उन्हें सवाल ही लगता है...

उन्हें सवाल ही लगता है मेरा रोना भी;
अजब सज़ा है जहाँ में ग़रीब होना भी;

ये रात भी है ओढ़ना-बिछौना भी;
इस एक रात में है जागना भी सोना भी;

अजीब शहर है कि घर भी रास्तों की तरह;
कैसा नसीब है रातों को छुप के रोना भी;

खुले में सोएँगे मोतिया के फूलों से;
सजा लो ज़ुल्फ़ बसा लो ज़रा बिछौना भी;

'अज़ीज़' कैसी यह सौदागरों की बस्ती है;
गराँ है दिल से यहाँ काठ का खिलौना भी।
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खुली आँखों में सपना...

खुली आँखों में सपना जागता है;
वो सोया है कि कुछ कुछ जागता है;

तेरी चाहत के भीगे जंगलों में;
मेरा तन मोर बन के नाचता है;

मुझे हर कैफ़ियत में क्यों न समझे;
वो मेरे सब हवाले जानता है;

किसी के ध्यान में डूबा हुआ दिल;
बहाने से मुझे भी टालता है;

सड़क को छोड़ कर चलना पड़ेगा;
कि मेरे घर का कच्चा रास्ता है।
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अगर तलाश करूँ...

अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जायेगा;
मगर तुम्हारी तरह कौन मुझे चाहेगा;

तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा;
मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लायेगा;

ना जाने कब तेरे दिल पर नई सी दस्तक हो;
मकान ख़ाली हुआ है तो कोई आयेगा;

मैं अपनी राह में दीवार बन के बैठा हूँ;
अगर वो आया तो किस रास्ते से आयेगा;

तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है;
तुम्हारे बाद ये मौसम बहुत सतायेगा।
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किस को क़ातिल मैं कहूँ...

किस को क़ातिल मैं कहूँ किस को मसीहा समझूँ;
सब यहाँ दोस्त ही बैठे हैं किसे क्या समझूँ

वो भी क्या दिन थे कि हर वहम यकीं होता था;
अब हक़ीक़त नज़र आए तो उसे क्या समझूँ;

दिल जो टूटा तो कई हाथ दुआ को उठे;
ऐसे माहौल में अब किस को पराया समझूँ;

ज़ुल्म ये है कि है यक्ता तेरी बेगानारवी;
लुत्फ़ ये है कि मैं अब तक तुझे अपना समझूँ।
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सारी बस्ती में ये जादू...

सारी बस्ती में ये जादू नज़र आए मुझको;
जो दरीचा भी खुले तू नज़र आए मुझको;

सदियों का रस जगा मेरी रातों में आ गया;
मैं एक हसीन शक्स की बातों में आ गया;

जब तस्सवुर मेरा चुपके से तुझे छू आए;
देर तक अपने बदन से तेरी खुशबू आए;

गुस्ताख हवाओं की शिकायत न किया कर;
उड़ जाए दुपट्टा तो खनक ओढ़ लिया कर;

तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं;
एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं;

रात के सन्नाटे में हमने क्या-क्या धोखे खाए हैं;
अपना ही जब दिल धड़का तो हम समझे वो आए हैं।
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अब कौन से मौसम से...

अब कौन से मौसम से कोई आस लगाए;
बरसात में भी याद जब न उनको हम आए;

मिटटी की महक साँस की ख़ुश्बू में उतर कर;
भीगे हुए सब्जे की तराई में बुलाए;

दरिया की तरह मौज में आई हुई बरखा;
ज़रदाई हुई रुत को हरा रंग पिलाए;

बूँदों की छमाछम से बदन काँप रहा है;
और मस्त हवा रक़्स की लय तेज़ कर जाए;

हर लहर के पावों से लिपटने लगे घूँघरू;
बारिश की हँसी ताल पे पाज़ेब जो छनकाए;

अंगूर की बेलों पे उतर आए सितारे;
रुकती हुई बारिश ने भी क्या रंग दिखाए।
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वो कभी मिल जाएँ तो...

वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए;
रात दिन सूरत को देखा कीजिए;

चाँदनी रातों में इक इक फूल को;
बे-ख़ुदी कहती है सजदा कीजिए;

जो तमन्ना बर न आए उम्र भर;
उम्र भर उस की तमन्ना कीजिए;

इश्क़ की रंगीनियों में डूब कर;
चाँदनी रातों में रोया कीजिए;

पूछ बैठे हैं हमारा हाल वो;
बे-ख़ुदी तू ही बता क्या कीजिए;

हम ही उस के इश्क़ के क़ाबिल न थे;
क्यों किसी ज़ालिम का शिकवा कीजिए;

आप ही ने दर्द-ए-दिल बख़्शा हमें;
आप ही इस का मुदावा कीजिए;

कहते हैं 'अख़्तर' वो सुन कर मेरे शेर;
इस तरह हम को न रुसवा कीजिए।
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रात के टुकड़ों पे...

रात के टुकड़ों पे पलना छोड़ दे;
शमा से कहना कि जलना छोड़ दे;

मुश्किलें तो हर सफ़र का हुस्न हैं;
कैसे कोई राह चलना छोड़ दे;

तुझसे उम्मीदे - वफ़ा बेकार है;
कैसे इक मौसम बदलना छोड़ दे;

मैं तो ये हिम्मत दिखा पाया नहीं;
तू ही मेरे साथ चलना छोड़ दे;

कुछ तो कर आदाबे - महफ़िल का लिहाज़;
यार ये पहलू बदलना छोड़ दे।
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हम ही में थी न कोई बात...

हम ही में थी न कोई बात याद न तुम को आ सके;
तुम ने हमें भुला दिया हम न तुम्हें भुला सके;

तुम ही न सुन के अगर क़िस्सा-ए-ग़म सुनेगा कौन;
किस की ज़बान खुलेगी फिर हम न अगर सुना सके;

होश में आ चुके थे हम जोश में आ चुके थे हम;
बज़्म का रंग देख कर सर न मगर उठा सके;

रौनक़-ए-बज़्म बन गए लब पे हिकायतें रहीं;
दिल में शिकायतें रहीं लब न मगर हिला सके;

शौक़-ए-विसाल है यहाँ लब पे सवाल है यहाँ;
किस की मजाल है यहाँ हम से नज़र मिला सके;

अहल-ए-ज़बाँ तो हैं बहुत कोई नहीं है अहल-ए-दिल;
कौन तेरी तरह 'हफ़ीज' दर्द के गीत गा सके।
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लगता नहीं है जी मेरा...

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में;
किस की बनी है आलम-ए-नापायेदार में;

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें;
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में;

उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाये थे चार दिन;
दो आरज़ू में कट गये दो इंतज़ार में;

काँटों को मत निकाल चमन से ओ बागबाँ;
ये भी गुलों के साथ पले हैं बहार में;

कितना है बदनसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिये;
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में।

अनुवाद:
आलम-ए-नापायेदार = अस्थायी दुनिया
सय्याद = शिकारी
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