• हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी,
    फिर भी तनहाइयों का शिकार आदमी;

    सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ,
    अपनी ही लाश का खुद मज़ार आदमी;

    हर तरफ भागते दौड़ते रास्ते,
    हर तरफ आदमी का शिकार आदमी;

    रोज जीता हुआ रोज मरता हुआ,
    हर नए दिन नया इंतज़ार आदमी;

    ज़िंदगी का मुक़द्दर सफ़र-दर-सफ़र,
    आखिरी सांस तक बेक़रार आदमी!
    ~ Nida Fazli
  • तू साहिल है मेरा और जिन्दगी कश्ती है,
    तेरी आँखों में देख के खुशी हँसती है;

    ना जा हो कर नाराज़ कहीं दूर मुझसे,
    तेरे दिल में ही साँसें मेरी बसती हैं;

    देता नहीं दीदार कभी क्यों मुझ को तू,
    प्यास-ए-दीदार में आँखें तरसती हैं;

    देखता हूँ बैठे दो पक्षियों को साथ,
    तेरी याद में तब आँखें बरसती हैं;

    बड़ा गुमान है क्यों तुझको खुद पे,
    क्या है पहचान तेरी क्या तेरी हस्ती है;

    आज जाना है दिल के टूटने पे हमने,
    मोहब्बत की नहीं दिलजलों की बस्ती है!
  • जिसको दिल में बसाया हमने वो दूर हमसे रहने लगे,
    जिनको अपना माना हमने वो पराया हमको कहने लगे;

    जो बने कभी हमदर्द हमारे वो दर्द हमको देने लगे,
    जब लगी आग मेरे घर में तो पत्ते भी हवा देने लगे;

    जिनसे की वफ़ा हमने वो बेवफा हमको कहने लगे,
    जिनको दिया मरहम हमने वो ज़ख्म हमको देने लगे;

    बचकर निकलता था काँटों से मगर फूल भी ज़ख्म देने लगे,
    जब लगी आग मेरे घर में तो पत्ते भी हवा देने लगे;

    बनायी जिनकी तस्वीर हमने अब चेहरा वो बदलने लगे,
    जो रहते थे दिल में मेरे अब महलों में जाकर रहने लगे।
  • जिंदगी में दर्द सब सहते रहे,
    जो मिला था प्यार हम खोते रहे;

    नफरतों के बीच नाजुक दिल मेरा,
    तोड़ के वादे सभी चलते रहे;

    बढ रही बेचैनियां मेरी यहाँ,
    रात को तुम ख्वाब में आते रहे;

    लौट आयी जिंदगी फिर से वहीं,
    पेट की उस भूख से रोते रहे;

    आँखों में छाया नशा है प्यार का,
    इश्क में तेरे वफा मिलते रहे;

    चाहतों के दरमियां इंतजार है,
    भूलकर भी आज हम मिलते रहे;

    रख लिया पत्थर दिलों में हमने भी,
    दर्द की दास्तान को सुनते रहे|
  • ग़म मौत का नहीं है,
    ग़म ये कि आखिरी वक़्त भी तू मेरे घर नहीं है;
    निचोड़ अपनी आँखों को, कि दो आँसू टपके,
    और कुछ तो मेरी लाश को हुस्न मिले,
    डाल दे अपने आँचल का टुकड़ा, कि मेरी मय्यत पे कफ़न नहीं है!
  • रात में कौन वहां जाये जहाँ आग लगी,
    सुबह अख़बार में पढ़ लेंगे कहाँ आग लगी;

    आग से आग बुझाने का अमल जारी था,
    हम भी पानी लिए बैठे थे जहाँ आग लगी;

    वो भी अब आग बुझाने को चले आएं हैं,
    जिनको ये भी नहीं मालूम कहाँ आग लगी;

    किसको फुरसत थी जो देता किसी आवाज़ पे ध्यान,
    चीखता फिरता था आवारा धुंआ आग लगी;

