• ज़ख़्मी दिन और रात रहेंगे:

    ज़ख़्मी दिन और रात रहेंगे कितने दिन,
    दहशत में लम्हात रहेंगे कितने दिन;

    हर पतझड़ के बाद है मौसम फूलों का,
    ख़ाली अपने हाथ रहेंगे कितने दिन;

    कितनी साँसे किस के पास हैं क्या मालूम,
    हम तुम दोनों साथ रहेंगे कितने दिन;

    पढ़ने वाले चेहरा भी पढ़ लेते हैं,
    पोशीदा हालात रहेंगे कितने दिन;

    कितने दिन तक वो दिन अपने साथ रहे,
    ये दिन अपने साथ रहेंगे कितने-कितने दिन!
  • इक बेवफ़ा में रुह-ए-वफ़ा ढूंढ़ते रहे:

    इक बेवफ़ा में रुह-ए-वफ़ा ढूंढ़ते रहे,
    शोलों की बारिशों में सबा ढूंढ़ते रहे;

    वो ढूंढ़ते हैं दिल को दुखाने का सिलसिला,
    उनकी ख़ुशी में हम तो मज़ा ढूंढ़ते रहे;

    वो हैं कि मुस्कुरा रहे हैं चीर के जिगर,
    हम हैं कि यार खुद की ख़ता ढूंढ़ते रहे;

    घबरा के देखते कभी आकाश की तरफ,
    रुख़सत हुई ख़ुशी का पता ढूंढ़ते रहे;

    ठहरी हुई नदी में भरे जो रवानगी,
    शिद्दत से रात दिन वो अदा ढूंढ़ते रहे।
  • गम-ए-ज़ज़्बात से घायल:

    गम-ए-ज़ज़्बात से घायल, कोई दामन न रह जाये,
    बिना खुशियों की फुलवारी के कोई आंगन न रह जाये;

    बजाओ इस तरह की धुन, कि हर गैरत के सीने में,
    लरजते आंसुओं का शेष कोई सावन न रह जाये;

    खताओं के समंदर में न ढूंढो सत्य का मोती,
    कहीं जीवन चमन का घट अपावन न रह जाये;

    मुक्ति की राह में भक्ति के खंजर इस तरह मारो,
    किसी भी शख्स के दुर्व्यसन का साधन न रह जाये;

    जलाओ इस तरह से दीप हर जीवन के दरवाजे पे,
    उजाले से महरूम, कोई आंगन न रह जाये।
  • सारी बस्ती में ये जादू नज़र आए मुझको:

    सारी बस्ती में ये जादू नज़र आए मुझको,
    जो दरीचा भी खुले तू नज़र आए मुझको;

    सदियों का रत जगा मेरी रातों में आ गया,
    मैं एक हसीन शख्स की बातों में आ गया;

    जब तस्सवुर मेरा चुपके से तुझे छू आए,
    देर तक अपने बदन से तेरी खुशबू आए;

    गुस्ताख हवाओं की शिकायत न किया कर,
    उड़ जाए दुपट्टा तो खनक औढ लिया कर;

    तुम पूछो और में न बताउ ऐसे तो हालात नहीं,
    एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं;

    रात के सन्नाटे में हमने क्या-क्या धोके खाए है,
    अपना ही जब दिल धड़का तो हम समझे वो आए है!
    ~ Qateel Shifai
  • मोम के पास कभी:

    मोम के पास कभी आग को लाकर देखूँ,
    सोचता हूँ कि तुझे हाथ लगा कर देखूँ;

    कभी चुपके से चला आऊँ तेरी खिलवत में,
    और तुझे तेरी निगाहों से बचा कर देखूँ;

    मैंने देखा है ज़माने को शराब पी कर,
    दम निकल जाये अगर होश में आकर देखूँ;

    दिल का मंदिर बड़ा वीरान नज़र आता है,
    सोचता हूँ तेरी तस्वीर लगा कर देखूँ;

