• आँखों ने हाल कह दिया होंठ न फिर हिला सके,
    दिल में हज़ार ज़ख्म थे जो न उन्हें दिखा सके;

    घर में जो एक चिराग था तुम ने उसे बुझा दिया,
    कोई कभी चिराग हम घर में न फिर जला सके;

    शिकवा नहीं है अर्ज़ है मुमकिन अगर हो आप से,
    दीजे मुझ को ग़म जरूर दिल जो मिरा उठा सके;

    वक़्त क़रीब आ गया हाल अजीब हो गया,
    ऐसे में तेरा नाम हम फिर भी न लब पे ला सके;

    उस ने भुला के आप को नजरों से भी गिरा दिया,
    'नासिर'-ए-ख़स्ता-हाल फिर क्यों न उसे भुला सके।
    ~ Hakim Nasir
  • आँखों में धूप दिल में हरारत लहू की थी,
    आतिश जवान था तो क़यामत लहू की थी;

    ज़ख़्मी हुआ बदन तो वतन याद आ गया,
    अपनी गिरह में एक रिवायत लहू की थी;

    ख़ंजर चला के मुझ पे बहुत ग़म-ज़दा हुआ,
    भाई के हर सुलूक में शिद्दत लहू की थी;

    कोह-ए-गिराँ के सामने शीशे की क्या बिसात,
    अहद-ए-जुनूँ में सारी शरारत लहू की थी;

    रूख़्सार ओ चश्म ओ लब गुल ओ सहबा शफ़क़ हिना,
    दुनिया-ए-रंग-ओ-बू में तिजारत लहू की थी;

    'ख़ालिद' हर एक ग़म में बराबर का शरीक था,
    सारे जहाँ के बीच रफ़ाकत लहू की थी।
    ~ Khalid Mahmood
  • अपना घर छोड़ के हम लोग वहाँ तक पहुँचे,
    सुब्ह-ए-फ़र्दा की किरन भी न जहाँ तक पहुँचे;

    मैं ने आँखों में छुपा रक्खे हैं कुछ और चराग़,
    रौशनी सुब्ह की शायद न यहाँ तक पहुँचे;

    बे-कहे बात समझ लो तो मुनासिब होगा,
    इस से पहले के यही बात ज़बाँ तक पहुँचे;

    तुम ने हम जैसे मुसाफ़िर भी न देखे होंगे,
    जो बहारों से चले और ख़िज़ाँ तक पहुँचे;

    आज पिंदार-ए-तमन्ना का फ़ुसूँ टूट गया;
    चंद कम-ज़र्फ़ गिले नोक-ए-ज़बाँ तक पहुँचे।
    ~ Iqbal Azeem
  • साफ़ ज़ाहिर है निगाहों से कि हम मरते हैं,
    मुँह से कहते हुए ये बात मगर डरते हैं;

    एक तस्वीर-ए-मोहब्बत है जवानी गोया,
    जिस में रंगो की एवज़ ख़ून-ए-जिगर भरते हैं;

    इशरत-ए-रफ़्ता ने जा कर न किया याद हमें,
    इशरत-ए-रफ़्ता को हम याद किया करते हैं;

    आसमां से कभी देखी न गई अपनी ख़ुशी,
    अब ये हालात हैं कि हम हँसते हुए डरते हैं;

    शेर कहते हो बहुत ख़ूब तुम "अख्तर" लेकिन,
    अच्छे शायर ये सुना है कि जवां मरते हैं।
    ~ Akhtar Ansari
  • न मंदिर में सनम होते, न मस्जिद में खुदा होता,
    हमीं से यह तमाशा है, न हम होते तो क्या होता;

    न ऐसी मंजिलें होतीं, न ऐसा रास्ता होता,
    संभल कर हम ज़रा चलते तो आलम ज़ेरे-पा होता;

    घटा छाती, बहार आती, तुम्हारा तज़किरा होता,
    फिर उसके बाद गुल खिलते कि ज़ख़्मे-दिल हरा होता;

    बुलाकर तुमने महफ़िल में हमको गैरों से उठवाया,
    हमीं खुद उठ गए होते, इशारा कर दिया होता;

    तेरे अहबाब तुझसे मिल के भी मायूस लौट गए,
    तुझे 'नौशाद' कैसी चुप लगी थी, कुछ कहा होता।
    ~ Naushad Lakhnawi
  • एहसास में शिद्दत है वही, कम नहीं होती,
    एक उम्र हुई, दिल की लगी कम नही होती;

