• ज़वाले- शब् में किसी की सदा निकल आये,
    सितारा डूबे सितारा-नुमा निकल आये;

    अजब नहीं कि ये दरिया नज़र का धोका हो,
    अजब नहीं कि कोई रास्ता निकल आये;

    ये किसने दश्ते-बुरीदा की फसल बोई थी,
    तमाम शहर में नख़्ल-दुआ निकल आये;

    बड़ी घुटन है, चराग़ों का क्या ख़याल करूँ,
    अब इस तरफ कोई मौजे-हवा निकल आये;

    खुदा करे सफे-सरदारगाँ न हो ख़ाली,
    जो मैं गिरूँ तो कोई दूसरा निकल आये।
    ~ Irfan Siddiqi
  • कह रही है हश्र में वो आँख शर्माई हुई,
    हाय कैसे इस भरी महफ़िल में रुसवाई हुई;

    आईने में हर अदा को देख कर कहते हैं वो,
    आज देखा चाहिये किस किस की है आई हुई;

    कह तो ऐ गुलचीं असीरान-ए-क़फ़स के वास्ते,
    तोड़ लूँ दो चार कलियाँ मैं भी मुर्झाई हुई;

    मैं तो राज़-ए-दिल छुपाऊँ पर छिपा रहने भी दे,
    जान की दुश्मन ये ज़ालिम आँख ललचाई हुई;

    ग़म्ज़ा-ओ-नाज़-ओ-अदा सब में हया का है लगाव,
    हाए रे बचपन की शोख़ी भी है शर्माई हुई;

    गर्द उड़ी आशिक़ की तुर्बत से तो झुँझला के कहा,
    वाह सर चढ़ने लगी पाँओं की ठुकराई हुई।
    ~ Ameer Minai
  • कभी बहुत है कभी ध्यान तेरा कुछ कम है,
    कभी हवा है कभी आँधियों का मौसम है;

    अभी न तोड़ा गया मुझ से कै़द-ए-हस्ती को,
    अभी शराब-ए-जुनूँ का नशा भी मद्धम है;

    कि जैसे साथ तेरे ज़िंदगी गुज़रती हो,
    तेरा ख़याल मेरे साथ ऐसे पैहम है;

    तमाम फ़िक्र-ए-ज़मान-ओ-मकाँ से छूट गई,
    सियाह-कारी-ए-दिल मुझे को ऐसा मरहम है;

    मैं ख़ुद मुसाफ़िर-ए-दिल हूँ उसे न रोकुँगी,
    वो ख़ुद ठहर न सकेगा जो कै़दी-ए-ग़म है;

    वौ शौक़-ए-तेज़-रवी है कि देखता है जहाँ,
    ज़मीं पे आग लगी आसमान बरहम है।
    ~ Tanvir Anjum
  • वफ़ा के शीश महल में सजा लिया मैनें;
    वो एक दिल जिसे पत्थर बना लिया मैनें;

    ये सोच कर कि न हो ताक में ख़ुशी कोई;
    ग़मों कि ओट में ख़ुद को छुपा लिया मैनें;

    कभी न ख़त्म किया मैं ने रोशनी का मुहाज़;
    अगर चिराग़ बुझा, दिल जला लिया मैनें;

    कमाल ये है कि जो दुश्मन पे चलाना था;
    वो तीर अपने कलेजे पे खा लिया मैनें;

    "क़तील" जिसकी अदावत में एक प्यार भी था;
    उस आदमी को गले से लगा लिया मैनें।
    ~ Qateel Shifai
  • बरसों ग़म-ए-गेसू में गिरफ़्तार तो रखा,
    अब कहते हो कि तुम ने मुझे मार तो रखा;

    कुछ बे-अदबी और शब-ए-वस्ल नहीं की,
    हाँ यार के रूख़्सार पे रूख़्सार तो रखा;

    इतना भी ग़नीमत है तेरी तरफ़ से ज़ालिम,
    खिड़की न रखी रौज़न-ए-दीवार तो रखा;

    वो ज़ब्ह करे या न करे ग़म नहीं इस का,
    सर हम ने तह-ए-ख़ंजर-ए-ख़ूँ-ख़्वार तो रखा;

