• दर्द आँखों में झलक जाता है पर होंठों तक नहीं आता;<br/>
ये मज़बूरी है मेरे इश्क़ की जो मिलता है खो जाता है;<br/>
उसे भूलने का जज़्बा तो हर रोज़ दिल में आता है;<br/>
पर कैसे भुला दे दिल, हर जर्रे में उसको पाता है।
    दर्द आँखों में झलक जाता है पर होंठों तक नहीं आता;
    ये मज़बूरी है मेरे इश्क़ की जो मिलता है खो जाता है;
    उसे भूलने का जज़्बा तो हर रोज़ दिल में आता है;
    पर कैसे भुला दे दिल, हर जर्रे में उसको पाता है।
  • फुर्सत किसे है ज़ख्मों को सरहाने की;
    निगाहें बदल जाती हैं अपनों-बेगानों की;
    तुम भी छोड़कर चले गए हो हमें ओ सनम;
    अब तो तमन्ना ही नहीं रही किसी और से दिल लगाने की।
  • किसी कली ने भी देखा न आँख भर के मुझे;
    गुज़र गयी जरस-ए-गुल उदास करके मुझे;
    मैं सो रहा था किसी याद के शबिस्ताँ में;
    जगा के छोड़ गए काफिले सहर के मुझे।

    शब्दार्थ:
    जरस-ए-गुल = फूलों की लड़ी
    शबिस्ताँ = बिस्तर
    ~ Nasir Kazmi
  • न मेरी कोई मंज़िल है न किनारा;<br/>
तन्हाई मेरी महफ़िल और यादें मेरा सहारा;<br/>
तुम से बिछड़ कि कुछ यूँ वक़्त गुज़ारा;<br/>
कभी ज़िंदगी को तरसे तो कभी मौत को पुकारा।
    न मेरी कोई मंज़िल है न किनारा;
    तन्हाई मेरी महफ़िल और यादें मेरा सहारा;
    तुम से बिछड़ कि कुछ यूँ वक़्त गुज़ारा;
    कभी ज़िंदगी को तरसे तो कभी मौत को पुकारा।
  • ज़रा देखो ये दरवाज़े पर दस्तक किसने दी है;<br/>
अगर इश्क़ हो तो कहना यहाँ दिल नही रहता।
    ज़रा देखो ये दरवाज़े पर दस्तक किसने दी है;
    अगर इश्क़ हो तो कहना यहाँ दिल नही रहता।
  • प्यार किसी से जितना किया रुस्वाई ही मिली है;
    वफ़ा चाहे जितनी भी की बेवफाई ही मिली है;
    जितना भी किसी को अपना बना कर देखा;
    जब आँख खुली तो तन्हाई ही मिली है।
  • उसकी याद में हम बरसों रोते रहे;
    बेवफ़ा वो निकले बदनाम हम होते रहे;
    प्यार में मदहोशी का आलम तो देखिये;
    धूल चेहरे पे थी और हम आईना साफ़ करते रहे।
  • किस फ़िक्र किस ख्याल में खोया हुआ सा है;
    दिल आज तेरी याद को भूला हुआ सा है;
    गुलशन में इस तरह कब आई थी फसल-ए-गुल;
    हर फूल अपनी शाख से टूटा हुआ सा है।

    शब्दार्थ:
    फसल-ए-गुल = बहार का मौसम
    ~ Shahryar
  • हर वक़्त तेरी यादें तडपाती हैं मुझे;
    आखिर इतना क्यों ये सताती है मुझे;
    इश्क तो किया था तूने भी बड़े शौंक से;
    अब क्यों नहीं यह एहसास दिलाती है तुझे।
  • काश उसे चाहने का अरमान ना होता;<br/>
मैं होश में रहते हुए अनजान ना होता;<br/>
ना प्यार होता किसी पत्थर दिल से हमको;<br/>
या फिर कोई पत्थर दिल इंसान ना होता।
    काश उसे चाहने का अरमान ना होता;
    मैं होश में रहते हुए अनजान ना होता;
    ना प्यार होता किसी पत्थर दिल से हमको;
    या फिर कोई पत्थर दिल इंसान ना होता।