• सफ़ीना ग़र्क़ हुआ मेरा यूँ ख़ामोशी से;
    के सतह-ए-आब पे कोई हबाब तक न उठा;

    समझ न इज्ज़ इसे तेरे पर्दा-दार थे हम;
    हमारा हाथ जो तेरे नक़ाब तक न उठा;

    झिंझोड़ते रहे घबरा के वो मुझे लेकिन;
    मैं अपनी नींद से यौम-ए-हिसाब तक न उठा;

    जतन तो ख़ूब किए उस ने टालने के मगर;
    मैं उस की बज़्म से उस के जवाब तक न उठा।
    ~ Asif Raza
  • हुई है शाम तो आँखों में बस गया फिर तू;
    कहाँ गया है मेरे शहर के मुसाफ़िर तू;

    बहुत उदास है इक शख़्स तेरे जाने से;
    जो हो सके तो चला आ उसी की ख़ातिर तू;

    मेरी मिसाल कि इक नख़्ल-ए-ख़ुश्क-ए-सहरा हूँ;
    तेरा ख़याल कि शाख़-ए-चमन का ताइर तू;

    मैं जानता हूँ के दुनिया तुझे बदल देगी;
    मैं मानता हूँ के ऐसा नहीं बज़ाहिर तू;

    हँसी ख़ुशी से बिछड़ जा अगर बिछड़ना है;
    ये हर मक़ाम पे क्या सोचता है आख़िर तू;

    'फ़राज़' तूने उसे मुश्किलों में डाल दिया;
    ज़माना साहिब-ए-ज़र और सिर्फ़ शायर तू।
    ~ Ahmad Faraz
  • दिल को जब अपने गुनाहों का ख़याल आ जायेगा;
    साफ़ और शफ्फ़ाफ़ आईने में बाल आ जायेगा;

    भूल जायेंगी ये सारी क़हक़हों की आदतें;
    तेरी खुशहाली के सर पर जब ज़वाल आ जायेगा;

    मुसतक़िल सुनते रहे गर दास्ताने कोह कन;
    बे हुनर हाथों में भी एक दिन कमाल आ जायेगा;

    ठोकरों पर ठोकरे बन जायेंगी दरसे हयात;
    एक दिन दीवाने में भी ऐतेदाल आ जायेगा;

    बहरे हाजत जो बढ़े हैं वो सिमट जायेंगे ख़ुद;
    जब भी उन हाथों से देने का सवाल आ जायेगा।
    ~ Anwar Jalalpuri
  • हर एक लम्हे की रग में दर्द का रिश्ता धड़कता है;
    वहाँ तारा लरज़ता है जो याँ पत्ता खड़कता है;

    ढके रहते हैं गहरे अब्र में बातिन के सब मंज़र;
    कभी एक लहज़ा-ए-इदराक बिजली सा कड़कता है;

    मुझे दीवाना कर देती है अपनी मौत की शोख़ी;
    कोई मुझ में रग-ए-इज़हार की सूरत फड़कता है;

    फिर एक दिन आग लग जाती है जंगल में हक़ीक़त के;
    कहीं पहले-पहल एक ख़्वाब का शोला भड़कता है;

    मेरी नज़रें ही मेरे अक्स को मजरूह करती हैं;
    निगाहें मुर्तकिज़ होती हैं और शीशा तड़कता है।
    ~ Abdul Ahad Saaz
  • रूह प्यासी...

    रूह प्यासी कहाँ से आती है;
    ये उदासी कहाँ से आती है;

    दिल है शब दो का तो ऐ उम्मीद ;
    तू निदासी कहाँ से आती है;

    शौक में ऐशे वत्ल के हन्गाम;
    नाशिफासी कहाँ से आती है;

    एक ज़िन्दान-ए-बेदिली और शाम;
    ये सबासी कहाँ से आती है;

    तू है पहलू में फिर तेरी खुशबू;
    होके बासी कहाँ से आती है।
    ~ Jon Elia
  • ख़ुद हिजाबों सा ख़ुद जमाल सा था;
    दिल का आलम भी बे-मिसाल सा था;

    अक्स मेरा भी आइनों में नहीं;
    वो भी कैफ़ियत-ए-ख़याल सा था;

