• दुख देकर सवाल करते हो,
    तुम भी गालिब, कमाल करते हो;

    देख कर पुछ लिया हाल मेरा,
    चलो इतना तो ख्याल करते हो;

    शहर-ए-दिल मेँ उदासियाँ कैसी,
    ये भी मुझसे सवाल करते हो;

    मरना चाहे तो मर नही सकते,
    तुम भी जीना मुहाल करते हो;

    अब किस-किस की मिसाल दूँ तुमको,
    तुम हर सितम बेमिसाल करते हो।
    ~ Mirza Ghalib
  • फिर हुनर-मंदों के घर से बे-बुनर जाता हूँ मैं.
    तुम ख़बर बे-ज़ार हो अहल-ए-नज़र जाता हूँ मैं;

    जेब में रख ली हैं क्यों तुम ने ज़ुबानें काट कर,
    किस से अब ये अजनबी पूछे किधर जाता हूँ मैं;

    हाँ मैं साया हूँ किसी शय का मगर ये भी तो देख,
    गर तआक़ुब में न हो सूरज तो मर जाता हूँ मैं;

    हाथ आँखों से उठा कर देख मुझ से कुछ न पूछ,
    क्यों उफ़ुक पर फैलती सुब्हों से डर जाता हूँ मैं;

    'अर्श' रस्मों की पनह-गाहें भी अब सर पर नहीं,
    और वहशी रास्तों पर बे-सिपर जाता हूँ मैं।
    ~ Arsh Siddique
  • बात बनती नहीं ऐसे हालात में,
    मैं भी जज़्बात में, तुम भी जज़्बात में;

    कैसे सहता है मिलके बिछडने का ग़म,
    उससे पूछेंगे अब के मुलाक़ात में;

    मुफ़लिसी और वादा किसी यार का,
    खोटा सिक्का मिले जैसे ख़ैरात में;

    जब भी होती है बारिश कही ख़ून की,
    भीगता हूं सदा मैं ही बरसात में;

    मुझको किस्मत ने इसके सिवा क्या दिया,
    कुछ लकीरें बढा दी मेरे हाथ में;

    ज़िक्र दुनिया का था, आपको क्या हुआ,
    आप गुम हो गए किन ख़यालात में;

    दिल में उठते हुए वसवसों के सिवा,
    कौन आता है 'साग़र' सियह रात में।
    ~ Hanif Sagar
  • कितने शिकवे गिल हैं पहले ही,
    राह में फ़ासले हैं पहले ही;

    कुछ तलाफ़ी निगार-ए-फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ,
    हम लुटे क़ाफ़िले हैं पहले ही;

    और ले जाए गा कहाँ गुचीं,
    सारे मक़्तल खुले हैं पहले ही;

    अब ज़बाँ काटने की रस्म न डाल,
    कि यहाँ लब सिले हैं पहले ही;

    और किस शै की है तलब 'फ़ारिग़',
    दर्द के सिलसिले हैं पहले ही।
    ~ Farigh Bukhari
  • चोट लगी तो अपने अन्दर चुपके चुपके रो लेते हो,
    अच्छी बात है आसानी से ज़ख्मों को तुम धो लेते हो;

    दिन भर कोशश करते हो सब को ग़म का दरमाँ मिल जाये,
    नींद की गोली खाकर शब भर बेफ़िक्री में सो लेते हो;

    अपनों से मोहतात रहो, सब नाहक़ मुश्रिक समझेंगे,
    ज्यों ही अच्छी मूरत देखी पीछे पीछे हो लेते हो;

    ख़ुश-एख्लाक़ी ठीक है लेकिन सेहत पे ध्यान ज़रूरी है,
    बैठे बैठे सब के दुख में अपनी जान भिगो लेते हो;

    'अंसारी जी' आस न रक्खो कोई तुम्हें पढ़ पायेगा,
    क्या यह कम है पलकों में तुम हर्फ़-ए-अश्क पिरो लेते हो।
    ~ Anees Ansari
  • दिल ने एक एक दुख सहा तनहा,
    अंजुमन अंजुमन रहा तन्हा;

    ढलते सायों में तेरे कूचे से,
    कोई गुज़रा है बारहा तन्हा;

