• अब मेरा दिल कोई मज़हब न मसीहा माँगे,
    ये तो बस प्यार से जीने का सलीका माँगे;

    ऐसी फ़सलों को उगाने की ज़रूरत क्या है,
    जो पनपने के लिए ख़ून का दरिया माँगें;

    सिर्फ़ ख़ुशियों में ही शामिल है ज़माना सारा,
    कौन है वो जो मेरे दर्द का हिस्सा माँगे;

    ज़ुल्म है, ज़हर है, नफ़रत है, जुनूँ है हर सू,
    ज़िन्दगी मुझसे कोई प्यार का रिश्ता माँगे;

    ये तआलुक है कि सौदा है या क्या है आख़र,
    लोग हर जश्न पे मेहमान से पैसा माँगें;

    कितना लाज़म है मुहब्बत में सलीका ऐ'अज़ीज़',
    ये ग़ज़ल जैसा कोई नर्म-सा लहज़ा माँगे।
  • और कुछ तेज़ चलीं अब के हवाएँ शायद,
    घर बनाने की मिलीं हम को सज़ाएँ शायद;

    भर गए ज़ख़्म मसीहाई के मरहम के बग़ैर,
    माँ ने की हैं मिरे जीने की दुआएँ शायद;

    मैं ने कल ख़्वाब में ख़ुद अपना लहू देखा है,
    टल गईं सर से मिरे सारी बलाएँ शायद;

    मैं ने कल जिन को अंधेरों से दिलाई थी नजात,
    अब वह लोग मिरे दिल को जलाएँ शायद;

    फिर वही सर है वहीं संग-ए-मलामत उस का,
    दर-गुज़र कर दीं मिरी उस ने ख़ताएँ शायद;

    इस भरोसे पे खिला है मिरा दरवाज़ा 'रईस',
    रूठने वाले कभी लौट के आएँ शायद।
    ~ Raees Siddique
  • हम से भी गाहे गाहे मुलाक़ात चाहिए,
    इंसान हैं सभी तो मसावात चाहिए;

    अच्छा चलो ख़ुदा न सही उन को क्या हुआ ,
    आख़िर कोई तो क़ाज़ी-ए-हाजात चाहिए;

    है आक़बत ख़राब तो दुनिया ही ठीक हो,
    कोई तो सूरत-ए-गुज़र-औक़ात चाहिए;

    जाने पलक झपकने में क्या गुल खिलाए वक़्त,
    हर दम नज़र ब-सूरत-ए-हालात चाहिए;

    आएगी हम को रास न यक-रंगी-ए-ख़ला,
    अहल-ए-ज़मीं हैं हम हमें दिन रात चाहिए;

    वा कर दिए हैं इल्म ने दरिया-ए-मारिफ़त,
    अँधों को अब भी कश्फ़ ओ करामात चाहिए;

    जब क़ैस की कहानी अब अंजुम की दास्ताँ,
    दुनिया को दिल लगी के लिए बात चाहिए।
    ~ Anjum Rumani
  • ऐ दिल वो आशिक़ी के फ़साने किधर गए,
    वो उम्र क्या हुई वो ज़माने किधर गए;

    वीराँ हैं सहन-ओ-बाग़ बहारों को क्या हुआ,
    वो बुलबुलें कहाँ वो तराने किधर गए;

    है नज्द में सुकूत हवाओं को क्या हुआ,
    लैलाएँ हैं ख़मोश दिवाने किधर गए;

    उजड़े पड़े हैं दश्त ग़ज़ालों पे क्या बनी,
    सूने हैं कोहसार दिवाने किधर गए;
    v वो हिज्र में विसाल की उम्मीद क्या हुई,
    वो रंज में ख़ुशी के बहाने किधर गए;

    दिन रात मैकदे में गुज़रती थी ज़िन्दगी,
    'अख़्तर' वो बेख़ुदी के ज़माने किधर गए।
    ~ Akhtar Sheerani
  • आँखों ने हाल कह दिया होंठ न फिर हिला सके,
    दिल में हज़ार ज़ख्म थे जो न उन्हें दिखा सके;

    घर में जो एक चिराग था तुम ने उसे बुझा दिया,
    कोई कभी चिराग हम घर में न फिर जला सके;

    शिकवा नहीं है अर्ज़ है मुमकिन अगर हो आप से,
    दीजे मुझ को ग़म जरूर दिल जो मिरा उठा सके;

    वक़्त क़रीब आ गया हाल अजीब हो गया,
    ऐसे में तेरा नाम हम फिर भी न लब पे ला सके;

