मेरा जी है जब तक...

मेरा जी है जब तक तेरी जुस्तजू है;
ज़बाँ जब तलक है यही गुफ़्तगू है;

ख़ुदा जाने क्या होगा अंजाम इसका;
मै बेसब्र इतना हूँ वो तुन्द ख़ू है;

तमन्ना है तेरी अगर है तमन्ना;
तेरी आरज़ू है अगर आरज़ू है;

किया सैर सब हमने गुलज़ार-ए-दुनिया;
गुल-ए-दोस्ती में अजब रंग-ओ-बू है;

ग़नीमत है ये दीद वा दीद-ए-याराँ;
जहाँ मूँद गयी आँख, मैं है न तू है;

नज़र मेरे दिल की पड़ी 'दर्द' किस पर;
जिधर देखता हूँ वही रू-ब-रू है।
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तेरे लिए चलते थे...

तेरे लिए चलते थे हम तेरे लिए ठहर गए;
तू ने कहा तो जी उठे तू ने कहा तो मर गए;

वक़्त ही जुदाई का इतना तवील हो गया;
दिल में तेरे विसाल के जितने थे ज़ख़्म भर गए;

होता रहा मुक़ाबला पानी का और प्यास का;
सहरा उमड़ उमड़ पड़े दरिया बिफर बिफर गए;

वो भी ग़ुबार-ए-ख़्वाब था हम ग़ुबार-ए-ख़्वाब थे;
वो भी कहीं बिखर गया हम भी कहीं बिखर गए;

आज भी इंतज़ार का वक़्त हुनूत हो गया;
ऐसा लगा के हश्र तक सारे ही पल ठहर गए;

इतने क़रीब हो गए अपने रक़ीब हो गए;
वो भी 'अदीम' डर गया हम भी 'अदीम' डर गए।
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कोई कैसा हम सफर है...

कोई कैसा हम सफर है, ये अभी से मत बताओ;
अभी क्या पता किसी का, कि चली नहीं है नाव;

ये ज़रूरी तो नहीं है, कि सदा रहे मरासिम;
ये सफर की दोस्ती है, इसे रोग मत बनाओ;

मेरे चारागर बहुत हैं, ये खलिश मगर है दिल में;
कोई ऐसा हो कि, जिस को हों अज़ीज़ मेरे घाव;

तुम्हें आईना गिरी में है, बहुत कमाल हासिल;
मेरा दिल है किरच किरच, इसे जोड़ के दिखाओ;

मुझे क्या पड़ी है 'साजिद', के पराई आग मांगू;
मैं ग़ज़ल का आदमी हूँ, मेरे अपने हैं अलाव।
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आता है याद मुझको...

आता है याद मुझको गुज़रा हुआ ज़माना;
वो बाग़ की बहारें, वो सब का चह-चहाना;

आज़ादियाँ कहाँ वो, अब अपने घोसले की;
अपनी ख़ुशी से आना अपनी ख़ुशी से जाना;

लगती हो चोट दिल पर, आता है याद जिस दम;
शबनम के आँसुओं पर कलियों का मुस्कुराना;

वो प्यारी-प्यारी सूरत, वो कामिनी-सी मूरत;
आबाद जिस के दम से था मेरा आशियाना।
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घर का रस्ता...

घर का रस्ता भी मिला था शायद;
राह में संग-ए-वफ़ा था शायद;

इस क़दर तेज़ हवा के झोंके;
शाख़ पर फूल खिला था शायद;

जिस की बातों के फ़साने लिखे;
उस ने तो कुछ न कहा था शायद;

लोग बे-मेहर न होते होंगे;
वहम सा दिल को हुआ था शायद;

तुझ को भूले तो दुआ तक भूले;
और वही वक़्त-ए-दुआ था शायद;

ख़ून-ए-दिल में तो डुबोया था क़लम;
और फिर कुछ न लिखा था शायद;

दिल का जो रंग है ये रंग-ए-'अदा'
पहले आँखों में रचा था शायद।
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बड़ा वीरान मौसम है...

