• फूल की पती से कट सकता है हीरे का जिगर;<br/>
मर्दे नादाँ पर कलाम-ऐ-नरम-ऐ-नाज़ुक बेअसर!
    फूल की पती से कट सकता है हीरे का जिगर;
    मर्दे नादाँ पर कलाम-ऐ-नरम-ऐ-नाज़ुक बेअसर!
  • खुशबू की तरह आया वो तेज़ हवाओं में;<br/>
माँगा था जिसे हम ने दिन रात दुआओं में;<br/> 
तुम चाट पे नहीं आये मैं घर से नहीं निकल;<br/>
यह चाँद बहुत भटकता है सावन की घटाओं में!
    खुशबू की तरह आया वो तेज़ हवाओं में;
    माँगा था जिसे हम ने दिन रात दुआओं में;
    तुम चाट पे नहीं आये मैं घर से नहीं निकल;
    यह चाँद बहुत भटकता है सावन की घटाओं में!
  • तुम्हारे साथ खामोश भी रहूँ तो बातें पूरी हो जाती हैं;<br/>
तुम में, तुम से, तुम पर ही मेरी दुनिया पूरी हो जाती है!
    तुम्हारे साथ खामोश भी रहूँ तो बातें पूरी हो जाती हैं;
    तुम में, तुम से, तुम पर ही मेरी दुनिया पूरी हो जाती है!
  • हमेशा फूलों की तरह, अपनी आदत से बेबस रहिये;<br/>
तोडने वाले को भी, खुशबू की सजा देते रहिये!
    हमेशा फूलों की तरह, अपनी आदत से बेबस रहिये;
    तोडने वाले को भी, खुशबू की सजा देते रहिये!
  • ना जाने जिंदगी का, ये कैसा दौर है,<br/>
इंसान खामोश है, और ऑनलाइन कितना शोर है।
    ना जाने जिंदगी का, ये कैसा दौर है,
    इंसान खामोश है, और ऑनलाइन कितना शोर है।
  • थोड़ा सा बचपन साथ रखियेगा जिंदगी की शाम में,<br/>
उम्र महसूस ही न होगी, सफ़र के आखरी मुकाम में!
    थोड़ा सा बचपन साथ रखियेगा जिंदगी की शाम में,
    उम्र महसूस ही न होगी, सफ़र के आखरी मुकाम में!
  • खुदा तो इक तरफ, खुद से भी कोसों दूर होता है,<br/>
बशर जिस वक्त ताकत के नशे में चूर होता है!<br/><br/>

बशर - मानव
    खुदा तो इक तरफ, खुद से भी कोसों दूर होता है,
    बशर जिस वक्त ताकत के नशे में चूर होता है!

    बशर - मानव
  • चंद तस्वीर-ऐ-बुताँ, चंद हसीनों के खतूत;<br/>
बाद मरने के मेरे घर से यह सामान निकला!
    चंद तस्वीर-ऐ-बुताँ, चंद हसीनों के खतूत;
    बाद मरने के मेरे घर से यह सामान निकला!
    ~ Mirza Ghalib
  • गलतफहमी से बढ़कर दोस्ती का दुश्मन नहीं कोई,<br/>
परिंदों को उड़ाना हो तो बस शाख़ें हिला दीजिए!
    गलतफहमी से बढ़कर दोस्ती का दुश्मन नहीं कोई,
    परिंदों को उड़ाना हो तो बस शाख़ें हिला दीजिए!
  • ये कश्मकश है ज़िंदगी की, कि कैसे बसर करें;<br/>
चादर बड़ी करें या, ख़्वाहिशे दफ़न करे!
    ये कश्मकश है ज़िंदगी की, कि कैसे बसर करें;
    चादर बड़ी करें या, ख़्वाहिशे दफ़न करे!