• मत पूछना ख़फ़ा होने का सबब मुझसे;
    कैसे-कैसे खेले हैं किस्मत ने खेल मुझसे;
    अब कैसे छिपाऊं अश्क इन आँखों में;
    क्या बताऊँ अब क्या छूट गया है मुझसे।
  • ज़ख़्म देने का अंदाज़ कुछ ऐसा है;<br/>
ज़ख़्म देकर पूछते हैं कि हाल कैसा है;<br/>
किसी एक से गिला अब क्या करें हम;<br/>
यहाँ तो सारी दुनिया का मिज़ाज़ एक जैसा है।
    ज़ख़्म देने का अंदाज़ कुछ ऐसा है;
    ज़ख़्म देकर पूछते हैं कि हाल कैसा है;
    किसी एक से गिला अब क्या करें हम;
    यहाँ तो सारी दुनिया का मिज़ाज़ एक जैसा है।
  • राह-ए-वफ़ा में हम को ख़ुशी की तलाश थी;
    दो गाम ही चले थे कि हर गाम रो पड़े।
    ~ Sudarshan Faakir
  • मैं अपनी वफाओं का भरम ले के चली हूँ;<br/>
हाथों में मोहब्बत का आलम लेकर चली हूँ;<br/>
चलने ही नहीं देती यह वादे की ज़ंज़ीर;<br/>
मुश्किल था मगर इश्क़ के सारे सितम लेकर चली हूँ।
    मैं अपनी वफाओं का भरम ले के चली हूँ;
    हाथों में मोहब्बत का आलम लेकर चली हूँ;
    चलने ही नहीं देती यह वादे की ज़ंज़ीर;
    मुश्किल था मगर इश्क़ के सारे सितम लेकर चली हूँ।
  • अब तो ये भी नहीं रहा एहसास दर्द होता है या नहीं होता;<br/>
इश्क़ जब तक न कर चुके रुस्वा आदमी काम का नहीं होता।
    अब तो ये भी नहीं रहा एहसास दर्द होता है या नहीं होता;
    इश्क़ जब तक न कर चुके रुस्वा आदमी काम का नहीं होता।
    ~ Jigar Moradabadi
  • दर्द कितने हैं यह बता नहीं सकता;<br/>
ज़ख़्म हैं कितने यह भी दिखा नहीं सकता;<br/>
आँखों से समझ सको तो समझ लो;<br/>
आँसू गिरे हैं कितने यह गिना नहीं सकता।
    दर्द कितने हैं यह बता नहीं सकता;
    ज़ख़्म हैं कितने यह भी दिखा नहीं सकता;
    आँखों से समझ सको तो समझ लो;
    आँसू गिरे हैं कितने यह गिना नहीं सकता।
  • मेरे सुर्ख़ लहू से चमकी कितने हाथों में मेहंदी;
    शहर में जिस दिन क़त्ल हुआ मैं ईद मनाई लोगों ने।
    ~ Bahadur Shah Zafar
  • तड़पते हैं न रोते हैं न हम फ़रियाद करते हैं;
    सनम की याद में हर-दम ख़ुदा को याद करते हैं;
    उन्हीं के इश्क़ में हम नाला-ओ-फ़रियाद करते हैं;
    इलाही देखिये किस दिन हमें वो याद करते हैं।
    ~ Atish
  • शोला था जल बुझा हूँ, हवाएं मुझे न दो;<br/>
मैं तो कब का जा चुका हूँ, सदायें मुझे न दो;<br/>
वो ज़हर भी पी चुका हूँ, जो तुमने मुझे दिया था;<br/>
आ गया हम मौत के आग़ोश में अब मुझे ज़िंदगी की दुआएं न दो।
    शोला था जल बुझा हूँ, हवाएं मुझे न दो;
    मैं तो कब का जा चुका हूँ, सदायें मुझे न दो;
    वो ज़हर भी पी चुका हूँ, जो तुमने मुझे दिया था;
    आ गया हम मौत के आग़ोश में अब मुझे ज़िंदगी की दुआएं न दो।
  • तुम आज हँसते हो हंस लो मुझ पर ये आज़माइश ना बार-बार होगी;
    मैं जानता हूं मुझे ख़बर है कि कल फ़ज़ा ख़ुशगवार होगी;
    रहे मुहब्बत में ज़िन्दगी भर रहेगी ये कशमकश बराबर;
    ना तुमको क़ुरबत में जीत होगी ना मुझको फुर्कत में हार होगी।
    ~ Khwaja Mir Dard