• साफ़ ज़ाहिर है निगाहों से कि हम मरते हैं,
    मुँह से कहते हुए ये बात मगर डरते हैं;

    एक तस्वीर-ए-मोहब्बत है जवानी गोया,
    जिस में रंगो की एवज़ ख़ून-ए-जिगर भरते हैं;

    इशरत-ए-रफ़्ता ने जा कर न किया याद हमें,
    इशरत-ए-रफ़्ता को हम याद किया करते हैं;

    आसमां से कभी देखी न गई अपनी ख़ुशी,
    अब ये हालात हैं कि हम हँसते हुए डरते हैं;

    शेर कहते हो बहुत ख़ूब तुम "अख्तर" लेकिन,
    अच्छे शायर ये सुना है कि जवां मरते हैं।
    ~ Akhtar Ansari
  • न मंदिर में सनम होते, न मस्जिद में खुदा होता,
    हमीं से यह तमाशा है, न हम होते तो क्या होता;

    न ऐसी मंजिलें होतीं, न ऐसा रास्ता होता,
    संभल कर हम ज़रा चलते तो आलम ज़ेरे-पा होता;

    घटा छाती, बहार आती, तुम्हारा तज़किरा होता,
    फिर उसके बाद गुल खिलते कि ज़ख़्मे-दिल हरा होता;

    बुलाकर तुमने महफ़िल में हमको गैरों से उठवाया,
    हमीं खुद उठ गए होते, इशारा कर दिया होता;

    तेरे अहबाब तुझसे मिल के भी मायूस लौट गए,
    तुझे 'नौशाद' कैसी चुप लगी थी, कुछ कहा होता।
    ~ Naushad Lakhnawi
  • एहसास में शिद्दत है वही, कम नहीं होती,
    एक उम्र हुई, दिल की लगी कम नही होती;

    लगता है कहीं प्यार में थोड़ी-सी कमी थी,
    और प्यार में थोड़ी-सी कमी कम नहीं होती;

    अक्सर ये मेरा ज़ह्न भी थक जाता है लेकिन,
    रफ़्तार ख़यालों की कभी कम नहीं होती;

    था ज़ह्र को होंठों से लगाना ही मुनासिब,
    वरना ये मेरी तश्नालबी कम नहीं होती;

    मैं भी तेरे इक़रार पे फूला न समाता,
    तुझको भी मुझे पाके खुशी कम नहीं होती;

    फ़ितरत में तो दोनों की बहुत फ़र्क़ है लेकिन,
    ताक़त में समंदर से नदी कम नहीं होती।
    ~ Aqeel Nomani
  • बुझा है दिल भरी महफ़िल में रौशनी देकर,
    मरूँगा भी तो हज़ारों को ज़िन्दगी देकर;

    क़दम-क़दम पे रहे अपनी आबरू का ख़याल,
    गई तो हाथ न आएगी जान भी देकर;

    बुज़ुर्गवार ने इसके लिए तो कुछ न कहा,
    गए हैं मुझको दुआ-ए-सलामती देकर;

    हमारी तल्ख़-नवाई को मौत आ न सकी,
    किसी ने देख लिया हमको ज़हर भी देकर;

    न रस्मे दोस्ती उठ जाए सारी दुनिया से,
    उठा न बज़्म से इल्ज़ामे दुश्मनी देकर;

    तिरे सिवा कोई क़ीमत चुका नहीं सकता,
    लिया है ग़म तिरा दो नयन की ख़ुशी देकर।
    ~ Nazeer Banarsi
  • हर एक शाम का मंज़र धुआँ उगलने लगा,
    वो देखो दूर कहीं आसमाँ पिघलने लगा;

    तो क्या हुआ जो मयस्सर कोई लिबास नहीं,
    पहन के धूप मैं अपने बदन पे चलने लगा;

    मैं पिछली रात तो बेचैन हो गया इतना,
    कि उस के बाद ये दिल ख़ुद-ब-ख़ुद बहलने लगा;

    अजीब ख़्वाब थे शीशे की किर्चियों की तरह,
    जब उन को देखा तो आँखों से ख़ूँ निकलने लगा;

    बना के दाएरा यादें सिमट के बैठ गईं.
    ब-वक़्त-ए-शाम जो दिल का अलाव जलने लगा।
    ~ Ameer Imam
  • कब वो ज़ाहिर होगा और हैरान कर देगा मुझे,
    जितनी भी मुश्किल में हूँ आसान कर देगा मुझे;

