• जिंदगी में दर्द सब सहते रहे,
    जो मिला था प्यार हम खोते रहे;

    नफरतों के बीच नाजुक दिल मेरा,
    तोड़ के वादे सभी चलते रहे;

    बढ रही बेचैनियां मेरी यहाँ,
    रात को तुम ख्वाब में आते रहे;

    लौट आयी जिंदगी फिर से वहीं,
    पेट की उस भूख से रोते रहे;

    आँखों में छाया नशा है प्यार का,
    इश्क में तेरे वफा मिलते रहे;

    चाहतों के दरमियां इंतजार है,
    भूलकर भी आज हम मिलते रहे;

    रख लिया पत्थर दिलों में हमने भी,
    दर्द की दास्तान को सुनते रहे|
  • ग़म मौत का नहीं है,
    ग़म ये कि आखिरी वक़्त भी तू मेरे घर नहीं है;
    निचोड़ अपनी आँखों को, कि दो आँसू टपके,
    और कुछ तो मेरी लाश को हुस्न मिले,
    डाल दे अपने आँचल का टुकड़ा, कि मेरी मय्यत पे कफ़न नहीं है!
  • रात में कौन वहां जाये जहाँ आग लगी,
    सुबह अख़बार में पढ़ लेंगे कहाँ आग लगी;

    आग से आग बुझाने का अमल जारी था,
    हम भी पानी लिए बैठे थे जहाँ आग लगी;

    वो भी अब आग बुझाने को चले आएं हैं,
    जिनको ये भी नहीं मालूम कहाँ आग लगी;

    किसको फुरसत थी जो देता किसी आवाज़ पे ध्यान,
    चीखता फिरता था आवारा धुंआ आग लगी;

    सुबह तक सारे निशानात मिटा डालेंगे,
    कोई पूछेगा तो कह देंगे कहाँ आग लगी।
    ~ Rahat Indori
  • कितने ऐश उड़ाते होंगे कितने इतराते होंगे,
    जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे;

    उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा,
    यूँ ही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे;

    बंद रहे जिन का दरवाज़ा ऐसे घरों की मत पूछो,
    दीवारें गिर जाती होंगी आँगन रह जाते होंगे;

    मेरी साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएंगे,
    यानी मेरे बाद भी यानी साँस लिये जाते होंगे;

    यारो कुछ तो बात बताओ उस की क़यामत बाहों की,
    वो जो सिमटते होंगे इन में वो तो मर जाते होंगे।
    ~ Jon Elia
  • मैं बुरा ही सही भला न सही,
    पर तेरी कौन सी जफ़ा न सही;

    दर्द-ए-दिल हम तो उन से कह गुज़रे,
    गर उन्हों ने नहीं सुना न सही;

    शब-ए-ग़म में बला से शुग़ल तो है,
    नाला-ए-दिल मेरा रसा न सही;

    दिल भी अपना नहीं रहा न रहे,
    ये भी ऐ चर्ख़-ए-फ़ित्ना-ज़ा न सही;

    देख तो लेंगे वो अगर आए,
    ताक़त-ए-अर्ज़-ए-मुद्दआ न सही;

    कुछ तो आशिक़ से छेड़-छाड़ रही;
    कज-अदाई सही अदा न सही;

    क्यूँ बुरा मानते हो शिकवा मेरा,
    चलो बे-जा सही ब-जा न सही;

    उक़दा-ए-दिल हमारा या क़िस्मत,
    न खुला तुझ से ऐ सबा न सही;

    वाइज़ो बंद-ए-ख़ुदा तो है 'ऐश',
    हम ने माना वो पारसा न सही।
    ~ Aish Dehlvi
  • आख़िर-ए-शब वो तेरी अँगड़ाई,
    कहकशाँ भी फलक पे शरमाई;

    आप ने जब तवज्जोह फ़रमाई,
    गुलशन-ए-ज़ीस्त में बहार आई;

    दास्ताँ जब भी अपनी दोहराई,
    ग़म ने की है बड़ी पज़ीराई;

    सजदा-रेज़ी को कैसे तर्क करूँ,
    है यही वजह-ए-इज़्ज़त-अफ़ज़ाई;

