ग़ज़ल Hindi Shayari (Page 2)

काँटा सा जो चुभा था...

काँटा सा जो चुभा था वो लौ दे गया है क्या;
घुलता हुआ लहू में ये ख़ुर्शीद सा है क्या;

पलकों के बीच सारे उजाले सिमट गए;
साया न साथ दे ये वही मरहला है क्या;

मैं आँधियों के पास तलाश-ए-सबा में हूँ;
तुम मुझ से पूछते हो मेरा हौसला है क्या;

साग़र हूँ और मौज के हर दाएरे में हूँ;
साहिल पे कोई नक़्श-ए-क़दम खो गया है क्या;

सौ सौ तरह लिखा तो सही हर्फ़-ए-आरज़ू;
इक हर्फ़-ए-आरज़ू ही मेरी इंतिहा है क्या;

क्या फिर किसी ने क़र्ज़-ए-मुरव्वत अदा किया;
क्यों आँख बे-सवाल है दिल फिर दुखा है क्या।
~ Ada Jafri
अपने चेहरे से जो...

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे;
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक नज़र आयें कैसे;

घर सजाने का तस्सवुर तो बहुत बाद का है;
पहले ये तय हो कि इस घर को बचायें कैसे;

क़हक़हा आँख का बर्ताव बदल देता है;
हँसने वाले तुझे आँसू नज़र आयें कैसे;

कोई अपनी ही नज़र से तो हमें देखेगा;
एक क़तरे को समंदर नज़र आयें कैसे।
~ Wasim Barelvi
अश्क आंखों में...

अश्क आँखों में कब नहीं आता;
लहू आता है जब नहीं आता;

होश जाता नहीं रहा लेकिन;
जब वो आता है तब नहीं आता;

दिल से रुखसत हुई कोई ख्वाहिश;
गिरिया कुछ बे-सबब नहीं आता;

इश्क का हौसला है शर्त वरना;
बात का किस को ढब नहीं आता;

जी में क्या-क्या है अपने ऐ हमदम;
हर सुखन ता बा-लब नहीं आता।
~ Meer Taqi Meer
न सियो होंठ...

न सियो होंठ, न ख़्वाबों में सदा दो हम को;
मस्लेहत का ये तकाज़ा है, भुला दो हम को;

हम हक़ीक़त हैं, तो तसलीम न करने का सबब;
हां अगर हर्फ़-ए-ग़लत हैं, तो मिटा दो हम को;

शोरिश-ए-इश्क़ में है, हुस्न बराबर का शरीक;
सोच कर ज़ुर्म-ए-मोहब्बत की, सज़ा दो हम को;

मक़सद-जीस्त ग़म-ए-इश्क़ है, सहरा हो कि शहर;
बैठ जाएंगे जहां चाहे, बिठा दो हम को।
~ Ehsaan Danish
घर की दहलीज़ से...

घर की दहलीज़ से बाज़ार में मत आ जाना;
तुम किसी चश्म-ए-ख़रीदार में मत आ जाना;

ख़ाक उड़ाना इन्हीं गलियों में भला लगता है;
चलते फिरते किसी दरबार में मत आ जाना;

यूँ ही ख़ुशबू की तरह फैलते रहना हर सू;
तुम किसी दाम-ए-तलब-गार में मत आ जाना;

दूर साहिल पे खड़े रह के तमाशा करना;
किसी उम्मीद के मझदार में मत आ जाना;

अच्छे लगते हो के ख़ुद-सर नहीं ख़ुद्दार हो तुम;
हाँ सिमट के बुत-ए-पिंदार में मत आ जाना;

चाँद कहता हूँ तो मतलब न ग़लत लेना तुम;
रात को रोज़न-ए-दीवार में मत आ जाना।
~ Aitbar Sajid
नसीब आज़माने के दिन...

नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं;
क़रीब उन के आने के दिन आ रहे हैं;

जो दिल से कहा है जो दिल से सुना है;
सब उनको सुनाने के दिन आ रहे हैं;

अभी से दिल-ओ-जाँ सर-ए-राह रख दो;
कि लुटने-लुटाने के दिन आ रहे हैं;

टपकने लगी उन निगाहों से मस्ती;
निगाहें चुराने के दिन आ रहे हैं;

सबा फिर हमें पूछती फिर रही है;
चमन को सजाने के दिन आ रहे हैं;

चलो 'फ़ैज़' फिर से कहीं दिल लगायें;
सुना है ठिकाने के दिन आ रहे हैं।
~ Faiz Ahmad Faiz
दर्द अपनाता है...

दर्द अपनाता है पराए कौन;
कौन सुनता है और सुनाए कौन;

कौन दोहराए वो पुरानी बात;
ग़म अभी सोया है जगाए कौन;

वो जो अपने हैं क्या वो अपने हैं;
कौन दुख झेले आज़माए कौन;

अब सुकूँ है तो भूलने में है;
लेकिन उस शख़्स को भुलाए कौन;

आज फिर दिल है कुछ उदास उदास;
देखिये आज याद आए कौन।
~ Javed Akhtar
वफ़ाएँ कर के जफ़ाओं का ग़म...

वफ़ाएँ कर के जफ़ाओं का ग़म उठाए जा;
इसी तरह से ज़माने को आज़माए जा;

किसी में अपनी सिफ़त के सिवा कमाल नहीं;
जिधर इशारा-ए-फ़ितरत हो सर झुकाए जा;

वो लौ रबाब से निकली धुआँ उठा दिल से;
वफ़ा का राग इसी धुन में गुनगुनाए जा;

नज़र के साथ मोहब्बत बदल नहीं सकती;
नज़र बदल के मोहब्बत को आज़माए जा;

ख़ुदी-ए-इश्क़ ने जिस दिन से खोल दीं आँखें;
है आँसुओं का तक़ाज़ा कि मुस्कुराए जा;

वफ़ा का ख़्वाब है 'एहसान' ख़्वाब-ए-बे-ताबीर;
वफ़ाएँ कर के मुक़द्दर को आज़माए जा।
~ Ehsaan Danish
आया हूँ संग ओ ख़िश्त के...

आया हूँ संग ओ ख़िश्त के अम्बार देख कर;
ख़ौफ़ आ रहा है साया-ए-दीवार देख कर;

आँखें खुली रही हैं मेरी इंतज़ार में;
आए न ख़्वाब दीद-ए-बे-दार देख कर;

ग़म की दुकान खोल के बैठा हुआ था मैं;
आँसू निकल पड़े हैं ख़रीददार देख कर;

क्या इल्म था फिसलने लगेंगे मेरे क़दम;
मैं तो चला था राह को हम-वार देख कर;

हर कोई पार-साई की उम्दा मिसाल था;
दिल ख़ुश हुआ है एक गुनह-गार देख कर।
~ Adeem Hashmi
मेरी ग़ज़ल की तरह...

मेरी ग़ज़ल की तरह उसकी भी हुकूमत है;
तमाम मुल्क में वो सबसे खूबसूरत है;

कभी-कभी कोई इंसान ऐसा लगता है;
पुराने शहर में जैसे नयी ईमारत है;

बहुत दिनों से मेरे साथ थी मगर कल शाम;
मुझे पता चला वो कितनी खूबसूरत है;

ये ज़ाईरान-ए-अलीगढ़ का खास तोहफ़ा है;
मेरी ग़ज़ल का तबर्रुक दिलों की बरकत है।
~ Bashir Badr

Quotes

जोखिम के बिना जीतना, शान के बिना जीतना है।

Trivia

Waheeda Rahman played both mother and lover to Amitabh Bachchan. She played the love interest of Big B in 'Adalat' (1976) and mother in 'Trishul' (1978).

Graffiti

Alimony - When two people make a mistake and one of them continues to pay for it!