• हर जनम में....

    हर जनम में उसी की चाहत थे;
    हम किसी और की अमानत थे;

    उसकी आँखों में झिलमिलाती हुई;
    हम ग़ज़ल की कोई अलामत थे;

    तेरी चादर में तन समेट लिया;
    हम कहाँ के दराज़क़ामत थे;

    जैसे जंगल में आग लग जाये;
    हम कभी इतने ख़ूबसूरत थे;

    पास रहकर भी दूर-दूर रहे;
    हम नये दौर की मोहब्बत थे;

    इस ख़ुशी में मुझे ख़याल आया;
    ग़म के दिन कितने ख़ूबसूरत थे

    दिन में इन जुगनुओं से क्या लेना;
    ये दिये रात की ज़रूरत थे।
    ~ Bashir Badr
  • कोई बिजली इन ख़राबों में घटा रौशन करे;
    ऐ अँधेरी बस्तियो! तुमको खुदा रौशन करे;

    नन्हें होंठों पर खिलें मासूम लफ़्ज़ों के गुलाब;
    और माथे पर कोई हर्फ़-ए-दुआ रौशन करे;

    ज़र्द चेहरों पर भी चमके सुर्ख जज़्बों की धनक;
    साँवले हाथों को भी रंग-ए-हिना रौशन करे;

    एक लड़का शहर की रौनक़ में सब कुछ भूल जाए;
    एक बुढ़िया रोज़ चौखट पर दिया रौशन करे;

    ख़ैर अगर तुम से न जल पाएँ वफाओं के चिराग;
    तुम बुझाना मत जो कोई दूसरा रौशन करे।
    ~ Irfan Siddiqi
  • तेरा चेहरा सुब्ह का तारा लगता है;
    सुब्ह का तारा कितना प्यारा लगता है;

    तुम से मिल कर इमली मीठी लगती है;
    तुम से बिछड़ कर शहद भी खारा लगता है;

    रात हमारे साथ तू जागा करता है;
    चाँद बता तू कौन हमारा लगता है;

    किस को खबर ये कितनी कयामत ढाता है;
    ये लड़का जो इतना बेचारा लगता है;

    तितली चमन में फूल से लिपटी रहती है;
    फिर भी चमन में फूल कँवारा लगता है;

    'कैफ' वो कल का 'कैफ' कहाँ है आज मियाँ;
    ये तो कोई वक्त का मारा लगता है।
    ~ Kaif Bhopali
  • नज़र फ़रेब-ए-कज़ा खा गई तो क्या होगा;
    हयात मौत से टकरा गई तो क्या होगा;

    नई सहर के बहुत लोग मुंतज़िर हैं मगर;
    नई सहर भी कजला गई तो क्या होगा;

    न रहनुमाओं की मजलिस में ले चलो मुझको;
    मैं बे-अदब हूँ हँसी आ गई तो क्या होगा;

    ग़म-ए-हयात से बेशक़ है ख़ुदकुशी आसाँ;
    मगर जो मौत भी शर्मा गई तो क्या होगा;

    शबाब-ए-लाला-ओ-गुल को पुकारनेवालों;
    ख़िज़ाँ-सिरिश्त बहार आ गई तो क्या होगा;

    ख़ुशी छीनी है तो ग़म का भी ऐतमाद न कर;
    जो रूह ग़म से भी उकता गई तो क्या होगा।
    ~ Ehsaan Danish
  • तेरे कमाल की हद...

    तेरे कमाल की हद कब कोई बशर समझा;
    उसी क़दर उसे हैरत है, जिस क़दर समझा;

    कभी न बन्दे-क़बा खोल कर किया आराम;
    ग़रीबख़ाने को तुमने न अपना घर समझा;

    पयामे-वस्ल का मज़मूँ बहुत है पेचीदा;
    कई तरह इसी मतलब को नामाबर समझा;

    न खुल सका तेरी बातों का एक से मतलब;
    मगर समझने को अपनी-सी हर बशर समझा।
    ~ Shad Azeembadi
  • मेरी रातों की राहत, दिन के इत्मिनान ले जाना;
    तुम्हारे काम आ जायेगा, यह सामान ले जाना;

    तुम्हारे बाद क्या रखना अना से वास्ता कोई;
    तुम अपने साथ मेरा उम्र भर का मान ले जाना;

