• कहाँ से लाऊँ हुनर उसे मनाने का;<br/>
कोई जवाब नहीं था उसके रूठ जाने का;<br/>
मोहब्बत में सजा मुझे ही मिलनी थी;<br/>
क्योंकि जुर्म मेरा था उनसे दिल लगाने का।
    कहाँ से लाऊँ हुनर उसे मनाने का;
    कोई जवाब नहीं था उसके रूठ जाने का;
    मोहब्बत में सजा मुझे ही मिलनी थी;
    क्योंकि जुर्म मेरा था उनसे दिल लगाने का।
  • मुझे शिकवा नहीं कुछ बेवफ़ाई का तेरी हरगिज़;
    गिला तब हो अगर तू ने किसी से भी निभाई हो।
    ~ Khwaja Mir Dard
  • उन्हें एहसास हुआ है इश्क़ का हमें रुलाने के बाद;<br/>
अब हम पर प्यार आया है दूर चले जाने के बाद;<br/>
क्या बताएं किस कदर बेवफ़ा है यह दुनिया;<br/>
यहाँ लोग भूल जाते ही  किसी को दफनाने के बाद।
    उन्हें एहसास हुआ है इश्क़ का हमें रुलाने के बाद;
    अब हम पर प्यार आया है दूर चले जाने के बाद;
    क्या बताएं किस कदर बेवफ़ा है यह दुनिया;
    यहाँ लोग भूल जाते ही किसी को दफनाने के बाद।
  • मोहब्बत का मेरा यह सफर आख़िरी है;
    ये कागज, ये कलम, ये गजल आख़िरी है;
    फिर ना मिलेंगे अब तुमसे हम कभी;
    क्योंकि तेरे दर्द का अब ये सितम आख़िरी है।
  • ना जाने कौन सी बात पर वो रूठ गयी है;
    मेरी सहने की हदें भी अब टूट गयी हैं;
    कहती थी जो कि कभी नहीं रूठेगी मुझसे;
    आज वो अपनी ही बातें भूल गयी है।
  • मुद्दत से कोई शख्स रुलाने नहीं आया;<br/>
जलती हुई आँखों को बुझाने नहीं आया;<br/>
जो कहता था कि रहेंगे उम्र भर साथ तेरे;<br/>
अब रूठे हैं तो कोई मनाने नहीं आया।
    मुद्दत से कोई शख्स रुलाने नहीं आया;
    जलती हुई आँखों को बुझाने नहीं आया;
    जो कहता था कि रहेंगे उम्र भर साथ तेरे;
    अब रूठे हैं तो कोई मनाने नहीं आया।
  • तुम ने चाहा ही नहीं हालात बदल सकते थे;
    तेरे आाँसू मेरी आँखों से निकल सकते थे;
    तुम तो ठहरे रहे झील के पानी की तरह;
    दरिया बनते तो बहुत दूर निकल सकते थे।
  • दस्तूर-ए-उल्फ़त वो निभाते नहीं हैं;
    जनाब महफ़िल में आते ही नहीं हैं;
    हम सजाते हैं महफ़िल हर शाम;
    एक वो हैं जो कभी तशरीफ़ लाते ही नहीं हैं!
  • आग से सीख लिया हम ने यह करीना भी;<br/>
बुझ भी जाना पर बड़ी देर तक सुलगते रहना;<br/>
जाने किस उम्र में जाएगी यह आदत अपनी;<br/>
रूठना उससे और औरों से उलझते रहना।
    आग से सीख लिया हम ने यह करीना भी;
    बुझ भी जाना पर बड़ी देर तक सुलगते रहना;
    जाने किस उम्र में जाएगी यह आदत अपनी;
    रूठना उससे और औरों से उलझते रहना।
  • तुम्हें ही कहाँ फ़ुरसत थी, मेरे पास आने की;<br/>
मैने तो बहुत इत्तला की, अपने गुज़र जाने की।
    तुम्हें ही कहाँ फ़ुरसत थी, मेरे पास आने की;
    मैने तो बहुत इत्तला की, अपने गुज़र जाने की।