• रक़ीबों के लिए अच्छा ठिकाना हो गया पैदा,
    ख़ुदा आबाद रखे मैं तो कहता हूँ जहन्नम को।
    ~ Bekhud Dehlvi
  • तेरी महफ़िल से दिल कुछ और तनहा होके लौटा है,
    ये लेने क्या गया था और क्या घर लेके आया है।
  • ये याद है तुम्हारी या यादों में तुम हो,
    ये ख्वाब हैं तुम्हारे या ख्वाबों में तुम हो,
    हम नहीं जानते हमें बस इतना बता दो,
    हम जान हैं तुम्हारी या हमारी जान तुम हो।
  • आप जिस पर आँख बंद करके भरोसा करते हैं,
    अक्सर वही आप की आँखें खोल जाता है।
  • ये किसने गला घोंट दिया जिन्दादिली का,
    चेहरे पे हँसी है कि जनाजा है हँसी का;

    हर हुस्न में उस हुस्न की हल्की सी झलक है,
    दीदार का हक मुझको है जल्वा हो किसी का;

    रक्साँ है कोई हूर कि लहराती है सहबा,
    उड़ना कोई देखे मिरे शीशे की परी का;

    जब रात गले मिलके बिछड़ती है सहर से,
    याद आता है मंजर तेरी रूखसत की घड़ी का;

    उन आँखों के पैमानों से छलकी जो जरा सी,
    मैखाने में होश उड़ गया शीशे की परी का;

    रूस्वा है 'नजीर' अपने ही बुतखाने की हद में,
    दीवाना अगर है तो बनारस की गली का।
    ~ Nazeer Banarsi
  • ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त,
    वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में।
    ~ Firaq Gorakhpuri
  • तेरी चाहत में हम रुस्वा सर ए बाजार हो गए,
    हमने ही दिल खोया हम ही गुनहगार हो गए।
  • लोग तो बेवजह खरीदते हैं आईने,
    आँख बंद करके भी अपनी हक़ीक़त जानी जा सकती है।
  • फिर वही दिल की गुज़ारिश, फिर वही उनका गुरूर;
    फिर वही उनकी शरारत, फिर वही मेरा कसूर।
  • कभी बहुत है कभी ध्यान तेरा कुछ कम है,
    कभी हवा है कभी आँधियों का मौसम है;

    अभी न तोड़ा गया मुझ से कै़द-ए-हस्ती को,
    अभी शराब-ए-जुनूँ का नशा भी मद्धम है;

    कि जैसे साथ तिरे ज़िंदगी गुज़रती हो,
    तिरा ख़याल मिरे साथ ऐसे पैहम है;

    तमाम फ़िक्र-ए-ज़मान-ओ-मकाँ से छूट गई,
    सियाह-कारी-ए-दिल मुझे को ऐसा मरहम है;

    मैं ख़ुद मुसाफ़िर-ए-दिल हूँ उसे न रोकुँगी,
    वो ख़ुद ठहर न सकेगा जो कै़दी-ए-ग़म है;

    वौ शौक़-ए-तेज़-रवी है कि देखता है जहाँ,
    ज़मीं पे आग लगी आसमान बरहम है।
    ~ Tanvir Anjum