    शिकस्ता के कुछ रेज़े पड़े हैं फर्श पर, चुन लो;
    अगर तुम जोड़ सको तो यह गुलदान ले जाना;

    तुम्हें ऐसे तो खाली हाथ रुखसत कर नहीं सकते;
    पुरानी दोस्ती है, की कुछ पहचान ले जाना;

    इरादा कर लिया है तुमने गर सचमुच बिछड़ने का;
    तो फिर अपने यह सारे वादा-ओ-पैमान ले जाना;

    अगर थोड़ी बहुत है, शायरी से उनको दिलचस्पी;
    तो उनके सामने मेरा यह दीवान ले जाना।
    ~ Aitbar Sajid
  • बुझी नज़र तो करिश्मे भी रोज़ो शब के गये;
    कि अब तलक नही पलटे हैं लोग कब के गये;

    करेगा कौन तेरी बेवफ़ाइयों का गिला;
    यही है रस्मे ज़माना तो हम भी अब के गये;

    मगर किसी ने हमें हमसफ़र नही जाना;
    ये और बात कि हम साथ साथ सब के गये;

    अब आये हो तो यहाँ क्या है देखने के लिए;
    ये शहर कब से है वीरां वो लोग कब के गये;

    गिरफ़्ता दिल थे मगर हौसला नहीं हारा;
    गिरफ़्ता दिल है मगर हौंसले भी अब के गये;

    तुम अपनी शम्ऐ-तमन्ना को रो रहे हो 'फ़राज़';
    इन आँधियों में तो प्यारे चिराग सब के गये।
    ~ Ahmad Faraz
  • भड़का रहे हैं आग...

    भड़का रहे हैं आग लब-ए-नग़्मागार से हम;
    ख़ामोश क्या रहेंगे ज़माने के डर से हम;

    कुछ और बड़ गए अंधेरे तो क्या हुआ;
    मायूस तो नहीं हैं तुलु-ए-सहर से हम;

    ले दे के अपने पास फ़क़त एक नज़र तो है;
    क्यों देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम

    माना कि इस ज़मीं को न गुलज़ार कर सके;
    कुछ ख़ार कम कर गए गुज़रे जिधर से हम।
    ~ Sahir Ludhianvi
  • फिर उसके जाते ही दिल सुनसान हो कर रह गया;
    अच्छा भला इक शहर वीरान हो कर रह गया;

    हर नक्श बतल हो गया अब के दयार-ए-हिज्र में;
    इक ज़ख्म गुज़रे वक्त की पहचान हो कर रह गया;

    रुत ने मेरे चारों तरफ खींचें हिसार-ए-बाम-ओ-दर;
    यह शहर फिर मेरे लिए ज़ान्दान हो कर रह गया;

    कुछ दिन मुझे आवाज़ दी लोगों ने उस के नाम से;
    फिर शहर भर में वो मेरी पहचान हो कर रह गया;

    इक ख्वाब हो कर रह गई गुलशन से अपनी निस्बतें;
    दिल रेज़ा रेज़ा कांच का गुलदान हो कर रह गया;

    ख्वाहिश तो थी "साजिद" मुझे तशीर-ए-मेहर-ओ-माह की;
    लेकिन फ़क़त मैं साहिब-ए-दीवान हो कर रह गया।
    ~ Aitbar Sajid
  • कहाँ ले जाऊँ दिल...

    कहाँ ले जाऊँ दिल दोनों जहाँ में इसकी मुश्किल है;
    यहाँ परियों का मजमा है, वहाँ हूरों की महफ़िल है;

    इलाही कैसी-कैसी सूरतें तूने बनाई हैं;
    के हर सूरत कलेजे से लगा लेने के क़ाबिल है;

    ये दिल लेते ही शीशे की तरह पत्थर पे दे मारा;
    मैं कहता रह गया ज़ालिम मेरा दिल है, मेरा दिल;

    है जो देखा अक्स आईने में अपना बोले झुंजलाकर;
    अरे तू कौन है, हट सामने से क्यों मुक़ाबिल है;

    हज़ारों दिल मसल कर पांओ से झुंजला के फ़रमाया;
    लो पहचानो तुम्हारा इन दिलों में कौन सा दिल है।
    ~ Akbar Allahabadi