• काश हम तुम...

    काश हम तुम अजनबी होते;
    जिस तरह लोग हुआ करते हैं;

    बे ताल्लुक से बे तार्रुफ से;
    काश हम तुम अजनबी होते;

    बेकरारी ना बे काली होती;
    ना मुकम्मल ना ज़िंदगी होती;

    यूँ ना होती अजयातें दिल में;
    ज़िंदगी भी ना होती मुश्किल में;

    आंसुओं से ना दोस्ती करते;
    अपने दिल से ना दुश्मनी करते;

    दूसरों की तरह हम भी रहते;
    काश हम तुम अजनबी होते!
  • है हकीक़त में वही...

    है हकीक़त में वही प्यार को पाने वाले;
    अपने महबूब को पलकों पर बिठाने वाले;

    दिल की वीरानी को ख़ुशियों से सजाने वाले;
    इश्क़ का रोग जो खुद को है लगाने वाले;

    ज़िक्र तेरा भी वफ़ा वालों में होगा ऐ दोस्त;
    याद में बेवफ़ाई का दीप जलाने वाले;

    तेरे क़दमों में ये सारा जहां होगा एक दिन;
    माँ के होठों पे तबस्सुम को सजाने वाले;

    प्यार-ओ-उल्फ़त वफ़ा हमदर्दी मोहब्बत ये सब;
    कौन है दुनिया में अब इन को निभाने वाले।
  • ज़रूरी काम है लेकिन...

    ज़रूरी काम है लेकिन रोज़ाना भूल जाता हूँ;
    मुझे तुम से मोहब्बत है बताना भूल जाता हूँ;

    तेरी गलियों में फिरना इतना अच्छा लगता है;
    मैं रास्ता याद रखता हूँ ठिकाना भूल जाता हूँ;

    बस इतनी बात पर मैं लोगों को अच्छा नहीं लगता;
    मैं नेकी कर तो देता हूँ, जताना भूल जाता हूँ;

    शरारत लेके आँखों में वो तेरा देखना तौबा;
    मैं नज़रों पर जमी नज़रें झुकाना भूल जाता हूँ;

    मोहब्बत कब हुई सब याद है मुझ को;
    मैं कर के मोहब्बत को भुलाना भूल जाता हूँ।
  • एक ग़ज़ल उस पे...

    एक ग़ज़ल उस पे लिखूं दिल का तकाज़ा है बहुत;
    इन दिनों खुद से बिछड़ जाने का धड़ाका है बहुत;

    रात हो दिन हो गफलत हो कि बेदर्दी हो;
    उसको देखा तो नहीं है उसे सोचा है बहुत;

    तश्नगी के भी मुक़ामात हैं क्या क्या यानी;
    कभी दरिया नहीं काफी, कभी क़तरा है बहुत;

    मेरे हाथों की लकीरों के इज़ाफ़े हैं गवाह;
    मैने पत्थर की तरह खुद को तराशा है बहुत।
  • मुझे अपने चंद सवालों...

    मुझे अपने चंद सवालों का जवाब चाहिए;
    तुम्हारे दिल में थोड़ी सी जगह चाहिए;

    तुझ को मेरे सिवा किसी और का ख़याल ना रहे;
    तेरी ज़िंदगी में मुझको वो मुक़ाम चाहिए;

    जो वक़्त भी हम ने तेरे बिना गुज़ारे हैं;
    वापिस मुझे वो अपने शब्-ओ-रोज़ चाहिए;

    तेरी ज़िंदगी में मेरी क्या अहमियत है रज़ा;
    सब कुछ छोड़, इस बात का जवाब चाहिए।
  • वो मुझसे मेरी खामोशी...

    वो मुझसे मेरी खामोशी की वजह पूछता है;
    कितना पागल है रात के सनाटे की वजह पूछता है;

    वो मुझसे मेरे आँसू की वजह पूछता है;
    कितना पागल है बारिश के बरसने की वजह पूछता है;

    वो मुझसे मेरी मोहब्बत के बारे में पूछता है;
    कितना पागल है खुद अपने बारे में पूछता है;

    वो मुझसे मेरी वफ़ा की इंतेहा पूछता है;
    कितना पागल है साहिल पे रह कर, समुद्र की गहराई पूछता है।
  • ​मुझसे मिलने को​...​

    मुझसे मिलने को करता था वो बहाने कितने;
    अब मेरे बिना गुजरेगा वो जमाने कितने;

    मैं गिरा था तो रुके थे बहुत लोग;​
    सोचता हूँ उनमें से आए थे उठाने कितने;
    ​​​​
    ​अब और न दे दर्द मेरे दिल को ज़ालिम;​
    भरे नहीं अभी तक जख्म पुराने कितने।
  • बहार के मौसम में...

    बहार के मौसम में उजड़े रास्ते;
    चला करोगे तो रो पड़ोगे;

    कि चाँदनी रातों में अब किसी से;
    मिला करोगे तो रो पड़ोगे;

    बरसती बारिश में याद रखना;
    तुम्हें सताएंगी मेरी आँखें;

    किसी वली की मज़ार पर जब;
    दुआ करोगे तो रो पड़ोगे।
  • मेरी आँखों में...

    मेरी आँखों में आँसू आए ना होते;
    अगर वो हमें देखकर मुस्कुराए ना होते;

    सोचता हूँ अक्सर तन्हाई में मैं;
    मेरी ज़िंदगी में काश वो आए ना होते;

    ना तड़पते हम उनके लिए इतना;
    दिल ने ख़्वाब अगर उनके सजाए ना होते;

    ना टूट कर बिखरता मैं इस कदर;
    अगर वो मेरे दिल में अपना घर बसाए ना होते।
  • वही गर्दिशें वही...

    वही गर्दिशें वही पेच-ओ-ख़म तेरे बाद भी;
    वही हौसले मेरे दम बा दम तेरे बाद भी;
    तेरे साथ थी तेरी जफ़ा मुझे मो'अतबार ;
    तेरे सारे ग़म मुझे मोहतरम तेरे बाद भी;
    मेरे साथ ही मेरी हर ख़ुशी तेरी मुन्तज़िर;
    तेरी मुन्तज़िर मेरी चश्म-ए-नम तेरे बाद भी;
    तू किसी के क़लब-ओ-आरज़ू में ढल गया;
    मैं ना हो सका कभी खुद में जम्म तेरे बाद भी;
    मेरे बाद कितने ही रूप तूने बदल लिए;
    मैं वहीँ हूँ अब तेरी कसम तेरे बाद भी।