• अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल;<br/>
लेकिन कभी-कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे!<br/><br/>
पासबान-ए-अक़्ल: बुद्धी का निरीक्षक, Guardian of the mind, Intution
    अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल;
    लेकिन कभी-कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे!

    पासबान-ए-अक़्ल: बुद्धी का निरीक्षक, Guardian of the mind, Intution
    ~ Allama Iqbal
  • ग़ुज़री तमाम उम्र उसी शहर में जहाँ;<br/>
वाक़िफ़ सभी थे पहचानता कोई न था!
    ग़ुज़री तमाम उम्र उसी शहर में जहाँ;
    वाक़िफ़ सभी थे पहचानता कोई न था!
  • अपने मन में डूब कर पा जा सु्राग़-ए-ज़िन्दगी;<br/>
तू अगर मेरा नहीं बनता न बन, अपना तो बन!
    अपने मन में डूब कर पा जा सु्राग़-ए-ज़िन्दगी;
    तू अगर मेरा नहीं बनता न बन, अपना तो बन!
    ~ Allama Iqbal
  • दिल से रुख़स्त हुई कोई ख़्वाहिश;<br/>
गिर्या कुछ बे-सबब नहीं आता!<br/><br/>
Rukhsat, रुख़स्त: Departing<br/>
Giryaa, गिर्या: Tears, Crying<br/>
Be-Sabab, बे-सबब: Without any cause
    दिल से रुख़स्त हुई कोई ख़्वाहिश;
    गिर्या कुछ बे-सबब नहीं आता!

    Rukhsat, रुख़स्त: Departing
    Giryaa, गिर्या: Tears, Crying
    Be-Sabab, बे-सबब: Without any cause
    ~ Meer Taqi Meer
  • महफ़िल में हँसना तो हमारा मिज़ाज़ बन गया,<br/>
तन्हाई में रोना एक राज़ बन गया;<br/>
दिल के दर्द को चेहरे से ज़ाहिर ना होने दिया,<br/>
यही ज़िन्दगी जीने का अंदाज़ बन गया!
    महफ़िल में हँसना तो हमारा मिज़ाज़ बन गया,
    तन्हाई में रोना एक राज़ बन गया;
    दिल के दर्द को चेहरे से ज़ाहिर ना होने दिया,
    यही ज़िन्दगी जीने का अंदाज़ बन गया!
  • जी में क्या-क्या है अपने ऐ हम-दम;<br/>
पर सुखन ता-बलब नहीं आता!
    जी में क्या-क्या है अपने ऐ हम-दम;
    पर सुखन ता-बलब नहीं आता!
    ~ Meer Taqi Meer
  • न ग़रज़ किसी से, न वास्ता, मुझे काम अपने ही काम से;<br/>
तिरे ज़िक्र से, तिरी फ़िक्र से, तिरी याद से तिरे नाम!
    न ग़रज़ किसी से, न वास्ता, मुझे काम अपने ही काम से;
    तिरे ज़िक्र से, तिरी फ़िक्र से, तिरी याद से तिरे नाम!
  • गुनाहगार के दिल से न बच के चल ज़ाहिद;<br/>
यहीं कहीं तिरी जन्नत भी पाई जाती है!<br/><br/>

ज़ाहिद  =  धार्मिक व्यक्ति
    गुनाहगार के दिल से न बच के चल ज़ाहिद;
    यहीं कहीं तिरी जन्नत भी पाई जाती है!

    ज़ाहिद = धार्मिक व्यक्ति
    ~ Jigar Moradabadi
  • दर पे रहने को कहा और कह के कैसा फिर गया;<br/>
जितने अर्से में मेरा लिपटा हुआ बिस्तर खुला!
    दर पे रहने को कहा और कह के कैसा फिर गया;
    जितने अर्से में मेरा लिपटा हुआ बिस्तर खुला!
    ~ Mirza Ghalib
  • चलो बाँट लेते हैं अपनी सज़ायें;<br/>
न तुम याद आओ न हम याद आयें!
    चलो बाँट लेते हैं अपनी सज़ायें;
    न तुम याद आओ न हम याद आयें!
    ~ Sardar Anjum