• ये सानेहा भी मोहब्बत में बार-हा गुज़रा;<br/>
कि उस ने हाल भी पूछा तो आँख भर आई।<br/><br/>

शब्दार्थ:<br/>
सानेहा = घटना
    ये सानेहा भी मोहब्बत में बार-हा गुज़रा;
    कि उस ने हाल भी पूछा तो आँख भर आई।

    शब्दार्थ:
    सानेहा = घटना
    ~ Nasir Kazmi
  • हमें कोई ग़म नहीं था ग़म-ए-आशिक़ी से पहले;
    न थी दुश्मनी किसी से तेरी दोस्ती से पहले;
    है ये मेरी बदनसीबी तेरा क्या कुसूर इसमें;
    तेरे ग़म ने मार डाला मुझे ज़िन्दग़ी से पहले।
  • तुझ को पा कर भी न कम हो सकी बे-ताबी-ए-दिल;
    इतना आसान तेरे इश्क़ का ग़म था ही नहीं।
    ~ Firaq Gorakhpuri
  • जिसको भी चाहा उसे शिद्दत से चाहा है 'फ़राज़';
    सिलसिला टूटा नहीं है दर्द की ज़ंजीर का।
    ~ Ahmad Faraz
  • हर ज़ख़्म किसी ठोकर की मेहरबानी है;<br/>
मेरी ज़िंदगी की बस यही एक कहानी है;<br/>
मिटा देते सनम के हर दर्द को सीने से;<br/>
पर ये दर्द ही तो उसकी आखिरी निशानी है।
    हर ज़ख़्म किसी ठोकर की मेहरबानी है;
    मेरी ज़िंदगी की बस यही एक कहानी है;
    मिटा देते सनम के हर दर्द को सीने से;
    पर ये दर्द ही तो उसकी आखिरी निशानी है।
  • ज़रूरी नहीं कि जीने का कोई सहारा हो;
    ज़रूरी नहीं कि जिसके हम हों वो भी हमारा हो;
    कुछ कश्तियाँ डूब जाया करती हैं;
    ज़रूरी नहीं कि हर कश्ती के नसीब में किनारा हो।
  • इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना;<br/>
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना।
    इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना;
    दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना।
    ~ Mirza Ghalib
  • रौशनी करता हूँ अँधेरा मिटाने के लिए;<br/>
शराब पीता हूँ मैं तुझको भुलाने के लिए;<br/>
क्यों न बन सकी तुम मेरी ज़िंदगी;<br/>
आज भी रोता हूँ सोच कर गुज़रे ज़माने के लिए।
    रौशनी करता हूँ अँधेरा मिटाने के लिए;
    शराब पीता हूँ मैं तुझको भुलाने के लिए;
    क्यों न बन सकी तुम मेरी ज़िंदगी;
    आज भी रोता हूँ सोच कर गुज़रे ज़माने के लिए।
  • ख़मोशी से मुसीबत और भी संगीन होती है;
    तड़प ऐ दिल तड़पने से ज़रा तस्कीन होती है।
    ~ Shad Azeembadi
  • फुर्सत किसे है ज़ख्मों को सरहाने की;
    निगाहें बदल जाती हैं अपने बेगानों की;
    तुम भी छोड़कर चले गए हमें;
    अब तम्मना न रही किसी से दिल लगाने की।