बड़ा वीरान मौसम है कभी मिलने चले आओ;
हर एक जानिब तेरा ग़म है कभी मिलने चले आओ;

हमारा दिल किसी गहरी जुदाई के भँवर में है;
हमारी आँख भी नम है कभी मिलने चले आओ;

मेरे हम-राह अगरचे दूर तक लोगों की रौनक़ है;
मगर जैसे कोई कम है कभी मिलने चले आओ;

तुम्हें तो इल्म है मेरे दिल-ए-वहशी के ज़ख़्मों को;
तुम्हारा वस्ल मरहम है कभी मिलने चले आओ;

अँधेरी रात की गहरी ख़मोशी और तनहा दिल;
दिए की लौ भी मद्धम है कभी मिलने चले आओ;

हवाओं और फूलों की नई ख़ुशबू बताती है;
तेरे आने का मौसम है कभी मिलने चले आओ।
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वो कभी मिल जाएँ तो...

वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए;
रात दिन सूरत को देखा कीजिए;

चाँदनी रातों में एक एक फूल को;
बे-ख़ुदी कहती है सजदा कीजिए;

जो तमन्ना बर न आए उम्र भर;
उम्र भर उस की तमन्ना कीजिए;

इश्क़ की रंगीनियों में डूब कर;
चाँदनी रातों में रोया कीजिए;

हम ही उस के इश्क़ के क़ाबिल न थे;
क्यों किसी ज़ालिम का शिकवा कीजिए;

कहते हैं 'अख़्तर' वो सुन कर मेरे शेर;
इस तरह हम को न रुसवा कीजिए।
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मुझ पे तूफ़ाँ...

मुझ पे तूफ़ाँ उठाये लोगों ने;
मुफ़्त बैठे बिठाये लोगों ने;

कर दिए अपने आने-जाने के;
तज़किरे जाये-जाये लोगों ने;

वस्ल की बात कब बन आयी थी;
दिल से दफ़्तर बनाये लोगों ने;

बात अपनी वहाँ न जमने दी;
अपने नक़्शे जमाये लोगों ने;

सुनके उड़ती-सी अपनी चाहत की;
दोनों के होश उड़ाये लोगों ने;

क्या तमाशा है जो न देखे थे;
वो तमाशे दिखाये लोगों ने;

कर दिया 'मोमिन' उस सनम को ख़फ़ा;
क्या किया हाये- हाये लोगों ने।
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दिल गया रौनक-ए-हयात

दिल गया रौनक-ए-हयात गई;
ग़म गया सारी कायनात गई;

दिल धड़कते ही फिर गई वो नज़र;
लब तक आई न थी कि बात गई;

उनके बहलाए भी न बहला दिल;
गएगां सइये-इल्तफ़ात गई;

मर्गे आशिक़ तो कुछ नहीं लेकिन;
इक मसीहा-नफ़स की बात गई;

हाय सरशरायां जवानी की;
आँख झपकी ही थी के रात गई;

नहीं मिलता मिज़ाज-ए-दिल हमसे;
ग़ालिबन दूर तक ये बात गई;

क़ैद-ए-हस्ती से कब निजात 'जिगर';
मौत आई अगर हयात गई।
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मैं इस उम्मीद पे डूबा...

मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा;
अब इसके बाद मेरा इम्तिहान क्या लेगा;

ये एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा;
ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा;

मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा;
कोई चिराग नहीं हूँ जो फिर जला लेगा;

कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए;
जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा;

मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे;
सुनेगा तो लकीरें हाथ की अपनी जला लेगा;

हज़ार तोड़ के आ जाऊँ उस से रिश्ता 'वसीम';
मैं जानता हूँ वो जब चाहेगा बुला लेगा।
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