    सुबह तक सारे निशानात मिटा डालेंगे,
    कोई पूछेगा तो कह देंगे कहाँ आग लगी।
    ~ Rahat Indori
  • कितने ऐश उड़ाते होंगे कितने इतराते होंगे,
    जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे;

    उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा,
    यूँ ही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे;

    बंद रहे जिन का दरवाज़ा ऐसे घरों की मत पूछो,
    दीवारें गिर जाती होंगी आँगन रह जाते होंगे;

    मेरी साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएंगे,
    यानी मेरे बाद भी यानी साँस लिये जाते होंगे;

    यारो कुछ तो बात बताओ उस की क़यामत बाहों की,
    वो जो सिमटते होंगे इन में वो तो मर जाते होंगे।
    ~ Jon Elia
  • मैं बुरा ही सही भला न सही,
    पर तेरी कौन सी जफ़ा न सही;

    दर्द-ए-दिल हम तो उन से कह गुज़रे,
    गर उन्हों ने नहीं सुना न सही;

    शब-ए-ग़म में बला से शुग़ल तो है,
    नाला-ए-दिल मेरा रसा न सही;

    दिल भी अपना नहीं रहा न रहे,
    ये भी ऐ चर्ख़-ए-फ़ित्ना-ज़ा न सही;

    देख तो लेंगे वो अगर आए,
    ताक़त-ए-अर्ज़-ए-मुद्दआ न सही;

    कुछ तो आशिक़ से छेड़-छाड़ रही;
    कज-अदाई सही अदा न सही;

    क्यूँ बुरा मानते हो शिकवा मेरा,
    चलो बे-जा सही ब-जा न सही;

    उक़दा-ए-दिल हमारा या क़िस्मत,
    न खुला तुझ से ऐ सबा न सही;

    वाइज़ो बंद-ए-ख़ुदा तो है 'ऐश',
    हम ने माना वो पारसा न सही।
    ~ Aish Dehlvi
  • आख़िर-ए-शब वो तेरी अँगड़ाई,
    कहकशाँ भी फलक पे शरमाई;

    आप ने जब तवज्जोह फ़रमाई,
    गुलशन-ए-ज़ीस्त में बहार आई;

    दास्ताँ जब भी अपनी दोहराई,
    ग़म ने की है बड़ी पज़ीराई;

    सजदा-रेज़ी को कैसे तर्क करूँ,
    है यही वजह-ए-इज़्ज़त-अफ़ज़ाई;

    तुम ने अपना नियाज़-मंद कहा,
    आज मेरी मुराद बर आई;

    आप फ़रमाइए कहाँ जाऊँ,
    आप के दर से है शनासाई;

    उस की तक़दीर में है वस्ल की शब,
    जिस ने बर्दाश्त की है तन्हाई;

    रात पहलू में आप थे बे-शक,
    रात मुझ को भी ख़ूब नींद आई;

    मैं हूँ यूँ इस्म-ब-मुसम्मा 'अज़ीज़',
    वारिश-ए-पाक का हूँ शैदाई।
    ~ Aziz Warsi
  • ये किसने गला घोंट दिया जिन्दादिली का,
    चेहरे पे हँसी है कि जनाजा है हँसी का;

    हर हुस्न में उस हुस्न की हल्की सी झलक है,
    दीदार का हक मुझको है जल्वा हो किसी का;

    रक्साँ है कोई हूर कि लहराती है सहबा,
    उड़ना कोई देखे मिरे शीशे की परी का;

    जब रात गले मिलके बिछड़ती है सहर से,
    याद आता है मंजर तेरी रूखसत की घड़ी का;

    उन आँखों के पैमानों से छलकी जो जरा सी,
    मैखाने में होश उड़ गया शीशे की परी का;

    रूस्वा है 'नजीर' अपने ही बुतखाने की हद में,
    दीवाना अगर है तो बनारस की गली का।
    ~ Nazeer Banarsi