    लगता है कहीं प्यार में थोड़ी-सी कमी थी,
    और प्यार में थोड़ी-सी कमी कम नहीं होती;

    अक्सर ये मेरा ज़ह्न भी थक जाता है लेकिन,
    रफ़्तार ख़यालों की कभी कम नहीं होती;

    था ज़ह्र को होंठों से लगाना ही मुनासिब,
    वरना ये मेरी तश्नालबी कम नहीं होती;

    मैं भी तेरे इक़रार पे फूला न समाता,
    तुझको भी मुझे पाके खुशी कम नहीं होती;

    फ़ितरत में तो दोनों की बहुत फ़र्क़ है लेकिन,
    ताक़त में समंदर से नदी कम नहीं होती।
    ~ Aqeel Nomani
  • बुझा है दिल भरी महफ़िल में रौशनी देकर,
    मरूँगा भी तो हज़ारों को ज़िन्दगी देकर;

    क़दम-क़दम पे रहे अपनी आबरू का ख़याल,
    गई तो हाथ न आएगी जान भी देकर;

    बुज़ुर्गवार ने इसके लिए तो कुछ न कहा,
    गए हैं मुझको दुआ-ए-सलामती देकर;

    हमारी तल्ख़-नवाई को मौत आ न सकी,
    किसी ने देख लिया हमको ज़हर भी देकर;

    न रस्मे दोस्ती उठ जाए सारी दुनिया से,
    उठा न बज़्म से इल्ज़ामे दुश्मनी देकर;

    तिरे सिवा कोई क़ीमत चुका नहीं सकता,
    लिया है ग़म तिरा दो नयन की ख़ुशी देकर।
    ~ Nazeer Banarsi
  • हर एक शाम का मंज़र धुआँ उगलने लगा,
    वो देखो दूर कहीं आसमाँ पिघलने लगा;

    तो क्या हुआ जो मयस्सर कोई लिबास नहीं,
    पहन के धूप मैं अपने बदन पे चलने लगा;

    मैं पिछली रात तो बेचैन हो गया इतना,
    कि उस के बाद ये दिल ख़ुद-ब-ख़ुद बहलने लगा;

    अजीब ख़्वाब थे शीशे की किर्चियों की तरह,
    जब उन को देखा तो आँखों से ख़ूँ निकलने लगा;

    बना के दाएरा यादें सिमट के बैठ गईं.
    ब-वक़्त-ए-शाम जो दिल का अलाव जलने लगा।
    ~ Ameer Imam
  • कब वो ज़ाहिर होगा और हैरान कर देगा मुझे,
    जितनी भी मुश्किल में हूँ आसान कर देगा मुझे;

    रू-ब-रू कर के कभी अपने महकते सुर्ख़ होंठ,
    एक दो पल के लिए गुलदान कर देगा मुझे;

    रूह फूँकेगा मोहब्बत की मेरे पैकर में वो,
    फिर वो अपने सामने बे-जान कर देगा मुझे;

    ख़्वाहिशों का ख़ूँ बहाएगा सर-ए-बाज़ार-ए-शौक़,
    और मुकम्मल बे-ए-सर-ओ-सामान कर देगा मुझे;

    मुनहदिम कर देगा आ कर सारी तामीरात-ए-दिल,
    देखते ही देखते वीरान कर देगा मुझे;

    या तो मुझ से वो छुड़ा देगा ग़ज़ल-गोई 'ज़फ़र',
    या किसी दिन साहब-ए-दीवान कर देगा मुझे।
    ~ Zafar Iqbal
  • निगाहों का मर्कज़ बना जा रहा हूँ;
    मोहब्बत के हाथों लुटा जा रहा हूँ;

    मैं क़तरा हूँ लेकिन ब-आग़ोशे-दरिया;
    अज़ल से अबद तक बहा जा रहा हूँ;

    वही हुस्न जिसके हैं ये सब मज़ाहिर;
    उसी हुस्न से हल हुआ जा रहा हूँ;

    न जाने कहाँ से न जाने किधर को;
    बस इक अपनी धुन में उड़ा जा रहा हूँ;

    न सूरत न मआनी न पैदा, न पिन्हाँ
    ये किस हुस्न में गुम हुआ जा रहा हूँ।
    ~ Jigar Moradabadi