• ये दिल में वसवसा क्या पल रहा है;
    तेरा मिलना भी मुझ को खल रहा है;

    जिसे मैंने किया था बे-ख़ुदी में;
    जबीं पर अब वो सजदा जल रहा है;

    मुझे मत दो मुबारक-बाद-ए-हस्ती;
    किसी का है ये साया चल रहा है;

    सर-ए-सहरा सदा दिल के शजर से;
    बरसता दूर एक बादल रहा है;

    फ़साद-ए-लग़्ज़िश-ए-तख़लीक़-ए-आदम;
    अभी तक हाथ यज़दाँ मल रहा है;

    दिलों की आग क्या काफ़ी नहीं है;
    जहन्नम बे-ज़रूरत जल रहा है।
    ~ Asif Raza
  • ख़ातिर से तेरी याद को टलने नहीं देते;
    सच है कि हम ही दिल को संभलने नहीं देते;

    आँखें मुझे तलवों से वो मलने नहीं देते;
    अरमान मेरे दिल का निकलने नहीं देते;

    किस नाज़ से कहते हैं वो झुंझला के शब-ए-वस्ल;
    तुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते;

    परवानों ने फ़ानूस को देखा तो ये बोले;
    क्यों हम को जलाते हो कि जलने नहीं देते;

    हैरान हूँ किस तरह करूँ अर्ज़-ए-तमन्ना;
    दुश्मन को तो पहलू से वो टलने नहीं देते;

    दिल वो है कि फ़रियाद से लबरेज़ है हर वक़्त;
    हम वो हैं कि कुछ मुँह से निकलने नहीं देते।
    ~ Akbar Allahabadi
  • पूछा किसी ने हाल...

    पूछा किसी ने हाल किसी का तो रो दिए;
    पानी में अक्स चाँद का देखा तो रो दिए;

    नग़्मा किसी ने साज़ पे छेड़ा तो रो दिए;
    ग़ुंचा किसी ने शाख़ से तोड़ा तो रो दिए;

    उड़ता हुए ग़ुबार सर-ए-राह देख कर;
    अंजाम हम ने इश्क़ का सोचा तो रो दिए;

    बादल फ़ज़ा में आप की तस्वीर बन गए;
    साया कोई ख़याल से गुज़रा तो रो दिए;

    रंग-ए-शफ़क़ से आग शगूफ़ों में लग गई;
    'साग़र' हमारे हाथ से छलका तो रो दिए।
    ~ Saghar Siddiqui
  • ऐसे हिज्र के मौसम...

    ऐसे हिज्र के मौसम अब कब आते हैं;
    तेरे अलावा याद हमें सब आते हैं;

    जज़्ब करे क्यों रेत हमारे अश्कों को;
    तेरा दामन तर करने अब आते हैं;

    अब वो सफ़र की ताब नहीं बाक़ी वरना;
    हम को बुलावे दश्त से जब-तब आते हैं;

    जागती आँखों से भी देखो दुनिया को;
    ख़्वाबों का क्या है वो हर शब आते हैं;

    काग़ज़ की कश्ती में दरिया पार किया;
    देखो हम को क्या-क्या करतब आते हैं।
    ~ Shahryar
  • हर शाम जलते जिस्मों का गाढ़ा धुआँ है शहर;
    मरघट कहाँ है कोई बताओ कहाँ है यह शहर;

    फुटपाथ पर जो लाश पड़ी है उसी की है;
    जिस गाँव को यकीं था की रोज़ी-रसाँ है शहर;

    मर जाइए तो नाम-ओ-नसब पूछता नहीं;
    मुर्दों के सिलसिले में बहुत मेहरबाँ है शहर;

    रह-रह कर चीख़ उठते हैं सन्नाटे रात को;
    जंगल छुपे हुए हैं वहीं पर जहाँ है शहर;

    भूचाल आते रहते हैं और टूटता नहीं;
    हम जैसे मुफ़लिसों की तरह सख़्त जाँ है शहर;

    लटका हुआ ट्रेन के डिब्बों में सुबह-ओ-शाम;
    लगता है अपनी मौत के मुँह में रवाँ है शहर।
    ~ Aziz Qaizi
  • कोई सूरत निकलती...

