• अब तेरे शहर में:

    अब तेरे शहर में रहने को बचा ही क्या है,
    जुदाई सह ली तो सहने को बचा ही क्या है;

    सब अजनबी हैं, तेरे नाम से जाने मुझको,
    पढ़ने वाला नहीं, लिखने को बचा ही क्या है,

    ये भी सच है कि मेरा नाम आशिकों में नहीं,
    बनके दीवाना तेरा, उछलने में रखा ही क्या है;

    तू ही तू था कभी, अब मैं भी ना रहा,
    वो जलवा भी नहीं मिटने को बचा ही क्या है;

    मरना बाकी है तो, मर भी जायेंगे एक दिन,
    सुनने बाला नहीं, कहने को बचा ही क्या है।
  • हवस की बस्तियों में:

    हवस की बस्तियों में यूँ गुजारा कर लिया हमने,
    ज़मीर मार डाला खुद इशारा कर लिया हमने;

    मुझे शक है कि मंदिर में कभी भगवान रहते थे,
    बढ़ी हैवानियत से कब्जा सारा कर लिया हमने;

    दरिंदे नन्ही कलियों को कुचल कर फेंक देते हैं,
    ज़ालिम सल्तनत में हैं गंवारा कर लिया हमने;

    अगर हैं बागबां करता शिकायत कोई हाकिम से,
    तो उसको मार देते हैं नजारा कर लिया हमने;

    बढ़ो आगे जुबां खोलो अगर थोड़े भी जिंदा हो,
    कभी ये सोचना भी मत किनारा कर लिया हमने!
  • वो मोहब्बतें जो तुम्हारे:

    वो मोहब्बतें जो तुम्हारे दिल में है,
    उससे जुबां पर लाओ और बयां कर दो;

    आज बस तुम कहो और कहते ही जाओ,
    हम बस सुनें ऐसा बे -ज़ुबान कर दो;

    आ जाओ के ऐसा टूट कर चाहूँ तुम्हें,
    हमारी मोहब्बत को मोहब्बत का निशान कर दो;

    अपने दिल में इस तरह छुपा लो मुझ को,
    राहों हमेशा इसमें इससे मेरा जहाँ कर दो|
  • तप्त हृदय को:

    तप्त हृदय को, सरस स्नेह से,
    जो सहला दे, मित्र वही है;

    रूखे मन को, सराबोर कर,
    जो नहला दे, मित्र वही है;

    प्रिय वियोग, संतप्त चित्त को,
    जो बहला दे, मित्र वही है;

    अश्रु बूँद की, एक झलक से,
    जो दहला दे, मित्र वही है।
  • दर्द कागज़ पर:

    दर्द कागज़ पर, मेरा बिकता रहा,
    मैं बैचैन था, रातभर लिखता रहा;

    छू रहे थे सब, बुलंदियाँ आसमान की,
    मैं सितारों के बीच, चाँद की तरह छिपता रहा;

    अकड होती तो, कब का टूट गया होता,
    मैं था नाज़ुक डाली, जो सबके आगे झुकता रहा;

    बदले यहाँ लोगों ने, रंग अपने-अपने ढंग से,
    रंग मेरा भी निखरा पर, मैं मेहँदी की तरह पीसता रहा;

    जिनको जल्दी थी, वो बढ़ चले मंज़िल की ओर,
    मैं समन्दर से राज, गहराई के सीखता रहा!
  • दरिया का सारा नशा:

    दरिया का सारा नशा उतरता चला गया,
    मुझको डुबोया और मैं उभरता चला गया;

    वो पैरवी तो झूठ की करता चला गया,
    लेकिन बस उसका चेहरा उतरता चला गया;

    हर साँस उम्र भर किसी मरहम से कम न थी,
    मैं जैसे कोई जख्म था भरता चला गया।
    ~ Wasim Barelvi
  • दुश्मन को भी सीने से:

    दुश्मन को भी सीने से लगाना नहीं भूले,
    हम अपने बुजुर्गों का ज़माना नहीं भूले;

    तुम आँखों की बरसात बचाये हुये रखना,
    कुछ लोग अभी आग लगाना नहीं भूले;

    ये बात अलग हाथ कलम हो गये अपने,
    हम आप की तस्वीर बनाना नहीं भूले;

    इक ऊम्र हुई मैं तो हँसी भूल चुका हूँ,
    तुम अब भी मेरे दिल को दुखाना नहीं भूले।
  • ख़ुदा की मोहब्बत को:

    ख़ुदा की मोहब्बत को फ़ना कौन करेगा,
    सभी बन्दे नेक हों तो गुनाह कौन करेगा;

    ऐ ख़ुदा मेरे दोस्तों को सलामत रखना,
    वरना मेरी सलामती की दुआ कौन करेगा;

    और रखना मेरे दुश्मनों को भी महफूज़,
    वरना मेरी तेरे पास आने की दुआ कौन करेगा!
    ~ Mirza Ghalib
  • तेरा मुस्कुराना नहीं:

    तेरा मुस्कुराना नहीं भूलता है,
    वो नज़रें झुकाना नहीं भूलता है;

    मेरी ख़ाबगाह में मेरी जान का वो,
    दबे पाँव आना नहीं भूलता है;

    कि शर्मा के दांतों तले फिर तुम्हारा,
    वो ऊँगली दबाना नहीं भूलता है;

    वो गेसू सुखाना तेरा छत पे आ के,
    क़यामत गिराना नहीं भूलता है;

    लिपटना मेरे साथ आकर तुम्हारा,
    वो मंज़र सुहाना नहीं भूलता है;

    मुहब्बत निभाता दिलो-ओ-जाँ से 'सागर',
    पुराना ज़माना नहीं भूलता है!
    ~ Sagar Sood
  • मुझको एक बार:

    मुझको एक बार आजमाते तो सही,
    वो मेरी बज़्म में आते तो सही;

    मैंने रखा था सर-ए-शाम से घर को सजाकर,
    तुम न रुकते एक पल को आते तो सही;

    आपकी खातिर आपकी खुशियों की खातिर,
    खुद भी हो जाता नीलाम, बताते तो सही;

    यकीनन आपके हिस्से में रोशनी होती,
    शम्म-ए-वफ़ा दिल में एक बार जलाते तो सही;

    मैं भी इंसान हूँ पत्थर नहीं, क्यूँ ठुकराया,
    खुद हो जाता टुकड़े-टुकड़े बताते तो सही!