• आज भड़की रग-ए-वहशत तेरे दीवानों की;
    क़िस्मतें जागने वाली हैं बयाबानों की;

    फिर घटाओं में है नक़्क़ारा-ए-वहशत की सदा;
    टोलियाँ बंध के चलीं दश्त को दीवानों की;

    आज क्या सूझ रही है तिरे दीवानों को;
    धज्जियाँ ढूँढते फिरते हैं गरेबानों की;

    रूह-ए-मजनूँ अभी बेताब है सहराओं में;
    ख़ाक बे-वजह नहीं उड़ती बयाबानों की;

    उस ने 'एहसान' कुछ इस नाज़ से मुड़ कर देखा;
    दिल में तस्वीर उतर आई परी-ख़ानों की।
    ~ Ehsaan Danish
  • मैं खिल नहीं सका कि मुझे नम नहीं मिला;
    साक़ी मिरे मिज़ाज का मौसम नहीं मिला;

    मुझ में बसी हुई थी किसी और की महक;
    दिल बुझ गया कि रात वो बरहम नहीं मिला;

    बस अपने सामने ज़रा आँखें झुकी रहीं;
    वर्ना मिरी अना में कहीं ख़म नहीं मिला;

    उस से तरह तरह की शिकायत रही मगर;
    मेरी तरफ़ से रंज उसे कम नहीं मिला;

    एक एक कर के लोग बिछड़ते चले गए;
    ये क्या हुआ कि वक़्फ़ा-ए-मातम नहीं मिला।
    ~ Saqi Faruqi
  • अक्सर मिलना ऐसा हुआ बस;
    लब खोले और उसने कहा बस;

    तब से हालत ठीक नहीं है;
    मीठा मीठा दर्द उठा बस;

    सारी बातें खोल के रखो;
    मैं हूं तुम हो और खुदा बस;

    तुमने दुख में आंख भिगोई;
    मैने कोई शेर कहा बस;

    वाकिफ़ था मैं दर्द से उसके;
    मिल कर मुझसे फूट पड़ा बस;

    जाने भी तो बात हटाओ;
    तुम जीते मैं हार गया बस;

    इस सहरा में इतना कर दे;
    मीठा चश्मा,पेड़,हवा बस।
    ~ Ana Qasimi
  • तेरी सूरत जो दिलनशीं की है;
    आशना शक्ल हर हसीं की है;

    हुस्न से दिल लगा के हस्ती की;
    हर घड़ी हमने आतशीं की है;

    सुबह-ए-गुल हो की शाम-ए-मैख़ाना;
    मदह उस रू-ए-नाज़नीं की है;

    शैख़ से बे-हिरास मिलते हैं;
    हमने तौबा अभी नहीं की है;

    ज़िक्र-ए-दोज़ख़, बयान-ए-हूर-ओ-कुसूर;
    बात गोया यहीं कहीं की है;

    फ़ैज़ औज-ए-ख़याल से हमने;
    आसमां सिन्ध की ज़मीं की है।
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • अब किस से कहें और कौन सुने जो हाल तुम्हारे बाद हुआ;
    इस दिल की झील सी आँखों में इक ख़्वाब बहुत बर्बाद हुआ;

    ये हिज्र-हवा भी दुश्मन है इस नाम के सारे रंगों की;
    वो नाम जो मेरे होंटों पे ख़ुशबू की तरह आबाद हुआ;

    उस शहर में कितने चेहरे थे कुछ याद नहीं सब भूल गए;
    इक शख़्स किताबों जैसा था वो शख़्स ज़बानी याद हुआ;

    वो अपने गाँव की गलियाँ थी दिल जिन में नाचता गाता था;
    अब इस से फ़र्क नहीं पड़ता नाशाद हुआ या शाद हुआ;

    बेनाम सताइश रहती थी इन गहरी साँवली आँखों में;
    ऐसा तो कभी सोचा भी न था अब जितना बेदाद हुआ।
    ~ Noshi Gilani
  • कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता;
    तुम न होते न सही ज़िक्र तुम्हारा होता;

