• सर झुकाओगे तो...

    सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा;
    इतना मत चाहो उसे वो बे-वफ़ा हो जाएगा;

    हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है;
    जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा;

    मैं ख़ुदा का नाम लेकर पी रहा हूँ दोस्तों;
    ज़हर भी इसमें अगर होगा दवा हो जाएगा;

    रूठ जाना तो मोहब्बत की अलामत है मगर;
    क्या खबर थी मुझ से वो इतना खफा हो जाएगा;

    सर झुकाओगे तो देवता पत्थर हो जाएगा;
    इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जाएगा।
  • ​सबसे छुपा कर...

    सबसे छुपा कर दर्द जो वो मुस्कुरा दिया;
    उस की हंसी ने तो आज मुझे रुला दिया;​​

    लहज़े से उठ रहा था हर एक दर्द का धुआँ;
    चेहरा बता रहा है कि कुछ गँवा दिया;
    ​​
    ​ आवाज़ में ठहरा​व था आँखों में नमी थी;
    और कह रहा था कि मैंने सब कुछ भुला दिया;
    ​​
    ​ जाने क्या उस को लोगों से थी शिकायतें;
    तन्हाईयो के देश में खुद को बसा दिया;
    ​​
    ​ खुद भी वो हम से बिछड़ कर अधूरा सा हो गया;
    मुझ को भी इतने लोगों में तन्हा बना दिया।​
  • ज़रा-ज़रा सी रंजिशे...

    ज़रा-ज़रा सी रंजिशे;
    कभी दिल जला कभी जान भी;
    मैं अपनों के काबिल ना रहा;
    ये जानते है अन्जान भी;

    मेरे साथ अक्सर रहते है;
    कातिल मेरे मेहमान भी;
    धरती पर जुल्म देख कर;
    रूठा है आसमान भी;

    वो बदल गया खुदा सा जो;
    फ़रिस्ता था बना शैतान् भी;
    बस ज़रा-ज़रा सी रंजिशे;
    ना भुला सका इंसान भी।
  • काश हम तुम...

    काश हम तुम अजनबी होते;
    जिस तरह लोग हुआ करते हैं;

    बे ताल्लुक से बे तार्रुफ से;
    काश हम तुम अजनबी होते;

    बेकरारी ना बे काली होती;
    ना मुकम्मल ना ज़िंदगी होती;

    यूँ ना होती अजयातें दिल में;
    ज़िंदगी भी ना होती मुश्किल में;

    आंसुओं से ना दोस्ती करते;
    अपने दिल से ना दुश्मनी करते;

    दूसरों की तरह हम भी रहते;
    काश हम तुम अजनबी होते!
  • है हकीक़त में वही...

    है हकीक़त में वही प्यार को पाने वाले;
    अपने महबूब को पलकों पर बिठाने वाले;

    दिल की वीरानी को ख़ुशियों से सजाने वाले;
    इश्क़ का रोग जो खुद को है लगाने वाले;

    ज़िक्र तेरा भी वफ़ा वालों में होगा ऐ दोस्त;
    याद में बेवफ़ाई का दीप जलाने वाले;

    तेरे क़दमों में ये सारा जहां होगा एक दिन;
    माँ के होठों पे तबस्सुम को सजाने वाले;

    प्यार-ओ-उल्फ़त वफ़ा हमदर्दी मोहब्बत ये सब;
    कौन है दुनिया में अब इन को निभाने वाले।
  • ज़रूरी काम है लेकिन...

    ज़रूरी काम है लेकिन रोज़ाना भूल जाता हूँ;
    मुझे तुम से मोहब्बत है बताना भूल जाता हूँ;

    तेरी गलियों में फिरना इतना अच्छा लगता है;
    मैं रास्ता याद रखता हूँ ठिकाना भूल जाता हूँ;

    बस इतनी बात पर मैं लोगों को अच्छा नहीं लगता;
    मैं नेकी कर तो देता हूँ, जताना भूल जाता हूँ;

    शरारत लेके आँखों में वो तेरा देखना तौबा;
    मैं नज़रों पर जमी नज़रें झुकाना भूल जाता हूँ;

    मोहब्बत कब हुई सब याद है मुझ को;
    मैं कर के मोहब्बत को भुलाना भूल जाता हूँ।
  • एक ग़ज़ल उस पे...

    एक ग़ज़ल उस पे लिखूं दिल का तकाज़ा है बहुत;
    इन दिनों खुद से बिछड़ जाने का धड़ाका है बहुत;

    रात हो दिन हो गफलत हो कि बेदर्दी हो;
    उसको देखा तो नहीं है उसे सोचा है बहुत;

    तश्नगी के भी मुक़ामात हैं क्या क्या यानी;
    कभी दरिया नहीं काफी, कभी क़तरा है बहुत;

    मेरे हाथों की लकीरों के इज़ाफ़े हैं गवाह;
    मैने पत्थर की तरह खुद को तराशा है बहुत।
  • मुझे अपने चंद सवालों...

    मुझे अपने चंद सवालों का जवाब चाहिए;
    तुम्हारे दिल में थोड़ी सी जगह चाहिए;

    तुझ को मेरे सिवा किसी और का ख़याल ना रहे;
    तेरी ज़िंदगी में मुझको वो मुक़ाम चाहिए;

    जो वक़्त भी हम ने तेरे बिना गुज़ारे हैं;
    वापिस मुझे वो अपने शब्-ओ-रोज़ चाहिए;

    तेरी ज़िंदगी में मेरी क्या अहमियत है रज़ा;
    सब कुछ छोड़, इस बात का जवाब चाहिए।
  • वो मुझसे मेरी खामोशी...

    वो मुझसे मेरी खामोशी की वजह पूछता है;
    कितना पागल है रात के सनाटे की वजह पूछता है;

    वो मुझसे मेरे आँसू की वजह पूछता है;
    कितना पागल है बारिश के बरसने की वजह पूछता है;

    वो मुझसे मेरी मोहब्बत के बारे में पूछता है;
    कितना पागल है खुद अपने बारे में पूछता है;

    वो मुझसे मेरी वफ़ा की इंतेहा पूछता है;
    कितना पागल है साहिल पे रह कर, समुद्र की गहराई पूछता है।
  • ​मुझसे मिलने को​...​

    मुझसे मिलने को करता था वो बहाने कितने;
    अब मेरे बिना गुजरेगा वो जमाने कितने;

    मैं गिरा था तो रुके थे बहुत लोग;​
    सोचता हूँ उनमें से आए थे उठाने कितने;
    ​​​​
    ​अब और न दे दर्द मेरे दिल को ज़ालिम;​
    भरे नहीं अभी तक जख्म पुराने कितने।