• वस्ल का दिन और इतना मुख़्तसर;<br/>
दिन गिने जाते थे इस दिन के लिए!
    वस्ल का दिन और इतना मुख़्तसर;
    दिन गिने जाते थे इस दिन के लिए!
    ~ Ameer Minai
  • आँखें जो उठाए तो मोहब्बत का गुमाँ हो;<br/>
नज़रों को झुकाए तो शिकायत सी लगे है!
    आँखें जो उठाए तो मोहब्बत का गुमाँ हो;
    नज़रों को झुकाए तो शिकायत सी लगे है!
    ~ Jaan Nisar Akhtar
  • यक़ीन बरसों का इम्कान कुछ दिनों का हूँ;<br/>
मैं तेरे शहर में मेहमान कुछ दिनों का हूँ!<br/><br/>
*इम्कान: Possibility, Contingent, Existence
    यक़ीन बरसों का इम्कान कुछ दिनों का हूँ;
    मैं तेरे शहर में मेहमान कुछ दिनों का हूँ!

    *इम्कान: Possibility, Contingent, Existence
    ~ Athar Nasik
  • इतनी मिलती है मेरी ग़ज़लों से सूरत तेरी;<br/>

लोग तुझ को मेरा महबूब समझते होंगे!
    इतनी मिलती है मेरी ग़ज़लों से सूरत तेरी;
    लोग तुझ को मेरा महबूब समझते होंगे!
    ~ Bashir Badr
  • हसीन तो और हैं लेकिन कोई कहाँ तुझ सा;<br/>
जो दिल जलाए बहुत फिर भी दिलरुबा ही लगे!
    हसीन तो और हैं लेकिन कोई कहाँ तुझ सा;
    जो दिल जलाए बहुत फिर भी दिलरुबा ही लगे!
    ~ Bashir Badr
  • इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद;<br/>
अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता!
    इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद;
    अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता!
    ~ Akbar Allahabadi
  • एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है;<br/>
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है!
    एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है;
    सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है!
    ~ Jigar Moradabadi
  • लोग कहते हैं कि तू अब भी ख़फ़ा है मुझ से;<br/>
तेरी आँखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से!
    लोग कहते हैं कि तू अब भी ख़फ़ा है मुझ से;
    तेरी आँखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से!
    ~ Jaan Nisar Akhtar
  • इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा;<br/>
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं!
    इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा;
    लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं!
    ~ Mirza Ghalib
  • तू सामने है तो फिर क्यों यक़ीं नहीं आता;<br/>
ये बार बार जो आँखों को मल के देखते हैं!
    तू सामने है तो फिर क्यों यक़ीं नहीं आता;
    ये बार बार जो आँखों को मल के देखते हैं!
    ~ Ahmad Faraz