अब सोचते हैं लाएँगे तुझ सा कहाँ से हम;
उठने को उठ तो आए तेरे आस्ताँ से हम।
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रात होगी तो चाँद दुहाई देगा;
ख्वाबों में आपको वह चेहरा दिखाई देगा;
ये मोहब्बत है ज़रा सोच कर करना;
एक आंसू भी गिरा तो सुनाई देगा।
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यादों के भंवर में एक पल हमारा हो;
खिलते चमन में एक गुल हमारा हो;
जब याद करें आप अपने चाहने वालों को;
उन नामों में बस एक नाम हमारा हो।
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तुम्हारी पसंद हमारी चाहत बन जाये;
तुम्हारी मुस्कुराहट दिल की राहत बन जाये;
खुदा खुशियों से इतना खुश कर दे आपको;
कि आपको खुश देखना हमारी आदत बन जाये।
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तू इस क़दर मुझे...

तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है;
तुझे अलग से जो सोचू अजीब लगता है;

जिसे ना हुस्न से मतलब ना इश्क़ से सरोकार;
वो शख्स मुझ को बहुत बदनसीब लगता है;

हदूद-ए-जात से बाहर निकल के देख ज़रा;
ना कोई गैर, ना कोई रक़ीब लगता है;

ये दोस्ती, ये मरासिम, ये चाहते ये खुलूस;
कभी कभी ये सब कुछ अजीब लगता है;

उफक़ पे दूर चमकता हुआ कोई तारा;
मुझे चिराग-ए-दयार-ए-हबीब लगता है;

ना जाने कब कोई तूफान आयेगा यारो;
बलंद मौज से साहिल क़रीब लगता है।
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मालूम है दुनिया को ये 'हसरत' की हक़ीक़त;
ख़ल्वत में वो मय-ख़्वार है जल्वत में नमाज़ी।
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हर पल कुछ सोचते रहने की आदत गयी है;
हर आहट पे च चौंक जाने की आदत हो गयी है;
तेरे इश्क़ में ऐ बेवफा, हिज्र की रातों के संग;
हमको भी जागते रहने की आदत हो गयी है।
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ऐ आशिक तू सोच तेरा क्या होगा;
क्योंकि हशर की परवाह मैं नहीं करता;
फनाह होना तो रिवायत है तेरी;
इश्क़ नाम है मेरा मैं नहीं मरता।
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आज उसने एक और दर्द दिया तो खुदा याद आया;
कि हमने भी दुआओं में उसके सारे दर्द माँगे थे।
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अज़ाब ये भी किसी...

अज़ाब ये भी किसी और पर नहीं आया;
कि एक उम्र चले और घर नहीं आया;

इस एक ख़्वाब की हसरत में जल बुझीं आँखें;
वो एक ख़्वाब कि अब तक नज़र नहीं आया;

करें तो किस से करें ना-रसाइयों का गिला;
सफ़र तमाम हुआ हम-सफ़र नहीं आया;

दिलों की बात बदन की ज़बाँ से कह देते;
ये चाहते थे मगर दिल इधर नहीं आया;

अजीब ही था मेरे दौर-ए-गुमरही का रफ़ीक़;
बिछड़ गया तो कभी लौट कर नहीं आया;

हरीम-ए-लफ़्ज़-ओ-मआनी से निस्बतें भी रहीं;
मगर सलीक़ा-ए-अर्ज़-ए-हुनर नहीं आया।
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