  • न आते हमें इसमें तकरार क्या थी,
    मगर वादा करते हुए आर क्या थी;

    तुम्हारे पयामी ने ख़ुद राज़ खोला,
    ख़ता इसमें बन्दे की सरकार क्या थी;

    भरी बज़्म में अपने आशिक़ को ताड़ा,
    तेरी आँख मस्ती में होशियार क्या थी;

    तअम्मुल तो था उनको आने में क़ासिद,
    मगर ये बता तर्ज़े-इन्कार क्या थी;

    खिंचे ख़ुद-ब-ख़ुद जानिबे-तूर मूसा,
    कशिश तेरी ऐ शौक़े-दीदाए क्या थी;

    कहीं ज़िक्र रहता है इक़बाल तेरा,
    फ़ुसूँ था कोई तेरी गुफ़्तार क्या थी।
    ~ Allama Iqbal