• उधर ज़ुल्फ़ों में कंघी लग रही है और ख़म निकलता है;
    इधर रग-रग से खिंच-खिंच के हमारा दम निकलता है;
    इलाही ख़ैर कर उलझन पे उलझन पड़ती जाती है;
    ना उनका ख़म निकलता है ना अपना दम निकलता है।

    ख़म - उलझन
  • इश्क़ नाज़ुक मिजाज़ है बे-हद;
    अक्ल का बोझ उठा नहीं सकता।
  • तू ही बता ए दिल तुम्हें समझाऊं कैसे;<br/>
जिसे चाहता है तू उसे नज़दीक लाऊँ कैसे;<br/>
यूँ तो हर तमन्ना हर एहसास है वो मेरा;<br/>
मगर उस एहसास को ये एहसास दिलाऊं कैसे।Upload to Facebook
    तू ही बता ए दिल तुम्हें समझाऊं कैसे;
    जिसे चाहता है तू उसे नज़दीक लाऊँ कैसे;
    यूँ तो हर तमन्ना हर एहसास है वो मेरा;
    मगर उस एहसास को ये एहसास दिलाऊं कैसे।
  • क्या ज़रूरी है कि हम हार के जीतें 'तबिश';
    इश्क़ का खेल बराबर भी तो हो सकता है!
    ~ Abbas Tabish
  • कभी लफ्ज़ भूल जाऊं, कभी बात भूल जाऊं;<br/>
तूझे इस क़द्र चाहूँ के अपनी ज़ात भूल जाऊं;<br/>
उठ के तेरे पास से जो में चल दूँ;<br/>
जाते हुए खुद को तेरे पास भूल जाऊं!Upload to Facebook
    कभी लफ्ज़ भूल जाऊं, कभी बात भूल जाऊं;
    तूझे इस क़द्र चाहूँ के अपनी ज़ात भूल जाऊं;
    उठ के तेरे पास से जो में चल दूँ;
    जाते हुए खुद को तेरे पास भूल जाऊं!
  • अब मगर कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं हो सकता;<br/>
अपने जज़्बों से यह रंगीन शरारत न करो;<br/>
कितनी मासूम हो, नाज़ुक हो, हमाक़त न करो;<br/>
बार बार हाँ तुम से कहा था कि मोहब्बत न करो।Upload to Facebook
    अब मगर कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं हो सकता;
    अपने जज़्बों से यह रंगीन शरारत न करो;
    कितनी मासूम हो, नाज़ुक हो, हमाक़त न करो;
    बार बार हाँ तुम से कहा था कि मोहब्बत न करो।
  • फिर न सिमटेगी मोहब्बत जो बिखर जायेगी;
    ज़िंदगी ज़ुल्फ़ नहीं जो फिर संवर जायेगी;
    थाम लो हाथ उसका जो प्यार करे तुमसे;
    ये ज़िंदगी ठहरेगी नहीं जो गुज़र जायेगी।
    ~ Allama Iqbal
  • जिस रंग में देखो उसे वो पर्दानशीं है;
    और उस पे ये पर्दा है कि पर्दा ही नहीं है;
    मुझ से कोई पूछे तेरे मिलने की अदायें;
    दुनिया तो यह कहती है कि मुमकिन ही नहीं है।
    ~ Jigar Moradabadi
  • कौन कहता है मोहब्बत की ज़ुबान होती है;
    होंठों के बिना खुले ही हक़ीक़त बयां होती है;
    इश्क़ वो खुदायी है मेरे दोस्त,
    जो लफ़्ज़ों से नहीं आँखों से बयां होती है।
  • सरे राह जो उनसे नज़र मिली,
    तो नक़्श दिल के उभर गए;
    हम नज़र मिला कर झिझक गए,
    वो नज़र झुका कर चले गए।
    ~ Mirza Ghalib