• गिर कर उठने तक तो हाथ पकड़े रखा उसने मेरा,<br/>
जरा सँभल कर चलना सीखा तो फिर से खो गए भीड़ में!
    गिर कर उठने तक तो हाथ पकड़े रखा उसने मेरा,
    जरा सँभल कर चलना सीखा तो फिर से खो गए भीड़ में!
  • मेरे फन को तराशा है सभी के नेक इरादों ने;<br/>
किसी की बेवफाई ने, किसी के झूठे वादों ने।
    मेरे फन को तराशा है सभी के नेक इरादों ने;
    किसी की बेवफाई ने, किसी के झूठे वादों ने।
  • कहाँ दूर हट के जायें, हम दिल की सरजमीं से,<br/>
दोनों जहान की सैरें, हासिल हैं सब यहीं से!<br/><br/>


सरजमीं  =  पृथ्वी, जमीन, देश, मुल्क
    कहाँ दूर हट के जायें, हम दिल की सरजमीं से,
    दोनों जहान की सैरें, हासिल हैं सब यहीं से!

    सरजमीं = पृथ्वी, जमीन, देश, मुल्क
    ~ Jigar Moradabadi
  • देखकर पलकें मेरी कहने लगा कोई फक़ीर,<br/>
इन पे बरख़ुरदार सपनों का वज़न कुछ कम करो!
    देखकर पलकें मेरी कहने लगा कोई फक़ीर,
    इन पे बरख़ुरदार सपनों का वज़न कुछ कम करो!
  • रेत की दीवार हूँ गिरने से बचा ले मुझको;<br/>
यूँ न कर तेज़ हवाओं के हवाले मुझको;<br/>
आ मेरे पास ज़रा देख मोहब्बत से मुझे;<br/>
मैं बुरा हूँ तो भलाई से निभा ले मुझको!
    रेत की दीवार हूँ गिरने से बचा ले मुझको;
    यूँ न कर तेज़ हवाओं के हवाले मुझको;
    आ मेरे पास ज़रा देख मोहब्बत से मुझे;
    मैं बुरा हूँ तो भलाई से निभा ले मुझको!
  • अर्ज़-ए-अहवाल को गिला समझे;<br/>
क्या कहा मैंने आप क्या समझे|
    अर्ज़-ए-अहवाल को गिला समझे;
    क्या कहा मैंने आप क्या समझे|
    ~ Daagh Dehlvi
  • क्या बेचकर हम खरीदें फुर्सत-ए-जिंदगी;<br/>
सब कुछ तो गिरवी पड़ा है जिम्मेदारी के बाजार में।
    क्या बेचकर हम खरीदें फुर्सत-ए-जिंदगी;
    सब कुछ तो गिरवी पड़ा है जिम्मेदारी के बाजार में।
  • एक सुकून की तालाश में, ना जाने कितनी बेचैनियाँ पाल ली;<br/>
और लोग कहते हैं, हम बड़े हो गये और ज़िन्दगी संभाल ली।
    एक सुकून की तालाश में, ना जाने कितनी बेचैनियाँ पाल ली;
    और लोग कहते हैं, हम बड़े हो गये और ज़िन्दगी संभाल ली।
  • किस नाज़ से कहते हैं वो झुंजला के शब-ए-वस्ल;<br/>
तुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते।<br/><br/>

शब-ए-वस्ल  =   मिलन की रात
    किस नाज़ से कहते हैं वो झुंजला के शब-ए-वस्ल;
    तुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते।

    शब-ए-वस्ल = मिलन की रात
    ~ Akbar Allahabadi
  • किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल;<br/>
कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा!
    किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल;
    कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा!