• पैमाना कहे है कोई मय-ख़ाना कहे है;
    दुनिया तेरी आँखों को भी क्या क्या न कहे है।
    ~ Mir Taqi Mir
  • महकता हुआ जिस्म तेरा गुलाब जैसा है;<br/>
नींद के सफर में तू एक ख्वाब जैसा है;<br/>
दो घूँट पी लेने दे आँखों के इस प्याले से;<br/>
नशा तेरी आँखों का शराब के जाम जैसा है।
    महकता हुआ जिस्म तेरा गुलाब जैसा है;
    नींद के सफर में तू एक ख्वाब जैसा है;
    दो घूँट पी लेने दे आँखों के इस प्याले से;
    नशा तेरी आँखों का शराब के जाम जैसा है।
  • मेरे दिल के कोने से एक आवाज़ आती है;<br/>
कहाँ गयी वो ज़ालिम जो तुझे तड़पाती है;<br/>
जिस्म से रूह तक उतरने की थी ख्वाहिश तेरी;<br/>
और अब एक शराब है जो तेरा साथ निभाती है।
    मेरे दिल के कोने से एक आवाज़ आती है;
    कहाँ गयी वो ज़ालिम जो तुझे तड़पाती है;
    जिस्म से रूह तक उतरने की थी ख्वाहिश तेरी;
    और अब एक शराब है जो तेरा साथ निभाती है।
  • नशा हम किया करते है, इलज़ाम शराब को दिया करते हैं;
    कसूर शराब का नहीं उनका है जिनका चेहरा हम जाम में तलाश किया करते हैं।
  • कुछ नशा तो आपकी बात का है;
    कुछ नशा तो धीमी बरसात का है;
    हमें आप यूँ ही शराबी ना कहिये;
    इस दिल पर असर तो आप से मुलाकात का है।
  • नशा हम करते हैं, इल्ज़ाम शराब को दिया जाता है;<br/>
मगर इल्ज़ाम शराब का नहीं उनका है;<br/>
जिनका चेहरा हमें हर जाम में नज़र आता है।
    नशा हम करते हैं, इल्ज़ाम शराब को दिया जाता है;
    मगर इल्ज़ाम शराब का नहीं उनका है;
    जिनका चेहरा हमें हर जाम में नज़र आता है।
  • मयखाने सजे थे, जाम का था दौर;<br/>
जाम में क्या था, ये किसने किया गौर;<br/>
जाम में गम था मेरे अरमानों का;<br/>
और सब कह रहे थे एक और एक और।
    मयखाने सजे थे, जाम का था दौर;
    जाम में क्या था, ये किसने किया गौर;
    जाम में गम था मेरे अरमानों का;
    और सब कह रहे थे एक और एक और।
  • मैखाने मे आऊंगा मगर पिऊंगा नही साकी;
    ये शराब मेरा गम मिटाने की औकात नही रखती।
  • न गुल खिले हैं न उन से मिले न मय पी है;
    अजीब रंग में अब के बहार गुज़री है।
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • तनहइयो के आलम की ना बात करो जनाब;<br/>
नहीं तो फिर बन उठेगा जाम और बदनाम होगी शराब।
    तनहइयो के आलम की ना बात करो जनाब;
    नहीं तो फिर बन उठेगा जाम और बदनाम होगी शराब।