• वक़्त गुज़रेगा तो हम संभाल जाएँगे;
    मौत आने से पहले समझ जाएँगे;
    कि बेवफ़ाई उनकी फ़ितरत है, ना की मजबूरी;
    तन्हाई में ही सही, हम फिर से बस जाएँगे।
  • दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है;
    लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है।
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • खुशबु की तरह साथ लगा ले गयी हम को;
    कूचे से तेरे बाद-ए-सबा ले गयी हम को;
    पत्थर थे कि गौहर थे अब इस बात का क्या ज़िक्र;
    इक मौज बहर-हाल बहा ले गयी हम को।

    शब्दार्थ:
    बाद-ए-सबा = सुबह की ठंडी हवा
    गौहर = मोती
    ~ Irfan Siddiqi
  • वो नाराज़ हैं हमसे कि हम कुछ लिखते नहीं;<br/>
कहाँ से लायें लफ्ज़ जब हम को मिलते ही नहीं;<br/>
दर्द की जुबान होती तो बता देते शायद;<br/>
वो ज़ख्म कैसे दिखायें जो दिखते ही नहीं।
    वो नाराज़ हैं हमसे कि हम कुछ लिखते नहीं;
    कहाँ से लायें लफ्ज़ जब हम को मिलते ही नहीं;
    दर्द की जुबान होती तो बता देते शायद;
    वो ज़ख्म कैसे दिखायें जो दिखते ही नहीं।
  • आइना भी भला कब किसी को सच बता पाया है;<br/>
जब भी देखो दायाँ तो बायां ही नज़र आया है।
    आइना भी भला कब किसी को सच बता पाया है;
    जब भी देखो दायाँ तो बायां ही नज़र आया है।
  • अब हवा जिधर जाये मैं भी उधर जाऊंगा;<br/>
मैं खुश्बू हूँ हवाओं में बिखर जाऊंगा;<br/>
अफ़सोस तुम्हें होगा मुझे सताओगे अगर;<br/>
मेरा क्या जितना भी जलाओगे उतना ही निखर जाऊंगा।
    अब हवा जिधर जाये मैं भी उधर जाऊंगा;
    मैं खुश्बू हूँ हवाओं में बिखर जाऊंगा;
    अफ़सोस तुम्हें होगा मुझे सताओगे अगर;
    मेरा क्या जितना भी जलाओगे उतना ही निखर जाऊंगा।
  • अपनी हर बात रखने का दावा किया उसने;<br/>
लगा जैसे हकीकत में जीने का बहाना किया उसने;<br/>
टूट गया कोई अल्फ़ाज़ों से उनके उनको पता तक नहीं;<br/>
ज़िंदगी सिर्फ नाम नहीं मोहब्बत का यह भी सिखाया उसने।
    अपनी हर बात रखने का दावा किया उसने;
    लगा जैसे हकीकत में जीने का बहाना किया उसने;
    टूट गया कोई अल्फ़ाज़ों से उनके उनको पता तक नहीं;
    ज़िंदगी सिर्फ नाम नहीं मोहब्बत का यह भी सिखाया उसने।
  • तुम न आए तो क्या सहर न हुई;
    हाँ मगर चैन से बसर न हुई;
    मेरा नाला सुना ज़माने ने;
    एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई।

    शब्दार्थ:
    सहर = सुबह
    बसर = गुजरना
    नाला = रोना-धोना, शिकवा
    ~ Mirza Ghalib
  • कैसे बयान करे अब आलम दिल की बेबसी का;
    वो क्या समझे दर्द इन आंखों की नमी का;
    चाहने वाले उनके इतने हो गए हैं कि;
    अब एहसास ही नहीं उन्हें हमारी कमी का।
  • इश्क़ में जिसके ये अहवाल बना रखा है;
    अब वही कहता है इस वजह में क्या रखा है;
    ले चले हो मुझे इस बज्म में यारो लेकिन;
    कुछ मेरा हाल भी पहले से सुना रखा है।
    ~ Saleem Ahmed