• 'मजरूह' लिख रहे हैं वो अहल-ए-वफ़ा का नाम;
    हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह।

    शब्दार्थ:
    अहल-ए-वफ़ा = वफ़ा के चाहने वाले लोग
    ~ Majrooh Sultanpuri
  • इधर से आज वो गुज़रे तो मुँह फेरे हुए गुज़रे;
    अब उन से भी हमारी बे-कसी देखी नहीं जाती।
    ~ Asar Lakhnavi
  • मत पूछना ख़फ़ा होने का सबब मुझसे;
    कैसे-कैसे खेले हैं किस्मत ने खेल मुझसे;
    अब कैसे छिपाऊं अश्क इन आँखों में;
    क्या बताऊँ अब क्या छूट गया है मुझसे।
  • ज़ख़्म देने का अंदाज़ कुछ ऐसा है;<br/>
ज़ख़्म देकर पूछते हैं कि हाल कैसा है;<br/>
किसी एक से गिला अब क्या करें हम;<br/>
यहाँ तो सारी दुनिया का मिज़ाज़ एक जैसा है।
    ज़ख़्म देने का अंदाज़ कुछ ऐसा है;
    ज़ख़्म देकर पूछते हैं कि हाल कैसा है;
    किसी एक से गिला अब क्या करें हम;
    यहाँ तो सारी दुनिया का मिज़ाज़ एक जैसा है।
  • राह-ए-वफ़ा में हम को ख़ुशी की तलाश थी;
    दो गाम ही चले थे कि हर गाम रो पड़े।
    ~ Sudarshan Faakir
  • मैं अपनी वफाओं का भरम ले के चली हूँ;<br/>
हाथों में मोहब्बत का आलम लेकर चली हूँ;<br/>
चलने ही नहीं देती यह वादे की ज़ंज़ीर;<br/>
मुश्किल था मगर इश्क़ के सारे सितम लेकर चली हूँ।
    मैं अपनी वफाओं का भरम ले के चली हूँ;
    हाथों में मोहब्बत का आलम लेकर चली हूँ;
    चलने ही नहीं देती यह वादे की ज़ंज़ीर;
    मुश्किल था मगर इश्क़ के सारे सितम लेकर चली हूँ।
  • अब तो ये भी नहीं रहा एहसास दर्द होता है या नहीं होता;<br/>
इश्क़ जब तक न कर चुके रुस्वा आदमी काम का नहीं होता।
    अब तो ये भी नहीं रहा एहसास दर्द होता है या नहीं होता;
    इश्क़ जब तक न कर चुके रुस्वा आदमी काम का नहीं होता।
    ~ Jigar Moradabadi
  • दर्द कितने हैं यह बता नहीं सकता;<br/>
ज़ख़्म हैं कितने यह भी दिखा नहीं सकता;<br/>
आँखों से समझ सको तो समझ लो;<br/>
आँसू गिरे हैं कितने यह गिना नहीं सकता।
    दर्द कितने हैं यह बता नहीं सकता;
    ज़ख़्म हैं कितने यह भी दिखा नहीं सकता;
    आँखों से समझ सको तो समझ लो;
    आँसू गिरे हैं कितने यह गिना नहीं सकता।
  • मेरे सुर्ख़ लहू से चमकी कितने हाथों में मेहंदी;
    शहर में जिस दिन क़त्ल हुआ मैं ईद मनाई लोगों ने।
    ~ Bahadur Shah Zafar
  • तड़पते हैं न रोते हैं न हम फ़रियाद करते हैं;
    सनम की याद में हर-दम ख़ुदा को याद करते हैं;
    उन्हीं के इश्क़ में हम नाला-ओ-फ़रियाद करते हैं;
    इलाही देखिये किस दिन हमें वो याद करते हैं।
    ~ Atish