    इस इश्क़ की हिम्मत के मैं सदक़े हूँ कि 'बेगम',
    हर वक़्त मुझे मरने पे तैयार तो रखा।
    ~ Begum Lakhnavi
  • दुख देकर सवाल करते हो,
    तुम भी गालिब, कमाल करते हो;

    देख कर पुछ लिया हाल मेरा,
    चलो इतना तो ख्याल करते हो;

    शहर-ए-दिल मेँ उदासियाँ कैसी,
    ये भी मुझसे सवाल करते हो;

    मरना चाहे तो मर नही सकते,
    तुम भी जीना मुहाल करते हो;

    अब किस-किस की मिसाल दूँ तुमको,
    तुम हर सितम बेमिसाल करते हो।
    ~ Mirza Ghalib
  • फिर हुनर-मंदों के घर से बे-बुनर जाता हूँ मैं.
    तुम ख़बर बे-ज़ार हो अहल-ए-नज़र जाता हूँ मैं;

    जेब में रख ली हैं क्यों तुम ने ज़ुबानें काट कर,
    किस से अब ये अजनबी पूछे किधर जाता हूँ मैं;

    हाँ मैं साया हूँ किसी शय का मगर ये भी तो देख,
    गर तआक़ुब में न हो सूरज तो मर जाता हूँ मैं;

    हाथ आँखों से उठा कर देख मुझ से कुछ न पूछ,
    क्यों उफ़ुक पर फैलती सुब्हों से डर जाता हूँ मैं;

    'अर्श' रस्मों की पनह-गाहें भी अब सर पर नहीं,
    और वहशी रास्तों पर बे-सिपर जाता हूँ मैं।
    ~ Arsh Siddique
  • बात बनती नहीं ऐसे हालात में,
    मैं भी जज़्बात में, तुम भी जज़्बात में;

    कैसे सहता है मिलके बिछडने का ग़म,
    उससे पूछेंगे अब के मुलाक़ात में;

    मुफ़लिसी और वादा किसी यार का,
    खोटा सिक्का मिले जैसे ख़ैरात में;

    जब भी होती है बारिश कही ख़ून की,
    भीगता हूं सदा मैं ही बरसात में;

    मुझको किस्मत ने इसके सिवा क्या दिया,
    कुछ लकीरें बढा दी मेरे हाथ में;

    ज़िक्र दुनिया का था, आपको क्या हुआ,
    आप गुम हो गए किन ख़यालात में;

    दिल में उठते हुए वसवसों के सिवा,
    कौन आता है 'साग़र' सियह रात में।
    ~ Hanif Sagar
  • कितने शिकवे गिल हैं पहले ही,
    राह में फ़ासले हैं पहले ही;

    कुछ तलाफ़ी निगार-ए-फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ,
    हम लुटे क़ाफ़िले हैं पहले ही;

    और ले जाए गा कहाँ गुचीं,
    सारे मक़्तल खुले हैं पहले ही;

    अब ज़बाँ काटने की रस्म न डाल,
    कि यहाँ लब सिले हैं पहले ही;

    और किस शै की है तलब 'फ़ारिग़',
    दर्द के सिलसिले हैं पहले ही।
    ~ Farigh Bukhari
  • चोट लगी तो अपने अन्दर चुपके चुपके रो लेते हो,
    अच्छी बात है आसानी से ज़ख्मों को तुम धो लेते हो;

    दिन भर कोशश करते हो सब को ग़म का दरमाँ मिल जाये,
    नींद की गोली खाकर शब भर बेफ़िक्री में सो लेते हो;

    अपनों से मोहतात रहो, सब नाहक़ मुश्रिक समझेंगे,
    ज्यों ही अच्छी मूरत देखी पीछे पीछे हो लेते हो;

    ख़ुश-एख्लाक़ी ठीक है लेकिन सेहत पे ध्यान ज़रूरी है,
    बैठे बैठे सब के दुख में अपनी जान भिगो लेते हो;

    'अंसारी जी' आस न रक्खो कोई तुम्हें पढ़ पायेगा,
    क्या यह कम है पलकों में तुम हर्फ़-ए-अश्क पिरो लेते हो।
    ~ Anees Ansari