• क्यों मुझसे तुम दूर-दूर सा रहते हो;<br/>
अपने हुस्न पर मगरूर सा रहते हो;<br/>
प्यार की कसमों के राजदार थे कभी;<br/>
अब बेवफा बनकर हुजूर सा रहते हो!
    क्यों मुझसे तुम दूर-दूर सा रहते हो;
    अपने हुस्न पर मगरूर सा रहते हो;
    प्यार की कसमों के राजदार थे कभी;
    अब बेवफा बनकर हुजूर सा रहते हो!
  • मुद्दतें गुजरी हैं हमको करीब आए हुए;<br/>
रात है बेचैन शमा प्यार की जलाए हुए;<br/>
बिखरी हुई हैं साँसों में तेरी ख्वाहिशें;<br/>
मेरी नज़रों में ख्वाब हैं मुस्कुराए हुए!
    मुद्दतें गुजरी हैं हमको करीब आए हुए;
    रात है बेचैन शमा प्यार की जलाए हुए;
    बिखरी हुई हैं साँसों में तेरी ख्वाहिशें;
    मेरी नज़रों में ख्वाब हैं मुस्कुराए हुए!
  • आए कुछ अब्र कुछ शराब आए;
    उस के बाद आए जो अज़ाब आए!

    अब्र: बादल,
    अज़ाब: दुख़, संकट, विपदा
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • दम भर मेरे पहलू में उन्हें चैन कहाँ है;<br/>
बैठे कि बहाने से किसी काम से उठे!<br/><br/>

पहलू: पसली, (पास)
    दम भर मेरे पहलू में उन्हें चैन कहाँ है;
    बैठे कि बहाने से किसी काम से उठे!

    पहलू: पसली, (पास)
    ~ Bekhud Dehlvi
  • मोहबबत में नहीं है फ़र्क जी ने और मरने का;<BR/>
उसी को देख कर जीते हैं जिस क़ाफ़िर पे दम निकले!
    मोहबबत में नहीं है फ़र्क जी ने और मरने का;
    उसी को देख कर जीते हैं जिस क़ाफ़िर पे दम निकले!
    ~ Mirza Ghalib
  • दम भर मेरे पहलू में उन्हें चैन कहाँ है;<br/>
बैठे, कि बहाने से किसी काम से उठे!
    दम भर मेरे पहलू में उन्हें चैन कहाँ है;
    बैठे, कि बहाने से किसी काम से उठे!
    ~ Bekhud Dehlvi
  • मेहरबानी को मोहब्बत नहीं कहते ऐ दोस्त;<br/>
आह अब मुझ से तेरी रंजिश-ए-बेजा भी नहीं!
    मेहरबानी को मोहब्बत नहीं कहते ऐ दोस्त;
    आह अब मुझ से तेरी रंजिश-ए-बेजा भी नहीं!
    ~ Firaq Gorakhpuri
  • तेरी राह-ए-तलब में ज़ख़्म सब सीने पे खाये है;<br/>
बहार-ए-ग़ुलिस्तां मेरी हयात-ए-जावेदाँ मेरी!
    तेरी राह-ए-तलब में ज़ख़्म सब सीने पे खाये है;
    बहार-ए-ग़ुलिस्तां मेरी हयात-ए-जावेदाँ मेरी!
    ~ Shamsi Meenai
  • भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मु्द्दतों में हम;<br/>
किश्तों में ख़ुदकुशी का मज़ा हम से पूछिये!
    भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मु्द्दतों में हम;
    किश्तों में ख़ुदकुशी का मज़ा हम से पूछिये!
    ~ Khumar Barabankvi
  • बना कर फ़क़ीरों का हम भेस ग़ालिब;<br/>
तमाशा-ए-अहल-ए-करम देख़ते हैं!
    बना कर फ़क़ीरों का हम भेस ग़ालिब;
    तमाशा-ए-अहल-ए-करम देख़ते हैं!
    ~ Mirza Ghalib