सारी बस्ती में ये जादू...

सारी बस्ती में ये जादू नज़र आए मुझको;
जो दरीचा भी खुले तू नज़र आए मुझको;

सदियों का रस जगा मेरी रातों में आ गया;
मैं एक हसीन शक्स की बातों में आ गया;

जब तस्सवुर मेरा चुपके से तुझे छू आए;
देर तक अपने बदन से तेरी खुशबू आए;

गुस्ताख हवाओं की शिकायत न किया कर;
उड़ जाए दुपट्टा तो खनक ओढ़ लिया कर;

तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं;
एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं;

रात के सन्नाटे में हमने क्या-क्या धोखे खाए हैं;
अपना ही जब दिल धड़का तो हम समझे वो आए हैं।
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अब कौन से मौसम से...

अब कौन से मौसम से कोई आस लगाए;
बरसात में भी याद जब न उनको हम आए;

मिटटी की महक साँस की ख़ुश्बू में उतर कर;
भीगे हुए सब्जे की तराई में बुलाए;

दरिया की तरह मौज में आई हुई बरखा;
ज़रदाई हुई रुत को हरा रंग पिलाए;

बूँदों की छमाछम से बदन काँप रहा है;
और मस्त हवा रक़्स की लय तेज़ कर जाए;

हर लहर के पावों से लिपटने लगे घूँघरू;
बारिश की हँसी ताल पे पाज़ेब जो छनकाए;

अंगूर की बेलों पे उतर आए सितारे;
रुकती हुई बारिश ने भी क्या रंग दिखाए।
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वो कभी मिल जाएँ तो...

वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए;
रात दिन सूरत को देखा कीजिए;

चाँदनी रातों में इक इक फूल को;
बे-ख़ुदी कहती है सजदा कीजिए;

जो तमन्ना बर न आए उम्र भर;
उम्र भर उस की तमन्ना कीजिए;

इश्क़ की रंगीनियों में डूब कर;
चाँदनी रातों में रोया कीजिए;

पूछ बैठे हैं हमारा हाल वो;
बे-ख़ुदी तू ही बता क्या कीजिए;

हम ही उस के इश्क़ के क़ाबिल न थे;
क्यों किसी ज़ालिम का शिकवा कीजिए;

आप ही ने दर्द-ए-दिल बख़्शा हमें;
आप ही इस का मुदावा कीजिए;

कहते हैं 'अख़्तर' वो सुन कर मेरे शेर;
इस तरह हम को न रुसवा कीजिए।
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रात के टुकड़ों पे...

रात के टुकड़ों पे पलना छोड़ दे;
शमा से कहना कि जलना छोड़ दे;

मुश्किलें तो हर सफ़र का हुस्न हैं;
कैसे कोई राह चलना छोड़ दे;

तुझसे उम्मीदे - वफ़ा बेकार है;
कैसे इक मौसम बदलना छोड़ दे;

मैं तो ये हिम्मत दिखा पाया नहीं;
तू ही मेरे साथ चलना छोड़ दे;

कुछ तो कर आदाबे - महफ़िल का लिहाज़;
यार ये पहलू बदलना छोड़ दे।
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हम ही में थी न कोई बात...

हम ही में थी न कोई बात याद न तुम को आ सके;
तुम ने हमें भुला दिया हम न तुम्हें भुला सके;

तुम ही न सुन के अगर क़िस्सा-ए-ग़म सुनेगा कौन;
किस की ज़बान खुलेगी फिर हम न अगर सुना सके;

होश में आ चुके थे हम जोश में आ चुके थे हम;
बज़्म का रंग देख कर सर न मगर उठा सके;

रौनक़-ए-बज़्म बन गए लब पे हिकायतें रहीं;
दिल में शिकायतें रहीं लब न मगर हिला सके;

शौक़-ए-विसाल है यहाँ लब पे सवाल है यहाँ;
किस की मजाल है यहाँ हम से नज़र मिला सके;

अहल-ए-ज़बाँ तो हैं बहुत कोई नहीं है अहल-ए-दिल;
कौन तेरी तरह 'हफ़ीज' दर्द के गीत गा सके।
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