    कोई सूरत निकलती क्यों नहीं है;
    यहाँ हालत बदलती क्यों नहीं है;

    ये बुझता क्यों नहीं है उनका सूरज;
    हमारी शमा जलती क्यों नहीं है;

    अगर हम झेल ही बैठे हैं इसको;
    तो फिर ये रात ढलती क्यों नहीं है;

    मोहब्बत सिर को चढ़ जाती है, अक्सर;
    मेरे दिल में मचलती क्यों नहीं है।
    ~ Zafar Iqbal
  • मिलकर जुदा हुए तो...

    मिलकर जुदा हुए तो न सोया करेंगे हम;
    एक दूसरे की याद में रोया करेंगे हम;

    आँसू छलक छलक के सतायेंगे रात भर;
    मोती पलक पलक में पिरोया करेंगे हम;

    जब दूरियों की आग दिलों को जलायेगी;
    जिस्मों को चाँदनी में भिगोया करेंगे हम;

    गर दे गया दग़ा हमें तूफ़ान भी "क़तील";
    साहिल पे कश्तियों को डूबोया करेंगे हम।
    ~ Qateel Shifai
  • तुम्हारे जैसे लोग जबसे मेहरबान नहीं रहे;
    तभी से ये मेरे जमीन-ओ-आसमान नहीं रहे;

    खंडहर का रूप धरने लगे है बाग शहर के;
    वो फूल-ओ-दरख्त, वो समर यहाँ नहीं रहे;

    सब अपनी अपनी सोच अपनी फिकर के असीर हैं;
    तुम्हारे शहर में मेरे मिजाज़ दा नहीं रहे;

    उसे ये गम है, शहर ने हमारी बात जान ली;
    हमें ये दुःख है उस के रंज भी निहां नहीं रहे;

    बहुत है यूँ तो मेरे इर्द-गिर्द मेरे आशना;
    तुम्हारे बाद धडकनों के राजदान नहीं रहे;

    असीर हो के रह गए हैं शहर की फिजाओं में;
    परिंदे वाकई चमन के तर्जुमान नहीं रहे।
    ~ Aitbar Sajid
  • आज भड़की रग-ए-वहशत तेरे दीवानों की;
    क़िस्मतें जागने वाली हैं बयाबानों की;

    फिर घटाओं में है नक़्क़ारा-ए-वहशत की सदा;
    टोलियाँ बंध के चलीं दश्त को दीवानों की;

    आज क्या सूझ रही है तेरे दीवानों को;
    धज्जियाँ ढूँढते फिरते हैं गरेबानों की;

    रूह-ए-मजनूँ अभी बेताब है सहराओं में;
    ख़ाक बे-वजह नहीं उड़ती बयाबानों की;

    उस ने 'एहसान' कुछ इस नाज़ से मुड़ कर देखा;
    दिल में तस्वीर उतर आई परी-ख़ानों की।
    ~ Ehsaan Danish
  • आज किसी ने बातों बातों में...

    आज किसी ने बातों बातों में, जब उन का नाम लिया;
    दिल ने जैसे ठोकर खाई, दर्द ने बढ़कर थाम लिया;

    घर से दामन झाड़ के निकले, वहशत का सामान न पूछ;
    यानी गर्द-ए-राह से हमने, रख़्त-ए-सफ़र का काम लिया;

    दीवारों के साये-साये, उम्र बिताई दीवाने;
    मुफ़्त में तनासानि-ए-ग़म का अपने पर इल्ज़ाम लिया;

    राह-ए-तलब में चलते चलते, थक के जब हम चूर हुए;
    ज़ुल्फ़ की ठंडी छांव में बैठे, पल दो पल आराम लिया;

    होंठ जलें या सीना सुलगे, कोई तरस कब खाता है;
    जाम उसी का जिसने 'ताबाँ', जुर्रत से कुछ काम लिया।
    ~ Ghulam Rabbani Taban