    तेरे बारे में सुना ये है कि तू सूरज है,
    मैं ज़रा थोड़ी देर तेरे साये में आ कर देखूँ;

    याद आता है कि पहले भी कई बार यूँ ही,
    मैंने सोचा था कि मैं तुझको भुला कर देखूँ।
    ~ Rahat Indori
  • हर एक चश्म में जैसे कि एक जहां गुम है,
    हर एक दिल में लगे एक दास्तां गुम है;

    कहीं तलाश फ़लक की दिखे है सतह-ज़मीं,
    कहीं लगे कि ज़मीं से एक आस्मां गुम है;

    कहीं मलाल चमन को कि उड़ गए पंछी,
    कहीं गुलों को शिकायत कि बाग़बां गुम हैं;

    रखेगी याद ये दुनिया यहाँ बस इतना ही,
    वहाँ वो कितना मुक़म्मल है, जो जहाँ गुम है;

    बढ़ा हुआ सा लगे दायरा ये खोने का,
    यह न पूछ किसी से कि वो कहाँ गुम है।
  • ख्वाहिशें हैं कि तेरे दिल मे उतर जाऊं,
    मुद्दतों बाद मैं हद से गुज़र जाऊं;

    कतारों में हैं मेरे कई चाहने वाले,
    तुम कहो तो मैं सब से मुकर जाऊं;

    तुम परेशान हो शायद मेरी हरकतों से,
    सोचता हूँ कि अब मैं सुधर जाऊं;

    जब भी तुम फूलों सा महकती हो,
    दिल करता है कि तुम्हे कुतर जाऊं;

    बहूत महीन हो गया है मेरा मुकद्दर,
    काश मैं फिर से उभर जाऊं।
  • हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी,
    फिर भी तनहाइयों का शिकार आदमी;

    सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ,
    अपनी ही लाश का खुद मज़ार आदमी;

    हर तरफ भागते दौड़ते रास्ते,
    हर तरफ आदमी का शिकार आदमी;

    रोज जीता हुआ रोज मरता हुआ,
    हर नए दिन नया इंतज़ार आदमी;

    ज़िंदगी का मुक़द्दर सफ़र-दर-सफ़र,
    आखिरी सांस तक बेक़रार आदमी!
    ~ Nida Fazli
  • तू साहिल है मेरा और जिन्दगी कश्ती है,
    तेरी आँखों में देख के खुशी हँसती है;

    ना जा हो कर नाराज़ कहीं दूर मुझसे,
    तेरे दिल में ही साँसें मेरी बसती हैं;

    देता नहीं दीदार कभी क्यों मुझ को तू,
    प्यास-ए-दीदार में आँखें तरसती हैं;

    देखता हूँ बैठे दो पक्षियों को साथ,
    तेरी याद में तब आँखें बरसती हैं;

    बड़ा गुमान है क्यों तुझको खुद पे,
    क्या है पहचान तेरी क्या तेरी हस्ती है;

    आज जाना है दिल के टूटने पे हमने,
    मोहब्बत की नहीं दिलजलों की बस्ती है!
  • जिसको दिल में बसाया हमने वो दूर हमसे रहने लगे,
    जिनको अपना माना हमने वो पराया हमको कहने लगे;

    जो बने कभी हमदर्द हमारे वो दर्द हमको देने लगे,
    जब लगी आग मेरे घर में तो पत्ते भी हवा देने लगे;

    जिनसे की वफ़ा हमने वो बेवफा हमको कहने लगे,
    जिनको दिया मरहम हमने वो ज़ख्म हमको देने लगे;

    बचकर निकलता था काँटों से मगर फूल भी ज़ख्म देने लगे,
    जब लगी आग मेरे घर में तो पत्ते भी हवा देने लगे;

    बनायी जिनकी तस्वीर हमने अब चेहरा वो बदलने लगे,
    जो रहते थे दिल में मेरे अब महलों में जाकर रहने लगे।