    रू-ब-रू कर के कभी अपने महकते सुर्ख़ होंठ,
    एक दो पल के लिए गुलदान कर देगा मुझे;

    रूह फूँकेगा मोहब्बत की मेरे पैकर में वो,
    फिर वो अपने सामने बे-जान कर देगा मुझे;

    ख़्वाहिशों का ख़ूँ बहाएगा सर-ए-बाज़ार-ए-शौक़,
    और मुकम्मल बे-ए-सर-ओ-सामान कर देगा मुझे;

    मुनहदिम कर देगा आ कर सारी तामीरात-ए-दिल,
    देखते ही देखते वीरान कर देगा मुझे;

    या तो मुझ से वो छुड़ा देगा ग़ज़ल-गोई 'ज़फ़र',
    या किसी दिन साहब-ए-दीवान कर देगा मुझे।
    ~ Zafar Iqbal
  • निगाहों का मर्कज़ बना जा रहा हूँ;
    मोहब्बत के हाथों लुटा जा रहा हूँ;

    मैं क़तरा हूँ लेकिन ब-आग़ोशे-दरिया;
    अज़ल से अबद तक बहा जा रहा हूँ;

    वही हुस्न जिसके हैं ये सब मज़ाहिर;
    उसी हुस्न से हल हुआ जा रहा हूँ;

    न जाने कहाँ से न जाने किधर को;
    बस इक अपनी धुन में उड़ा जा रहा हूँ;

    न सूरत न मआनी न पैदा, न पिन्हाँ
    ये किस हुस्न में गुम हुआ जा रहा हूँ।
    ~ Jigar Moradabadi
  • बिछड़ा है जो एक बार तो मिलते नहीं देखा,
    इस ज़ख़्म को हमने कभी सिलते नहीं देखा;

    इस बार जिसे चाट गई धूप की ख़्वाहिश,
    फिर शाख़ पे उस फूल को खिलते नहीं देखा;

    यक-लख़्त गिरा है तो जड़ें तक निकल आईं,
    जिस पेड़ को आँधी में भी हिलते नहीं देखा;

    काँटों में घिरे फूल को चूम आयेगी तितली,
    तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा;

    किस तरह मेरी रूह हरी कर गया आख़िर,
    वो ज़हर जिसे जिस्म में खिलते नहीं देखा।
    ~ Parveen Shakir
  • हम को जुनूँ क्या सिखलाते हो हम थे परेशाँ तुमसे ज्यादा,
    चाक किये हैं हमने अज़ीज़ों चार गरेबाँ तुमसे ज्यादा;

    चाक-ए-जिगर मुहताज-ए-रफ़ू है आज तो दामन सिर्फ़ लहू है,
    एक मौसम था हम को रहा है शौक़-ए-बहाराँ तुमसे ज्यादा;

    जाओ तुम अपनी बाम की ख़ातिर सारी लवें शमों की कतर लो,
    ज़ख़्मों के महर-ओ-माह सलामत जश्न-ए-चिराग़ाँ तुमसे ज्यादा;

    ज़ंजीर-ओ-दीवार ही देखी तुमने तो "मजरूह" मगर हम,
    कूचा-कूचा देख रहे हैं आलम-ए-ज़िंदाँ तुमसे ज्यादा।
    ~ Majrooh Sultanpuri
  • न आते हमें इसमें तकरार क्या थी,
    मगर वादा करते हुए आर क्या थी;

    तुम्हारे पयामी ने ख़ुद राज़ खोला,
    ख़ता इसमें बन्दे की सरकार क्या थी;

    भरी बज़्म में अपने आशिक़ को ताड़ा,
    तेरी आँख मस्ती में होशियार क्या थी;

    तअम्मुल तो था उनको आने में क़ासिद,
    मगर ये बता तर्ज़े-इन्कार क्या थी;

    खिंचे ख़ुद-ब-ख़ुद जानिबे-तूर मूसा,
    कशिश तेरी ऐ शौक़े-दीदाए क्या थी;

    कहीं ज़िक्र रहता है इक़बाल तेरा,
    फ़ुसूँ था कोई तेरी गुफ़्तार क्या थी।
    ~ Allama Iqbal