• अगर इश्क करो तो आदाब-ए-वफ़ा भी सीखो;<br/>
ये चंद दिन की बेकरारी मोहब्बत नहीं होती!
    अगर इश्क करो तो आदाब-ए-वफ़ा भी सीखो;
    ये चंद दिन की बेकरारी मोहब्बत नहीं होती!
  • आज गुमनाम हूँ तो ज़रा फासला रख मुझसे;<br/>
कल फिर मशहूर हो जाऊँ तो कोई रिश्ता निकाल लेना!
    आज गुमनाम हूँ तो ज़रा फासला रख मुझसे;
    कल फिर मशहूर हो जाऊँ तो कोई रिश्ता निकाल लेना!
  • आप पहलू में जो बैठें तो सँभल कर बैठें;<br/>
दिल-ए-बेताब को आदत है मचल जाने की!<br/><br/>



दिल-ए-बेताब  =  बेचैन दिल
    आप पहलू में जो बैठें तो सँभल कर बैठें;
    दिल-ए-बेताब को आदत है मचल जाने की!

    दिल-ए-बेताब = बेचैन दिल
    ~ Jaleel Manikpuri
  • पसंद आ गए हैं कुछ लोगों को हम;<br/>
कुछ लोगों को ये बात पसंद नहीं आयी।
    पसंद आ गए हैं कुछ लोगों को हम;
    कुछ लोगों को ये बात पसंद नहीं आयी।
  • दिल की बिसात क्या थी निगाह-ए-जमाल में;<br/>
इक आइना था टूट गया देख-भाल में!
    दिल की बिसात क्या थी निगाह-ए-जमाल में;
    इक आइना था टूट गया देख-भाल में!
    ~ Seemab Akbarabadi
  • मज़हब, दौलत, ज़ात, घराना, सरहद, ग़ैरत, खुद्दारी;<br/>
एक मोहब्बत की चादर को, कितने चूहे कुतर गए।
    मज़हब, दौलत, ज़ात, घराना, सरहद, ग़ैरत, खुद्दारी;
    एक मोहब्बत की चादर को, कितने चूहे कुतर गए।
  • नजर अदांज करने की कुछ तो वजह बताई होती;<br/>
अब मैं कहाँ-कहाँ खुद में बुराई खोज सकता हूँ।
    नजर अदांज करने की कुछ तो वजह बताई होती;
    अब मैं कहाँ-कहाँ खुद में बुराई खोज सकता हूँ।
  • मुकम्मल ना सही अधूरा ही रहने दो;<br/>
ये इश्क़ है कोई मक़सद तो नहीं।
    मुकम्मल ना सही अधूरा ही रहने दो;
    ये इश्क़ है कोई मक़सद तो नहीं।
  • इल्म-ओ-अदब के सारे खज़ाने गुज़र गए,<br/>
क्या खूब थे वो लोग पुराने गुज़र गए;<br/>
बाकी है जमीं पे फ़कत आदमी की भीड़,<br/>
इंसान को मरे हुए तो ज़माने गुज़र गए।
    इल्म-ओ-अदब के सारे खज़ाने गुज़र गए,
    क्या खूब थे वो लोग पुराने गुज़र गए;
    बाकी है जमीं पे फ़कत आदमी की भीड़,
    इंसान को मरे हुए तो ज़माने गुज़र गए।
  • न माँझी, न रहबर, न हक में हवायें;<br/>
है कश्ती भी जर्जर, ये कैसा सफर है;<br/>
अलग ही मजा है, फ़कीरी का अपना;<br/>
न पाने की चिन्ता न खोने का डर है।
    न माँझी, न रहबर, न हक में हवायें;
    है कश्ती भी जर्जर, ये कैसा सफर है;
    अलग ही मजा है, फ़कीरी का अपना;
    न पाने की चिन्ता न खोने का डर है।