    दश्त में सामने था ख़ेमा-ए-गुल;
    दूरियों में अजब कमाल सा था;

    बे-सबब तो नहीं था आँखों में;
    एक मौसम के ला-ज़वाल सा था;

    ख़ौफ़ अँधेरों का डर उजालों से;
    सानेहा था तो हस्ब-ए-हाल सा था;

    क्या क़यामत है हुज्ला-ए-जाँ में;
    उस के होते हुए मलाल सा था;

    जिस की जानिब 'अदा' नज़र न उठी;
    हाल उस का भी मेरे हाल सा था।
    ~ Ada Jafri
  • तुझ से अब और मोहब्बत...

    तुझ से अब और मोहब्बत नहीं की जा सकती;
    ख़ुद को इतनी भी अज़िय्यत नहीं दी जा सकती;

    जानते हैं कि यक़ीं टूट रहा है दिल पर;
    फिर भी अब तर्क ये वहशत नहीं की जा सकती;

    हवस का शहर है और उस में किसी भी सूरत;
    साँस लेने की सहूलत नहीं दी जा सकती;

    रौशनी के लिए दरवाज़ा खुला रखना है;
    शब से अब कोई इजाज़त नहीं ली जा सकती;

    इश्क़ ने हिज्र का आज़ार तो दे रखा है;
    इस से बढ़ कर तो रिआयत नहीं दी जा सकती।
    ~ Noshi Gilani
  • तू भी तो एक लफ़्ज़ है इक दिन मिरे बयाँ में आ;
    मेरे यक़ीं में गश्त कर मेरी हद-ए-गुमाँ में आ;

    नींदों में दौड़ता हुआ तेरी तरफ़ निकल गया;
    तू भी तो एक दिन कभी मेरे हिसार-ए-जाँ में आ;

    इक शब हमारे साथ भी ख़ंजर की नोक पर कभी;
    लर्ज़ीदा चश्म-ए-नम में चल जलते हुए मकाँ में आ;

    नर्ग़े में दोस्तों के तू कब तक रहेगा सुर्ख़-रू;
    नेज़ा-ब-नेज़ा दू-ब-दू-सफ़्हा-ए-दुश्मनान में आ;

    इक रोज़ फ़िक्र-ए-आब-ओ-नाँ तुझ को भी हो जान-ए-जहाँ;
    क़ौस-ए-अबद को तोड़ कर इस अर्सा-ए-ज़ियाँ में आ।
    ~ Atiqullah
  • छेड़ने का तो मज़ा तब है कहो और सुनो;
    बात में तुम तो ख़फ़ा हो गये, लो और सुनो;

    तुम कहोगे जिसे कुछ, क्यूँ न कहेगा तुम को;
    छोड़ देवेगा भला, देख तो लो, और सुनो;

    यही इंसाफ़ है कुछ सोचो तो अपने दिल में;
    तुम तो सौ कह लो, मेरी एक न सुनो और सुनो;

    आफ़रीं तुम पे, यही चाहिए शाबाश तुम्हें;
    देख रोता मुझे यूँ हँसने लगो और सुनो;

    बात मेरी नहीं सुनते जो अकेले मिल कर;
    ऐसे ही ढँग से सुनाऊँ के सुनो और सुनो।
    ~ Insha Allah Khan Insha
  • अच्छा जो ख़फ़ा हम से हो तुम ऐ सनम अच्छा;
    लो हम भी न बोलेंगे ख़ुदा की क़सम अच्छा;

    मश्ग़ूल क्या चाहिए इस दिल को किसी तौर;
    ले लेंगे ढूँढ और कोई यार हम अच्छा;

    गर्मी ने कुछ आग और ही सीने में लगा दी;
    हर तौर घरज़ आप से मिलना है कम अच्छा;

    अग़ियार से करते हो मेरे सामने बातें;
    मुझ पर ये लगे करने नया तुम सितम अच्छा;

    कह कर गए आता हूँ, कोई दम में मैं तुम पास;
    फिर दे चले कल की सी तरह मुझको दम अच्छा;

    इस हस्ती-ए-मौहूम से मैं तंग हूँ 'इंशा';
    वल्लाह के उस से दम अच्छा।
    ~ Ibn-e-Insha