• ज़हर देता है कोई:

    ज़हर देता है कोई, कोई दवा देता है,
    जो भी मिलता है, मेरा दर्द बढ़ा देता है;

    किसी हमदम का, सरे शाम ख़याल आ जाना,
    नींद जलती हुई आँखों की उड़ा देता है;

    प्यास इतनी है मेरी, रूह की गहराई में,
    अश्क गिरता है तो, दामन को जला देता है;

    किसने माज़ी के दरीचों से, पुकारा है मुझे,
    कौन भूली हुई राहों से, सदा देता है;

    वक़्त ही दर्द के, काँटों पे सुलाए दिल को,
    वक़्त ही दर्द का, एहसास मिटा देता है;

    रोने से तसल्ली कभी हो जाती थी,
    अब तबस्सुम मेरे होटों को जला देता है!
  • ज़रा सी ज़िन्दगी:

    ज़रा सी ज़िन्दगी में, व्यवधान बहुत हैं,
    तमाशा देखने को यहां, इंसान बहुत हैं!

    कोई भी नहीं बताता, ठीक रास्ता यहां,
    अजीब से इस शहर में, 'नादान' बहुत हैं!

    न करना भरोसा भूल कर भी किसी पे,
    यहां हर गली में साहब बेईमान बहुत हैं!

    दौड़ते फिरते हैं, न जाने क्या पाने को,
    लगे रहते हैं जुगाड में, परेशान बहुत है!

    खुद ही बनाते हैं हम, पेचीदा ज़िन्दगी को,
    वर्ना तो जीने के नुस्खे, आसान बहुत हैं!
  • उलझनों और कश्मकश में:

    उलझनों और कश्मकश में, उम्मीद की ढाल लिए बैठा हूँ;
    ए जिंदगी तेरी हर चाल के लिए, मैं दो चाल लिए बैठा हूँ,

    लुत्फ़ उठा रहा हूँ मैं भी आँख - मिचोली का;
    मिलेगी कामयाबी, हौसला कमाल का लिए बैठा हूँ,

    चल मान लिया दो-चार दिन नहीं मेरे मुताबिक;
    गिरेबान में अपने, ये सुनहरा साल लिए बैठा हूँ,

    ये गहराइयां, ये लहरें, ये तूफां, तुम्हे मुबारक;
    मुझे क्या फ़िक्र मैं कश्तीया और दोस्त बेमिसाल लिए बैठा हूँ!
  • अब तेरे शहर में:

    अब तेरे शहर में रहने को बचा ही क्या है,
    जुदाई सह ली तो सहने को बचा ही क्या है;

    सब अजनबी हैं, तेरे नाम से जाने मुझको,
    पढ़ने वाला नहीं, लिखने को बचा ही क्या है,

    ये भी सच है कि मेरा नाम आशिकों में नहीं,
    बनके दीवाना तेरा, उछलने में रखा ही क्या है;

    तू ही तू था कभी, अब मैं भी ना रहा,
    वो जलवा भी नहीं मिटने को बचा ही क्या है;

    मरना बाकी है तो, मर भी जायेंगे एक दिन,
    सुनने बाला नहीं, कहने को बचा ही क्या है।
  • हवस की बस्तियों में:

    हवस की बस्तियों में यूँ गुजारा कर लिया हमने,
    ज़मीर मार डाला खुद इशारा कर लिया हमने;

    मुझे शक है कि मंदिर में कभी भगवान रहते थे,
    बढ़ी हैवानियत से कब्जा सारा कर लिया हमने;

    दरिंदे नन्ही कलियों को कुचल कर फेंक देते हैं,
    ज़ालिम सल्तनत में हैं गंवारा कर लिया हमने;

    अगर हैं बागबां करता शिकायत कोई हाकिम से,
    तो उसको मार देते हैं नजारा कर लिया हमने;

    बढ़ो आगे जुबां खोलो अगर थोड़े भी जिंदा हो,
    कभी ये सोचना भी मत किनारा कर लिया हमने!
  • वो मोहब्बतें जो तुम्हारे:

    वो मोहब्बतें जो तुम्हारे दिल में है,
    उससे जुबां पर लाओ और बयां कर दो;

    आज बस तुम कहो और कहते ही जाओ,
    हम बस सुनें ऐसा बे -ज़ुबान कर दो;

    आ जाओ के ऐसा टूट कर चाहूँ तुम्हें,
    हमारी मोहब्बत को मोहब्बत का निशान कर दो;

    अपने दिल में इस तरह छुपा लो मुझ को,
    राहों हमेशा इसमें इससे मेरा जहाँ कर दो|
  • तप्त हृदय को:

    तप्त हृदय को, सरस स्नेह से,
    जो सहला दे, मित्र वही है;

    रूखे मन को, सराबोर कर,
    जो नहला दे, मित्र वही है;

    प्रिय वियोग, संतप्त चित्त को,
    जो बहला दे, मित्र वही है;

    अश्रु बूँद की, एक झलक से,
    जो दहला दे, मित्र वही है।
  • दर्द कागज़ पर:

    दर्द कागज़ पर, मेरा बिकता रहा,
    मैं बैचैन था, रातभर लिखता रहा;

    छू रहे थे सब, बुलंदियाँ आसमान की,
    मैं सितारों के बीच, चाँद की तरह छिपता रहा;

    अकड होती तो, कब का टूट गया होता,
    मैं था नाज़ुक डाली, जो सबके आगे झुकता रहा;

    बदले यहाँ लोगों ने, रंग अपने-अपने ढंग से,
    रंग मेरा भी निखरा पर, मैं मेहँदी की तरह पीसता रहा;

    जिनको जल्दी थी, वो बढ़ चले मंज़िल की ओर,
    मैं समन्दर से राज, गहराई के सीखता रहा!
  • दरिया का सारा नशा:

    दरिया का सारा नशा उतरता चला गया,
    मुझको डुबोया और मैं उभरता चला गया;

    वो पैरवी तो झूठ की करता चला गया,
    लेकिन बस उसका चेहरा उतरता चला गया;

    हर साँस उम्र भर किसी मरहम से कम न थी,
    मैं जैसे कोई जख्म था भरता चला गया।
    ~ Wasim Barelvi
  • दुश्मन को भी सीने से:

    दुश्मन को भी सीने से लगाना नहीं भूले,
    हम अपने बुजुर्गों का ज़माना नहीं भूले;

    तुम आँखों की बरसात बचाये हुये रखना,
    कुछ लोग अभी आग लगाना नहीं भूले;

    ये बात अलग हाथ कलम हो गये अपने,
    हम आप की तस्वीर बनाना नहीं भूले;

    इक ऊम्र हुई मैं तो हँसी भूल चुका हूँ,
    तुम अब भी मेरे दिल को दुखाना नहीं भूले।