• समझा न कोई हमारे दिल की बात को;<br/>
दर्द दुनिया ने बिना सोचे ही दे दिया;<br/>
जो सह गए हर दर्द को हम चुपके से;<br/>
तो हमको ही पत्थर दिल कह दिया।
    समझा न कोई हमारे दिल की बात को;
    दर्द दुनिया ने बिना सोचे ही दे दिया;
    जो सह गए हर दर्द को हम चुपके से;
    तो हमको ही पत्थर दिल कह दिया।
  • दुनिया ने हम पे जब कोई इल्ज़ाम रख दिया;
    हमने मुक़ाबिल उसके तेरा नाम रख दिया;
    इक ख़ास हद पे आ गई जब तेरी बेरुख़ी;
    नाम उसका हमने गर्दिशे-अय्याम रख दिया।

    शब्दार्थ:
    गर्दिशे-अय्याम = समय का चक्कर
    ~ Qateel Shifai
  • दर्द ही सही मेरे इश्क़ का इनाम तो आया;<br/>
खाली ही सही होठों तक जाम तो आया;<br/>
मैं हूँ बेवफा सबको बताया उसने;<br/>
यूँ ही सही चलो उसके लबों पर मेरा नाम तो आया।
    दर्द ही सही मेरे इश्क़ का इनाम तो आया;
    खाली ही सही होठों तक जाम तो आया;
    मैं हूँ बेवफा सबको बताया उसने;
    यूँ ही सही चलो उसके लबों पर मेरा नाम तो आया।
  • ज़िंदगी से चले हैं अब इल्ज़ाम लेकर;<br/>
बहुत जी चुके हैं अब उनका नाम लेकर;<br/>
अकेले बातें करेंगे अब वो इन सितारों से;<br/>
अब चले जायेंगे उन्हें यह सारा आसमान देकर।
    ज़िंदगी से चले हैं अब इल्ज़ाम लेकर;
    बहुत जी चुके हैं अब उनका नाम लेकर;
    अकेले बातें करेंगे अब वो इन सितारों से;
    अब चले जायेंगे उन्हें यह सारा आसमान देकर।
  • जब प्यार नहीं है तो भुला क्यों नहीं देते;
    ख़त किसलिए रखे हैं जला क्यों नहीं देते;
    किस वास्ते लिखा है हथेली पे मेरा नाम;
    मैं हर्फ़ ग़लत हूँ तो मिटा क्यों नहीं देते।
  • मुझे शिकवा नहीं कुछ बेवफ़ाई का तेरी हरगिज़;
    गिला तब हो अगर तूने किसी से भी निभाई हो।
    ~ Khwaja Mir Dard
  • अब कर के फ़रामोश तो नाशाद करोगे;<br/>
पर हम जो न होंगे तो बहुत याद करोगे।
    अब कर के फ़रामोश तो नाशाद करोगे;
    पर हम जो न होंगे तो बहुत याद करोगे।
    ~ Mir Taqi Mir
  • भुला के मुझको अगर तुम भी हो सलामत;<br/>
तो भुला के तुझको संभलना मुझे भी आता है;<br/>
नहीं है मेरी फितरत में ये आदत वरना;<br/>
तेरी तरह बदलना मुझे भी आता है।
    भुला के मुझको अगर तुम भी हो सलामत;
    तो भुला के तुझको संभलना मुझे भी आता है;
    नहीं है मेरी फितरत में ये आदत वरना;
    तेरी तरह बदलना मुझे भी आता है।
  • ना रोया कर सारी-सारी रात किसी बेवफा की याद में;
    को खुश है अपनी दुनिया में तेरी दुनिया उजाड़ कर।
  • मैंने कब चाहा कि...

    मैंने कब चाहा कि मैं उस की तमन्ना हो जाऊँ;
    ये भी क्या कम है अगर उस को गवारा हो जाऊँ;

    मुझ को ऊँचाई से गिरना भी है मंज़ूर, अगर;
    उस की पलकों से जो टूटे, वो सितारा हो जाऊँ;

    लेकर इक अज़्म उठूँ रोज़ नई भीड़ के साथ;
    फिर वही भीड़ छटे और मैं तनहा हो जाऊँ;

    जब तलक महवे-नज़र हूँ, मैं तमाशाई हूँ;
    टुक निगाहें जो हटा लूं तो तमाशा हो जाऊँ;

    मैं वो बेकार सा पल हूँ, न कोइ शब्द, न सुर;
    वह अगर मुझ को रचाले तो हमेशा हो जाऊँ;

    आगही मेरा मरज़ भी है, मुदावा भी है 'साज़';
    जिस से मरता हूँ, उसी ज़हर से अच्छा हो जाऊँ।
    ~ Abdul Ahad Saaz