    तुम ने अपना नियाज़-मंद कहा,
    आज मेरी मुराद बर आई;

    आप फ़रमाइए कहाँ जाऊँ,
    आप के दर से है शनासाई;

    उस की तक़दीर में है वस्ल की शब,
    जिस ने बर्दाश्त की है तन्हाई;

    रात पहलू में आप थे बे-शक,
    रात मुझ को भी ख़ूब नींद आई;

    मैं हूँ यूँ इस्म-ब-मुसम्मा 'अज़ीज़',
    वारिश-ए-पाक का हूँ शैदाई।
    ~ Aziz Warsi
  • ये किसने गला घोंट दिया जिन्दादिली का,
    चेहरे पे हँसी है कि जनाजा है हँसी का;

    हर हुस्न में उस हुस्न की हल्की सी झलक है,
    दीदार का हक मुझको है जल्वा हो किसी का;

    रक्साँ है कोई हूर कि लहराती है सहबा,
    उड़ना कोई देखे मिरे शीशे की परी का;

    जब रात गले मिलके बिछड़ती है सहर से,
    याद आता है मंजर तेरी रूखसत की घड़ी का;

    उन आँखों के पैमानों से छलकी जो जरा सी,
    मैखाने में होश उड़ गया शीशे की परी का;

    रूस्वा है 'नजीर' अपने ही बुतखाने की हद में,
    दीवाना अगर है तो बनारस की गली का।
    ~ Nazeer Banarsi
  • कभी बहुत है कभी ध्यान तेरा कुछ कम है,
    कभी हवा है कभी आँधियों का मौसम है;

    अभी न तोड़ा गया मुझ से कै़द-ए-हस्ती को,
    अभी शराब-ए-जुनूँ का नशा भी मद्धम है;

    कि जैसे साथ तिरे ज़िंदगी गुज़रती हो,
    तिरा ख़याल मिरे साथ ऐसे पैहम है;

    तमाम फ़िक्र-ए-ज़मान-ओ-मकाँ से छूट गई,
    सियाह-कारी-ए-दिल मुझे को ऐसा मरहम है;

    मैं ख़ुद मुसाफ़िर-ए-दिल हूँ उसे न रोकुँगी,
    वो ख़ुद ठहर न सकेगा जो कै़दी-ए-ग़म है;

    वौ शौक़-ए-तेज़-रवी है कि देखता है जहाँ,
    ज़मीं पे आग लगी आसमान बरहम है।
    ~ Tanvir Anjum
  • कुछ हिज्र के मौसम ने सताया नहीं इतना,
    कुछ हम ने तेरा सोग मनाया नहीं इतना;

    कुछ तेरी जुदाई की अज़िय्यत भी कड़ी थी,
    कुछ दिल ने भी ग़म तेरा मनाया नहीं इतना;

    क्यूँ सब की तरह भीग गई हैं तेरी पलकें,
    हम ने तो तुझे हाल सुनाया नहीं इतना;

    कुछ रोज़ से दिल ने तेरी राहें नहीं देखीं,
    क्या बात है तू याद भी आया नहीं इतना;

    क्या जानिए इस बे-सर-ओ-सामानी-ए-दिल ने,
    पहले तो कभी हम को रुलाया नहीं इतना।
    ~ Adeem Hashmi
  • अब मेरा दिल कोई मज़हब न मसीहा माँगे,
    ये तो बस प्यार से जीने का सलीका माँगे;

    ऐसी फ़सलों को उगाने की ज़रूरत क्या है,
    जो पनपने के लिए ख़ून का दरिया माँगें;

    सिर्फ़ ख़ुशियों में ही शामिल है ज़माना सारा,
    कौन है वो जो मेरे दर्द का हिस्सा माँगे;

    ज़ुल्म है, ज़हर है, नफ़रत है, जुनूँ है हर सू,
    ज़िन्दगी मुझसे कोई प्यार का रिश्ता माँगे;

    ये तआलुक है कि सौदा है या क्या है आख़र,
    लोग हर जश्न पे मेहमान से पैसा माँगें;

    कितना लाज़म है मुहब्बत में सलीका ऐ'अज़ीज़',
    ये ग़ज़ल जैसा कोई नर्म-सा लहज़ा माँगे।