    तेरी आहट क़दम क़दम और मैं,
    इस मइयत में भी रहा तन्हा;

    कहना यादों के बर्फ़-ज़ारों से,
    एक आँसू बहा बहा तनहा;

    डूबते साहिलों के मोड़ पे दिल,
    इक खंडर सा रहा सहा तन्हा;

    गूँजता रह गया ख़लाओं में;
    वक़्त का एक क़हक़हा तन्हा।
    ~ Majeed Amjad
  • वही आँखों में और आँखों से पोशिदा भी रहता है,
    मेरी यादों में एक भूला हुआ चेहरा भी रहता है;

    जब उस की सर्द-मेहरी देखता हूँ बुझने लगता हूँ,
    मुझे अपनी अदाकारी का अंदाज़ा भी रहता है;

    मैं उन से भी मिला करता हूँ जिन से दिल नहीं मिलता,
    मगर ख़ुद से बिछड़ जाने का अंदेशा भी रहता है;

    जो मुमकिन हो तो पुर-असरार दुनियाओं में दाख़िल हो,
    कि हर दीवार में एक चोर दरवाज़ा भी रहता है;

    बस अपनी बे-बसी की सातवीं मंज़िल में ज़िंदा हूँ,
    यहाँ पर आग भी रहती है और नौहा भी रहता है।
    ~ Saqi Faruqi
  • अजब यक़ीन उस शख़्स के गुमान में था,
    वो बात करते हुए भी नई उड़ान में था;

    हवा भरी हुई फिरती थी अब के साहिल पर,
    कुछ ऐसा हौसला कश्ती के बादबाँ में था;

    हमारे भीगे हुए पर नहीं खुले वर्ना,
    हमें बुलाता सितारा तो आसमान में था;

    उतर गया है रग-ओ-पय में ज़ाइक़ा उस का,
    अजीब शहद सा कल रात उस ज़बान में था;

    खुली तो आँख तो 'ताबिश' कमाल ये देखा,
    वो मेरी रूह में था और मैं मकान में था।
    ~ Tabish Kamaal
  • उदास रातों में तेज़ काफ़ी की तल्ख़ियों में,
    वो कुछ ज़ियादा ही याद आता है सर्दियों में;

    मुझे इजाज़त नहीं है उस को पुकारने की,
    जो गूँजता है लहू में सीने की धड़कनों में;

    वो बचपना जो उदास राहों में खो गया था,
    मैं ढूँढता हूँ उसे तुम्हारी शरारतों में;

    उसे दिलासे तो दे रहा हूँ मगर से सच है,
    कहीं कोई ख़ौफ़ बढ़ रहा है तसल्लियों में;

    तुम अपनी पोरों से जाने क्या लिख गए थे जानाँ,
    चराग़ रौशन हैं अब भी मेरी हथेलियों में;

    हर एक मौसम में रौशनी सी बिखेरते हैं,
    तुम्हारे ग़म के चराग़ मेरी उदासियों में।
    ~ Syed Wasi Shah
  • कभी मुझ को साथ लेकर, कभी मेरे साथ चल के;
    वो बदल गए अचानक, मेरी ज़िन्दगी बदल के;

    हुए जिस पे मेहरबाँ, तुम कोई ख़ुशनसीब होगा;
    मेरी हसरतें तो निकलीं, मेरे आँसूओं में ढल के;

    तेरी ज़ुल्फ़-ओ-रुख़ के, क़ुर्बाँ दिल-ए-ज़ार ढूँढता है;
    वही चम्पई उजाले, वही सुरमई धुंधल के;

    कोई फूल बन गया है, कोई चाँद कोई तारा;
    जो चिराग़ बुझ गए हैं, तेरी अंजुमन में जल के;

    मेरे दोस्तो ख़ुदारा, मेरे साथ तुम भी ढूँढो;
    वो यहीं कहीं छुपे हैं, मेरे ग़म का रुख़ बदल के;

    तेरी बेझिझक हँसी से, न किसी का दिल हो मैला;
    ये नगर है आईनों का, यहाँ साँस ले संभल के।
    ~ Ehsaan Danish