• ये मंजिले मुझे रास आती नहीं,<br />
ऐ रास्तो मुझे अपना हमसफ़र बना लो।
    ये मंजिले मुझे रास आती नहीं,
    ऐ रास्तो मुझे अपना हमसफ़र बना लो।
  • मुझ को शिकस्त-ए-दिल का मज़ा याद आ गया;
    तुम क्यों उदास हो गए क्या याद आ गया;
    कहने को ज़िन्दगी थी बहुत मुख्तसर मगर;
    कुछ यूँ बसर हुई कि खुदा याद आ गया।
    ~ Khumar Barabankvi
  • तेरे पास आने को जी चाहता है;
    फिर से दर्द सहने को जी चाहता है;
    आज़मा चुके हैं अब ज़माने को हम;
    बस तुझे आज़माने को जी चाहता है।
  • हम भी बिकने गए थे बाज़ार-ऐ-इश्क में;
    क्या पता था वफ़ा करने वालों को लोग ख़रीदा नहीं करते।
  • जिस से चाहा था, बिखरने से बचा ले मुझको;<br />
कर गया तुन्द हवाओं के हवाले मुझ को;<br />
मैं वो बुत हूँ कि तेरी याद मुझे पूजती है;<br />
फिर भी डर है ये कहीं तोड़ न डाले मुझको।
    जिस से चाहा था, बिखरने से बचा ले मुझको;
    कर गया तुन्द हवाओं के हवाले मुझ को;
    मैं वो बुत हूँ कि तेरी याद मुझे पूजती है;
    फिर भी डर है ये कहीं तोड़ न डाले मुझको।
    ~ Zafar Iqbal
  • कोई चला गया दूर तो क्या करें;
    कोई मिटा गया सब निशान तो क्या करें;
    याद आती है अब भी उनकी हमें हद से ज्यादा;
    मगर वो याद ना करें तो क्या करें।
  • सुकून मिल गया मुझको बदनाम होकर;
    आपके हर एक इल्ज़ाम पे यूँ बेजुबान होकर;
    लोग पढ़ ही लेंगें आपकी आँखों में मेरी मोहब्बत;
    चाहे कर दो इनकार यूँ ही अनजान होकर।
  • आईने के सामने खड़े होकर खुद से माफ़ी माँग ली मैंने;<br />
सबसे ज्यादा खुद का दिल दुखाया है औरों को खुश करने में।
    आईने के सामने खड़े होकर खुद से माफ़ी माँग ली मैंने;
    सबसे ज्यादा खुद का दिल दुखाया है औरों को खुश करने में।
  • जहाँ दरिया कहीं अपने किनारे छोड़ देता है;
    कोई उठता है और तूफाँ का रुख मोड़ देता है;
    मुझे बे-दस्त-ओ-पा कर के भी खौफ उसका नहीं जाता;
    कहीं भी हादसा गुज़रे वो मुझसे जोड़ देता है।

    शब्दार्थ:
    बे-दस्त-ओ-पा = असहाय
    ~ Wasim Barelvi
  • कभी उसने भी हमें चाहत का पैगाम लिखा था;
    सब कुछ उसने अपना हमारे नाम लिखा था;
    सुना है आज उनको हमारे जिक्र से भी नफ़रत है;
    जिसने कभी अपने दिल पर हमारा नाम लिखा था।