    उस ने भुला के आप को नजरों से भी गिरा दिया,
    'नासिर'-ए-ख़स्ता-हाल फिर क्यों न उसे भुला सके।
    ~ Hakim Nasir
  • आँखों में धूप दिल में हरारत लहू की थी,
    आतिश जवान था तो क़यामत लहू की थी;

    ज़ख़्मी हुआ बदन तो वतन याद आ गया,
    अपनी गिरह में एक रिवायत लहू की थी;

    ख़ंजर चला के मुझ पे बहुत ग़म-ज़दा हुआ,
    भाई के हर सुलूक में शिद्दत लहू की थी;

    कोह-ए-गिराँ के सामने शीशे की क्या बिसात,
    अहद-ए-जुनूँ में सारी शरारत लहू की थी;

    रूख़्सार ओ चश्म ओ लब गुल ओ सहबा शफ़क़ हिना,
    दुनिया-ए-रंग-ओ-बू में तिजारत लहू की थी;

    'ख़ालिद' हर एक ग़म में बराबर का शरीक था,
    सारे जहाँ के बीच रफ़ाकत लहू की थी।
    ~ Khalid Mahmood
  • अपना घर छोड़ के हम लोग वहाँ तक पहुँचे,
    सुब्ह-ए-फ़र्दा की किरन भी न जहाँ तक पहुँचे;

    मैं ने आँखों में छुपा रक्खे हैं कुछ और चराग़,
    रौशनी सुब्ह की शायद न यहाँ तक पहुँचे;

    बे-कहे बात समझ लो तो मुनासिब होगा,
    इस से पहले के यही बात ज़बाँ तक पहुँचे;

    तुम ने हम जैसे मुसाफ़िर भी न देखे होंगे,
    जो बहारों से चले और ख़िज़ाँ तक पहुँचे;

    आज पिंदार-ए-तमन्ना का फ़ुसूँ टूट गया;
    चंद कम-ज़र्फ़ गिले नोक-ए-ज़बाँ तक पहुँचे।
    ~ Iqbal Azeem
  • साफ़ ज़ाहिर है निगाहों से कि हम मरते हैं,
    मुँह से कहते हुए ये बात मगर डरते हैं;

    एक तस्वीर-ए-मोहब्बत है जवानी गोया,
    जिस में रंगो की एवज़ ख़ून-ए-जिगर भरते हैं;

    इशरत-ए-रफ़्ता ने जा कर न किया याद हमें,
    इशरत-ए-रफ़्ता को हम याद किया करते हैं;

    आसमां से कभी देखी न गई अपनी ख़ुशी,
    अब ये हालात हैं कि हम हँसते हुए डरते हैं;

    शेर कहते हो बहुत ख़ूब तुम "अख्तर" लेकिन,
    अच्छे शायर ये सुना है कि जवां मरते हैं।
    ~ Akhtar Ansari
  • न मंदिर में सनम होते, न मस्जिद में खुदा होता,
    हमीं से यह तमाशा है, न हम होते तो क्या होता;

    न ऐसी मंजिलें होतीं, न ऐसा रास्ता होता,
    संभल कर हम ज़रा चलते तो आलम ज़ेरे-पा होता;

    घटा छाती, बहार आती, तुम्हारा तज़किरा होता,
    फिर उसके बाद गुल खिलते कि ज़ख़्मे-दिल हरा होता;

    बुलाकर तुमने महफ़िल में हमको गैरों से उठवाया,
    हमीं खुद उठ गए होते, इशारा कर दिया होता;

    तेरे अहबाब तुझसे मिल के भी मायूस लौट गए,
    तुझे 'नौशाद' कैसी चुप लगी थी, कुछ कहा होता।
    ~ Naushad Lakhnawi
  • एहसास में शिद्दत है वही, कम नहीं होती,
    एक उम्र हुई, दिल की लगी कम नही होती;

    लगता है कहीं प्यार में थोड़ी-सी कमी थी,
    और प्यार में थोड़ी-सी कमी कम नहीं होती;

    अक्सर ये मेरा ज़ह्न भी थक जाता है लेकिन,
    रफ़्तार ख़यालों की कभी कम नहीं होती;

    था ज़ह्र को होंठों से लगाना ही मुनासिब,
    वरना ये मेरी तश्नालबी कम नहीं होती;

    मैं भी तेरे इक़रार पे फूला न समाता,
    तुझको भी मुझे पाके खुशी कम नहीं होती;

    फ़ितरत में तो दोनों की बहुत फ़र्क़ है लेकिन,
    ताक़त में समंदर से नदी कम नहीं होती।
    ~ Aqeel Nomani