इश्क़ को तक़लीद से...

इश्क़ को तक़लीद से आज़ाद कर;
दिल से गिरया आँख से फ़रियाद कर;

बाज़ आ ऐ बंदा-ए-हुस्न मिज़ाज़;
यूँ न अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर;

ऐ ख़यालों के मकीं नज़रों से दूर;
मेरी वीराँ ख़ल्वतें आबाद कर;

हुस्न को दुनिया की आँखों से न देख;
अपनी इक तर्ज़-ए-नज़र ईजाद कर;

इशरत-ए-दुनिया है इक ख़्वाब-ए-बहार;
काबा-ए-दिल दर्द से आबाद कर;

अब कहाँ 'एहसान' दुनिया में वफ़ा;
तौबा कर नादाँ ख़ुदा को याद कर।
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ख़ून बर कर मुनासिब...

ख़ून बर कर मुनासिब नहीं दिल बहे;
दिल नहीं मानता कौन दिल से कहे;

तेरी दुनिया में आए बहुत दिन रहे;
सुख ये पाया कि हम ने बहुत दुख सहे;

बुलबुलें गुल के आँसू नहीं चाटतीं;
उन को अपनी ही मरग़ूब हैं चहचहे;

आलम-ए-नज़ा में सुन रहा हूँ में क्या;
ये अज़ीज़ों की चीख़ें हैं कया क़हक़हे;

इस नए हुस्न की भी अदाओं पे हम;
मर मिटेंगे ब-शर्ते-के ज़िंदा रहे;

तुम 'हफ़ीज' अब घिसटने की मंज़िल में हो;
दौर-ए-अय्याम पहिया है ग़म हैं रहे।
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दिल को क्या हो गया...

दिल को क्या हो गया ख़ुदा जाने;
क्यों है ऐसा उदास क्या जाने;

कह दिया मैंने हाल-ए-दिल अपना;
इस को तुम जानो या ख़ुदा जाने;

जानते जानते ही जानेगा;
मुझ में क्या है वो अभी क्या जाने;

तुम न पाओगे सादा दिल मुझसा;
जो तग़ाफ़ुल को भी हया जाने।
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कहीं से कोई हर्फ़-ए-मोतबर...

कहीं से कोई हर्फ़-ए-मोतबर शायद न आए;
मुसाफ़िर लौट कर अब अपने घर शायद न आए;

क़फ़स में आब-ओ-दाने की फ़रावानी बहुत है;
असीरों को ख़याल-ए-बाल-ओ-पर शायद न आए;

किसे मालूम अहल-ए-हिज्र पर ऐसे भी दिन आएँ;
क़यामत सर से गुज़रे और ख़बर शायद न आए;

जहाँ रातों को पड़े रहते हैं आँखें मूँद कर लोग;
वहाँ महताब में चेहरा नज़र शायद न आए;

कभी ऐसा भी दिन निकले के जब सूरज के हम-राह;
कोई साहिब-नज़र आए मगर शायद न आए;

सभी को सहल-अंगारी हुनर लगने लगी है;
सरों पर अब ग़ुबार-ए-रह-गुज़र शायद न आए।
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क्या बताऊं कैसा खुद को...

क्या बताऊं कैसा खुद को दर-ब-दर मैंने किया;
उम्र भर किस-किस के हिस्से का सफ़र मैंने किया;

तू तो नफरत भी न कर पायेगा इस शिद्दत के साथ;
जिस बला का प्यार तुझसे बेखबर मैंने किया;

कैसे बच्चों को बताऊं रास्तों के पेचो-ख़म;
ज़िंदगी भर तो किताबों का सफ़र मैंने किया;

शोहरतों कि नज्र कर दी शेर की मासूमियत;
उस दिये की रौशनी को दर-ब-दर मैंने किया;

चाँद जज्बाती से रिश्ते को बचाने को 'वसीम';
कैसा-कैसा जब्र अपने आप पर मैंने किया।
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तेरे दर से उठकर...

तेरे दर से उठकर जिधर जाऊं मैं;
चलूँ दो कदम और ठहर जाऊं मैं;

अगर तू ख़फा हो तो परवाह नहीं;
तेरा गम ख़फा हो तो मर जाऊं मैं;

तब्बसुम ने इतना डसा है मुझे;
कली मुस्कुराए तो डर जाऊं मैं;

सम्भाले तो हूँ खुदको, तुझ बिन मगर;
जो छू ले कोई तो बिखर जाऊं मैं।
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कोई समझाए ये...

कोई समझाए ये क्या रंग है मैख़ाने का;
आँख साकी की उठे नाम हो पैमाने का;

गर्मी-ए-शमा का अफ़साना सुनाने वालों;
रक्स देखा नहीं तुमने अभी परवाने का;

चश्म-ए-साकी मुझे हर गम पे याद आती है;
रास्ता भूल न जाऊँ कहीं मैख़ाने का;

अब तो हर शाम गुज़रती है उसी कूचे में;
ये नतीजा हुआ ना से तेरे समझाने का;

मंज़िल-ए-ग़म से गुज़रना तो है आसाँ 'इक़बाल';
इश्क है नाम ख़ुद अपने से गुज़र जाने का।
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आफत की शोख़ियां हैं...

आफत की शोख़ियां हैं तुम्हारी निगाह में;
मेहशर के फितने खेलते हैं जल्वा-गाह में;

वो दुश्मनी से देखते हैं देखते तो हैं;
मैं शाद हूँ कि हूँ तो किसी कि निगाह में;

आती है बात बात मुझे याद बार बार;
कहता हूं दौड़ दौड़ के कासिद से राह में;

इस तौबा पर है नाज़ मुझे ज़ाहिद इस कदर;
जो टूट कर शरीक हूँ हाल-ए-तबाह में;

मुश्ताक इस अदा के बहुत दर्दमंद थे;
ऐ 'दाग़' तुम तो बैठ गये एक आह में।
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झूठा निकला...

झूठा निकला क़रार तेरा;
अब किसको है ऐतबार तेरा

; दिल में सौ लाख चुटकियाँ लीं;
देखा बस हम ने प्यार तेरा;

दम नाक में आ रहा था अपने;
था रात ये इंतज़ार तेरा;

कर ज़बर जहाँ तलक़ तू चाहे;
मेरा क्या, इख्तियार तेरा;

लिपटूँ हूँ गले से आप अपने;
समझूँ कि है किनार तेरा;

'इंशा' से मत रूठ, खफा हो;
है बंदा जानिसार तेरा।
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वफ़ाएँ कर के जफ़ाओं का...

वफ़ाएँ कर के जफ़ाओं का ग़म उठाए जा;
इसी तरह से ज़माने को आज़माए जा;

किसी में अपनी सिफ़त के सिवा कमाल नहीं;
जिधर इशारा-ए-फ़ितरत हो सिर झुकाए जा;

वो लौ रबाब से निकली धुआँ उठा दिल से;
वफ़ा का राग इसी धुन में गुनगुनाए जा;

नज़र के साथ मोहब्बत बदल नहीं सकती;
नज़र बदल के मोहब्बत को आज़माए जा;

ख़ुदी-ए-इश्क़ ने जिस दिन से खोल दीं आँखें;
है आँसुओं का तक़ाज़ा कि मुस्कुराए जा;

वफ़ा का ख़्वाब है 'एहसान' ख़्वाब-ए-बे-ताबीर;
वफ़ाएँ कर के मुक़द्दर को आज़माए जा।
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