    तर्क-ए-दुनिया का ये दावा है फ़ुज़ूल ऐ ज़ाहिद;
    बार-ए-हस्ती तो ज़रा सर से उतारा होता;

    वो अगर आ न सके मौत ही आई होती;
    हिज्र में कोई तो ग़म-ख़्वार हमारा होता;

    ज़िन्दगी कितनी मुसर्रत से गुज़रती या रब;
    ऐश की तरह अगर ग़म भी गवारा होता;

    अज़मत-ए-गिर्या को कोताह-नज़र क्या समझें;
    अश्क अगर अश्क न होता तो सितारा होता;

    कोई हम-दर्द ज़माने में न पाया 'अख़्तर';
    दिल को हसरत ही रही कोई हमारा होता।
    ~ Akhtar Sheerani
  • उलझा दिल-ए-सितम-ज़दा ज़ुल्फ़-ए-बुताँ से आज;
    नाज़िल हुई बला मेरे सर पर कहाँ से आज;

    तड़पूँगा हिज्र-ए-यार में है रात चौधवीं;
    तन चाँदनी में होगा मुक़ाबिल कताँ से आज;

    दो-चार रश्क-ए-माह भी हम-राह चाहिएँ;
    वादा है चाँदनी में किसी मेहर-बाँ से आज;

    हंगाम-ए-वस्ल रद्द-ओ-बदल मुझ से है अबस;
    निकलेगा कुछ न काम नहीं और हाँ से आज;

    क़ार-ए-बदन में रूह पुकारी ये वक़्त-ए-नज़ा;
    मुद्दत के बाद उठते हैं हम इस मकाँ से आज;

    अँधेर था निगाह-ए-'अमानत' में शाम सहर;
    तुम चाँद की तरह निकल आए कहाँ से आज।
    ~ Amanat Lakhnavi
  • तुम्हारे जैसे लोग जबसे मेहरबान नहीं रहे;
    तभी से ये मेरे जमीन-ओ-आसमान नहीं रहे;

    खंडहर का रूप धरने लगे है बाग शहर के;
    वो फूल-ओ-दरख्त, वो समर यहाँ नहीं रहे;

    सब अपनी अपनी सोच अपनी फिकर के असीर हैं;
    तुम्हारें शहर में मेरे मिजाज़ दा नहीं रहें;

    उसे ये गम है, शहर ने हमारी बात जान ली;
    हमें ये दुःख है उस के रंज भी निहां नहीं रहे;

    बोहत है यूँ तो मेरे इर्द-गिर्द मेरे आशना;
    तुम्हारे बाद धडकनों के राजदान नहीं रहे;

    असीर हो के रह गए हैं शहर की फिजाओं में;
    परिंदे वाकई चमन के तर्जुमान नहीं रहे।
    ~ Aitbar Sajid
  • जग में आकर इधर उधर देखा...

    जग में आकर इधर उधर देखा;
    तू ही आया नज़र जिधर देखा;

    जान से हो गए बदन ख़ाली;
    जिस तरफ़ तूने आँख भर देखा;

    नाला, फ़रियाद, आह और ज़ारी;
    आप से हो सका सो कर देखा;

    उन लबों ने की न मसीहाई;
    हम ने सौ-सौ तरह से मर देखा;

    ज़ोर आशिक़ मिज़ाज है कोई;
    'दर्द' को क़िस्स:-ए- मुख्तसर देखा।
    ~ Khwaja Mir Dard
  • गुल को महबूब में क़यास किया;
    फ़र्क़ निकला बहोत जो बास किया;

    दिल ने हम को मिसाल-ए-आईना;
    एक आलम से रू-शिनास किया;

    कुछ नहीं सूझता हमें उस बिन;
    शौक़ ने हम को बे-हवास किया;

    सुबह तक शमा सर को ढुँढती रही;
    क्या पतंगे ने इल्तेमास किया;

    ऐसे वहाशी कहाँ हैं अए ख़ुबाँ;
    'मीर' को तुम ने अबस उदास किया।
    ~ Meer Taqi Meer