• वो लफ्ज कहां से लाऊं जो तेरे दिल को मोम कर दें;
    मेरा वजूद पिघल रहा है तेरी बेरूखी से।
  • कैसे करुं भरोसा गैरों के प्यार पर;<br />
यहाँ अपने ही मजा लेते हैं अपनों की हार पर।
    कैसे करुं भरोसा गैरों के प्यार पर;
    यहाँ अपने ही मजा लेते हैं अपनों की हार पर।
  • कितना इख़्तियार था उसे अपनी चाहत पर;<br />
जब चाहा याद किया जब चाहा भुला दिया;<br />
बहुत अच्छे से जानता है वो मुझे बहलाने के तरीके;<br />
जब चाहा हँसा दिया जब चाहा रुला दिया।
    कितना इख़्तियार था उसे अपनी चाहत पर;
    जब चाहा याद किया जब चाहा भुला दिया;
    बहुत अच्छे से जानता है वो मुझे बहलाने के तरीके;
    जब चाहा हँसा दिया जब चाहा रुला दिया।
  • कितना अजीब है लोगों का अंदाज़-ए-मोहब्बत;
    रोज़ एक नया ज़ख्म देकर कहते हैं अपना ख्याल रखना।
  • ना छेड़ क़िस्सा वो उल्फत का;<br />
बड़ी लम्बी यह कहानी है;<br />
हारे नहीं हम अपनी ज़िन्दगी से;<br />
यह तो किसी अपने की मेहरबानी है।
    ना छेड़ क़िस्सा वो उल्फत का;
    बड़ी लम्बी यह कहानी है;
    हारे नहीं हम अपनी ज़िन्दगी से;
    यह तो किसी अपने की मेहरबानी है।
  • वादे वफ़ा करके क्यों मुकर जाते हैं लोग;<br />
किसी के दिल को क्यों तड़पाते हैं लोग;<br />
अगर दिल लगाकर निभा नहीं सकते;<br />
तो फिर क्यों दिल से इतना लगाते हैं लोग।q
    वादे वफ़ा करके क्यों मुकर जाते हैं लोग;
    किसी के दिल को क्यों तड़पाते हैं लोग;
    अगर दिल लगाकर निभा नहीं सकते;
    तो फिर क्यों दिल से इतना लगाते हैं लोग।q
  • लोग तो बेवजह ही खरीदते हैं आईने;<br />
आँखें बंद करके भी अपनी हकीकत जानी जा सकती है।
    लोग तो बेवजह ही खरीदते हैं आईने;
    आँखें बंद करके भी अपनी हकीकत जानी जा सकती है।
  • कोई मुझ से पूछ बैठा `बदलना` किसे कहते हैं?<br />
सोच में पड़ गया हूँ मिसाल किस की दूँ?<br />
`मौसम` की या `अपनों` की।
    कोई मुझ से पूछ बैठा "बदलना" किसे कहते हैं?
    सोच में पड़ गया हूँ मिसाल किस की दूँ?
    "मौसम" की या "अपनों" की।
  • एक मुद्दत से मेरे हाल से बेगाना है;
    जाने ज़ालिम ने किस बात का बुरा माना है;
    मैं जो ज़िद्दी हूँ तो वो भी कुछ कम नहीं;
    मेरे कहने पर कहाँ उसने चले आना है।
  • हसीनों ने हसीन बन कर गुनाह किया;<br />
औरों को तो क्या हमको भी तबाह किया;<br />
पेश किया जब ग़ज़लों में हमने उनकी बेवफाई को;<br />
औरों ने तो क्या उन्होंने भी वाह - वाह किया।
    हसीनों ने हसीन बन कर गुनाह किया;
    औरों को तो क्या हमको भी तबाह किया;
    पेश किया जब ग़ज़लों में हमने उनकी बेवफाई को;
    औरों ने तो क्या उन्होंने भी वाह - वाह किया।