• ​मैं उसके चेहरे को...

    मैं उसके चेहरे को दिल से उतार देती हूँ;
    मैं कभी कभी तो खुद को भी मार देती हूँ;
    ​​
    ​ ये मेरा हक़ है कि मैं उसको थोडा दुःख भी दूं;
    मैं चाहत भी तो उसे बेशुमार देती हूँ;
    ​​
    ​ खफा वो रह नहीं सकता लम्हा भर भी;
    ​मैं बहुत पहले ही उसको पुकार लेती हूँ;
    ​​
    ​ मुझे सिवा उसके कोई भी काम नहीं सूझता;
    वो जो भी करता है, मैं सब हिसाब लेती हूँ;​​
    ​​
    ​ वो सभी नाज़ उठाता है मैं जो भी कहती हूँ;
    वो जो भी कहता है मैं चुपके से मान लेती हूँ।
  • ​​​हवा बन कर​​...

    ​​ हवा बन कर बिखरने से​;​
    उसे क्या फ़र्क़ पड़ता है​;​​​

    ​ मेरे जीने या मरने से​;​
    उसे क्या फ़र्क़ पड़ता है​;​

    ​ उसे तो अपनी खुशियों से​;​
    ज़रा भी फुर्सत नहीं मिलती​;​

    ​ मेरे ग़म के उभरने से​;​
    उसे क्या फ़र्क़ पड़ता है​;​

    ​ उस शख्स की यादों में​;​
    मैं चाहे रोते रहूँ लेकिन​;​

    ​ ​मेरे ऐसा करने से​;​
    उसे क्या फ़र्क़ पड़ता है​। ​
  • कठिन है राह-गुज़र​...​​ ​​

    ​​ ​​कठिन है राह-गुज़र थोड़ी देर साथ चलो​;​
    बहुत कड़ा है सफ़र थोड़ी देर साथ चलो​;​​​

    ​ तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है;​
    ये जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो​;​

    ​ नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नहीं;​
    बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो।
  • ​ज़िन्दगी से यही​...​
    ​​​
    ​​​ ज़िन्दगी से यही ग़िला है मुझे​;​
    तू बहुत देर से मिला है मुझे​;​​​​
    ​​​
    ​​ हमसफ़र चाहिए हुजूम नहीं​;​​
    मुसाफ़िर ही काफ़िला है मुझे​;​​
    ​​​
    ​​ दिल धड़कता नहीं सुलगता है​;​​​
    ​ वो जो ख़्वाहिश थी आबला है मुझे​;​​​
    ​​​
    ​ लबकुशा हूँ तो इस यक़ीन के साथ​;​​​
    ​ क़त्ल होने का हौसला है मुझे​;​​​
    ​​​
    ​ कौन जाने कि चाहतों में 'फ़राज़'​;​​​
    ​ क्या गँवाया है क्या मिला है मुझे।
    ~ Ahmad Faraz
  • जब भी मिलता

    जब भी मिलता हूँ तुझसे;
    मेरी ज़िन्दगी उदास हो जाती है;
    मेरी हर धड़कन ख़ामोश हो जाती है;
    तेरी सुरमई आँखों की कसम;
    मेरी मोहब्बत सरे-बाज़ार बदनाम हो जाती है;
    तेरी धुंधली यादें सरे-आम मुझको डसती हैं;
    जब भी चेहरे से तू नक़ाब उठाती है;
    तेरे दर्द का सिलसिला तब तक चलता रहता है;
    जब तक तू न नज़रें मेरे चेहरे से हटाती है;
    जब भी मिलता हूँ तुझसे;
    मेरी ज़िन्दगी उदास हो जाती है।
  • फ़ासले ऐसे भी होंगे...

    फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा न था;
    सामने बैठा था मेरे और वो मेरा न था;

    वो कि ख़ुशबू की तरह फैला था मेरे चार सू;
    मैं उसे महसूस कर सकता था छू सकता न था;

    रात भर पिछली ही आहट कान में आती रही;
    झाँक कर देखा गली में कोई भी आया न था;

    ख़ुद चढ़ा रखे थे तन पर अजनबीयत के गिलाफ़;
    वर्ना कब एक दूसरे को हमने पहचाना न था;

    याद कर के और भी तकलीफ़ होती थी'अदीम';
    भूल जाने के सिवा अब कोई भी चारा न था।
    ~ Adeem Hashmi
  • अब किसी से बात करना बोलना...

    अब किसी से बात करना बोलना अच्छा नहीं लगता;
    तुझे देखा है जब से दूसरा अच्छा नहीं लगता;

    तेरी आँखों में जब से मैंने अपना अक्स देखा है;
    मेरे चेहरे को कोई आइना अच्छा नहीं लगता;

    यहाँ अहले मोहब्बत उम्र भर बर्बाद रहते हैं;
    ये दरिया है इसे कच्चा घड़ा अच्छा नहीं लगता;

    तेरे बारे में दिन भर सोचती ​रहते है लेकिन;
    तेरे बारे में सबसे पूछना अच्छा लगता है;

    मैं अब चाहत ​की उस मंज़िल ​पे आ ​पहुंचा हूँ;
    ​जहाँ तेरी तरफ किसी का देखना अच्छा नहीं लगता।
  • ​वो मेहँदी वाले हाथ​...

    ​​वो मेहँदी वाले हाथ मुझे दिखा के रोये;
    अब मैं हूँ किसी और की हूँ मुझे ये बता के रोये;

    ​पहले कहते थे कि नहीं जी सकते तेरे बिन;
    आज फिर वही बात वो दोहरा के रोये;

    ​कैसे कर लूं उनकी मोहब्बत पे शक यारों;
    वो भरी महफ़िल में मुझे गले लगा के ​रोये।
  • ​आँखों के इंतज़ार ​को...
    ​​
    ​​​​आँखों के इंतज़ार ​को दे कर हुनर चला गया​;​
    ​चाहा था एक शख़्स को जाने किधर चला गया​;​
    ​​
    ​​दिन की वो महफिलें गईं, रातों के रतजगे गए​;​
    ​कोई समेट कर मेरे शाम-ओ-सहर चला गया​;​
    ​​
    ​​झोंका है एक बहार का रंग-ए-ख़याल यार भी​;​
    ​हर-सू बिखर-बिखर गई ख़ुशबू जिधर चला गया​;​
    ​​
    ​​उसके ही दम से दिल में आज धूप भी चाँदनी भी है​;​
    ​देके वो अपनी याद के शम्स-ओ-क़मर चला गया;

    ​कूचा-ब-कूचा दर-ब-दर कब से भटक रहा है दिल​;
    ​हमको भुला के राह वो अपनी डगर चला गया।
    ~ Hasan Kamaal
  • ​अपनी मर्ज़ी से कहाँ​...

    ​​​अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम है​;​
    ​रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम है​;​
    ​​
    ​​पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है​;​
    ​अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम है​;​
    ​​
    ​​वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से​;​
    ​किसको मालूम कहाँ के हैं, किधर के हम हैं​;​
    ​​
    ​​चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब​;​
    ​सोचते रहते हैं किस राहग़ुज़र के हम है​।
    ~ Nida Fazli