• अब हवा जिधर जाये मैं भी उधर जाऊंगा;<br/>
मैं खुश्बू हूँ हवाओं में बिखर जाऊंगा;<br/>
अफ़सोस तुम्हें होगा मुझे सताओगे अगर;<br/>
मेरा क्या जितना भी जलाओगे उतना ही निखर जाऊंगा।
    अब हवा जिधर जाये मैं भी उधर जाऊंगा;
    मैं खुश्बू हूँ हवाओं में बिखर जाऊंगा;
    अफ़सोस तुम्हें होगा मुझे सताओगे अगर;
    मेरा क्या जितना भी जलाओगे उतना ही निखर जाऊंगा।
  • अपनी हर बात रखने का दावा किया उसने;<br/>
लगा जैसे हकीकत में जीने का बहाना किया उसने;<br/>
टूट गया कोई अल्फ़ाज़ों से उनके उनको पता तक नहीं;<br/>
ज़िंदगी सिर्फ नाम नहीं मोहब्बत का यह भी सिखाया उसने।
    अपनी हर बात रखने का दावा किया उसने;
    लगा जैसे हकीकत में जीने का बहाना किया उसने;
    टूट गया कोई अल्फ़ाज़ों से उनके उनको पता तक नहीं;
    ज़िंदगी सिर्फ नाम नहीं मोहब्बत का यह भी सिखाया उसने।
  • तुम न आए तो क्या सहर न हुई;
    हाँ मगर चैन से बसर न हुई;
    मेरा नाला सुना ज़माने ने;
    एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई।

    शब्दार्थ:
    सहर = सुबह
    बसर = गुजरना
    नाला = रोना-धोना, शिकवा
    ~ Mirza Ghalib
  • कैसे बयान करे अब आलम दिल की बेबसी का;
    वो क्या समझे दर्द इन आंखों की नमी का;
    चाहने वाले उनके इतने हो गए हैं कि;
    अब एहसास ही नहीं उन्हें हमारी कमी का।
  • इश्क़ में जिसके ये अहवाल बना रखा है;
    अब वही कहता है इस वजह में क्या रखा है;
    ले चले हो मुझे इस बज्म में यारो लेकिन;
    कुछ मेरा हाल भी पहले से सुना रखा है।
    ~ Saleem Ahmed
  • मोहब्बत और मौत की पसंद तो देखो;<br/>
एक को दिल चाहिए और दूसरे को धड़कन।
    मोहब्बत और मौत की पसंद तो देखो;
    एक को दिल चाहिए और दूसरे को धड़कन।
  • मुझ से ऐ आईने मेरी बेकरारियाँ मत पूछ;<br/>
टूट जाएगा तू भी मेरी खामोशियाँ सुन के।
    मुझ से ऐ आईने मेरी बेकरारियाँ मत पूछ;
    टूट जाएगा तू भी मेरी खामोशियाँ सुन के।
  • दिलों की बंद खिड़की खोलना अब जुर्म जैसा है;
    भरी महफिल में सच बोलना अब जुर्म जैसा है;
    हर ज्यादती को सहन कर लो चुपचाप;
    शहर में इस तरह से चीखना जुर्म जैसा है।
  • तुम्हारे चाँद से चेहरे पे ग़म अच्छे नहीं लगते;
    हमें कह दो चले जाओ जो हम अच्छे नहीं लगते;
    हमें वो ज़ख्म दो जाना जो सारी उम्र ना भर पायें;
    जो जल्दी भर के मिट जाएं वो ज़ख्म अच्छे नहीं लगते।
    ~ Syed Wasi Shah
  • जब तक अपने दिल में उनका गम रहा;
    हसरतों का रात दिन मातम रहा;
    हिज्र में दिल का ना था साथी कोई;
    दर्द उठ-उठ कर शरीक-ए-गम रहा।
    ~ Ahsan Marahravi