• क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता;
    आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता।
    ~ Wasim Barelvi
  • कल तेरा जिक्र हुआ महफ़िल में,<br />
और महफ़िल देर तक महकती रही।Upload to Facebook
    कल तेरा जिक्र हुआ महफ़िल में,
    और महफ़िल देर तक महकती रही।
  • एक पल का एहसास बन कर आते हो तुम;
    दूसरे ही पल ख्वाब बन कर उड़ जाते हो तुम;
    जानते हो कि लगता है डर तनहाइयों से;
    फिर भी बार बार तनहा छोड़ जाते हो तुम।
  • हम तो सोचते थे कि लफ्ज़ ही चोट करते हैं;<br />
मगर कुछ खामोशियों के ज़ख्म तो और भी गहरे निकले।Upload to Facebook
    हम तो सोचते थे कि लफ्ज़ ही चोट करते हैं;
    मगर कुछ खामोशियों के ज़ख्म तो और भी गहरे निकले।
  • वो खफा है तो कोई बात नहीं;
    इश्क मोहताज-ए-इल्त्फाक नहीं;

    दिल बुझा हो अगर तो दिन भी है रात नहीं;
    दिन हो रोशन तो रात रात नहीं;

    दिल-ए-साकी मैं तोड़ू-ए-वाइल;
    जा मुझे ख्वाइश-ए-नजात नहीं;

    ऐसी भूली है कायनात मुझे;
    जैसे मैं जिस्ब-ए-कायनात नहीं;

    पीर की बस्ती जा रही है मगर;
    सबको ये वहम है कि रात नहीं;

    मेरे लायक नहीं हयात "ख़ुमार";
    और मैं लायक-ए-हयात नहीं।
    ~ Khumar Barabankvi
  • तेरे बगैर भी तो ग़नीमत है ज़िन्दगी;
    खुद को गँवा कर कौन तेरी जुस्त-जू करे।
    ~ Ahmad Faraz
  • दर्द से हम अब खेलना सीख गए;<br />
बेवफाई के साथ अब हम जीना सीख गए;<br />
क्या बतायें किस कदर दिल टूटा है हमारा;<br />
मौत से पहले हम कफ़न ओढ़ कर सोना सीख गए।  Upload to Facebook
    दर्द से हम अब खेलना सीख गए;
    बेवफाई के साथ अब हम जीना सीख गए;
    क्या बतायें किस कदर दिल टूटा है हमारा;
    मौत से पहले हम कफ़न ओढ़ कर सोना सीख गए।
  • ऐ काश कुदरत का कहीं ये नियम हुआ करे,<br />
तुझे देखने के सिवा ना मुझे कोई काम हुआ करे।Upload to Facebook
    ऐ काश कुदरत का कहीं ये नियम हुआ करे,
    तुझे देखने के सिवा ना मुझे कोई काम हुआ करे।
  • तेरी याद में ज़रा आँखें भिगो लूँ;
    उदास रात की तन्हाई में सो लूँ;
    अकेले ग़म का बोझ अब संभलता नहीं;
    अगर तू मिल जाये तो तुझसे लिपट कर रो लूँ।
  • भूला हूँ मैं आलम को सर-शार इसे कहते हैं;
    मस्ती में नहीं ग़ाफ़िल हुश्यार इसे कहते हैं;

    गेसू इसे कहते हैं रुख़सार इसे कहते हैं;
    सुम्बुल इसे कहते हैं गुल-ज़ार इसे कहते हैं;

    इक रिश्ता-ए-उल्फ़त में गर्दन है हज़ारों की;
    तस्बीह इसे कहते हैं ज़ुन्नार इसे कहते हैं;

    महशर का किया वादा याँ शक्ल न दिखलाई;
    इक़रार इसे कहते हैं इंकार इसे कहते हैं;

    टकराता हूँ सर अपना क्या क्या दर-ए-जानाँ से;
    जुम्बिश भी नहीं करती दीवार इसे कहते हैं;

    ख़ामोश 'अमानत' है कुछ उफ़ भी नहीं करता;
    क्या क्या नहीं ऐ प्यारे अग़्यार इसे कहते हैं।
    ~ Amanat Lakhnavi