• जो आँसू दिल में गिरते हैं वो आँखों में नहीं रहते;
    बहुत से हर्फ़ ऐसे होते हैं जो लफ़्ज़ों में नहीं रहते;
    किताबों में लिखे जाते हैं दुनिया भर के अफ़साने;
    मगर जिन में हकीकत हो किताबों में नहीं रहते।
  • रास्ते खुद ही तबाही के निकाले हम ने;<br/>
कर दिया दिल किसी पत्थर के हवाले हमने;<br/>
हाँ मालूम है क्या चीज़ हैं मोहब्बत यारो;<br/>
अपना ही घर जला कर देखें हैं उजाले हमने।Upload to Facebook
    रास्ते खुद ही तबाही के निकाले हम ने;
    कर दिया दिल किसी पत्थर के हवाले हमने;
    हाँ मालूम है क्या चीज़ हैं मोहब्बत यारो;
    अपना ही घर जला कर देखें हैं उजाले हमने।
  • जाये है जी नजात के ग़म में;
    ऐसी जन्नत गयी जहन्नुम में;
    आप में हम नहीं तो क्या है अज़ब;
    दूर उससे रहा है क्या हम में;
    बेखुदी पर न 'मीर' की जाओ;
    तुमने देखा है और आलम में।
    ~ Mir Taqi Mir
  • वक़्त के मोड़ पे ये कैसा वक़्त आया है;<br/>
ज़ख़्म दिल का ज़ुबाँ पर आया है;<br/>
न रोते थे कभी काँटों की चुभन से;<br/>
आज न जाने क्यों फूलों की खुशबू से रोना आया है।Upload to Facebook
    वक़्त के मोड़ पे ये कैसा वक़्त आया है;
    ज़ख़्म दिल का ज़ुबाँ पर आया है;
    न रोते थे कभी काँटों की चुभन से;
    आज न जाने क्यों फूलों की खुशबू से रोना आया है।
  • दिल मेरा जो अगर रोया न होता;<br/>
हमने भी आँखों को भिगोया न होता;<br/>
दो पल की हँसी में छुपा लेता ग़मों को;<br/>
ख़्वाब की हक़ीक़त को जो संजोया नहीं होता।Upload to Facebook
    दिल मेरा जो अगर रोया न होता;
    हमने भी आँखों को भिगोया न होता;
    दो पल की हँसी में छुपा लेता ग़मों को;
    ख़्वाब की हक़ीक़त को जो संजोया नहीं होता।
  • मैंने पत्थरों को भी रोते देखा है झरने के रूप में;<br/>
मैंने पेड़ों को प्यासा देखा है सावन की धूप में;<br/>
घुल-मिल कर बहुत रहते हैं लोग जो शातिर हैं बहुत;<br/>
मैंने अपनों को तनहा देखा है बेगानों के रूप में।Upload to Facebook
    मैंने पत्थरों को भी रोते देखा है झरने के रूप में;
    मैंने पेड़ों को प्यासा देखा है सावन की धूप में;
    घुल-मिल कर बहुत रहते हैं लोग जो शातिर हैं बहुत;
    मैंने अपनों को तनहा देखा है बेगानों के रूप में।
  • कहीं किसी रोज़ यूँ भी होता, हमारी हालात तुम्हारी होती;<br/>
जो रात गुज़ारी मर कर वो रात तुमने गुज़ारी होती।Upload to Facebook
    कहीं किसी रोज़ यूँ भी होता, हमारी हालात तुम्हारी होती;
    जो रात गुज़ारी मर कर वो रात तुमने गुज़ारी होती।
  • इतनी पीता हूँ कि मदहोश रहता हूँ;
    सब कुछ समझता हूँ पर खामोश रहता हूँ;
    जो लोग करते हैं मुझे गिराने की कोशिश;
    मैं अक्सर उन्ही के साथ रहता हूँ।
  • डूबी हैं मेरी उंगलियां खुद अपने लहू में;
    यह काँच के टुकड़ों को उठाने की सजा है।
    ~ Parveen Shakir
  • वो रात दर्द और सितम की रात होगी;
    जिस रात रुखसत उनकी बारात होगी;
    उठ जाता हूँ मैं ये सोचकर नींद से अक्सर;
    कि एक गैर की बाहों में मेरी सारी कायनात होगी।