• नशा पिलाके गिराना तो सबको आता है;
    मज़ा तो जब है कि गिरतों को थाम ले साकी;
    जो बादाकश थे पुराने वो उठते जाते हैं;
    कहीं से आबे-बक़ा-ए-दवाम ले साकी;
    कटी है रात तो हंगामा-गुस्तरी में तेरी;
    सहर क़रीब है अल्लाह का नाम ले साकी।
    ~ Allama Iqbal
  • बड़ी भूल हुई अनजाने में, ग़म छोड़ आये महखाने में;<br/>
फिर खा कर ठोकर ज़माने की, फिर लौट आये मयखाने में;<br/>
मुझे देख कर मेरे ग़म बोले, बड़ी देर लगा दी आने में।
    बड़ी भूल हुई अनजाने में, ग़म छोड़ आये महखाने में;
    फिर खा कर ठोकर ज़माने की, फिर लौट आये मयखाने में;
    मुझे देख कर मेरे ग़म बोले, बड़ी देर लगा दी आने में।
  • मौसम भी है, उम्र भी, शराब भी है;
    पहलू में वो रश्के-माहताब भी है;
    दुनिया में अब और चाहिए क्या मुझको;
    साक़ी भी है, साज़ भी है, शराब भी है।
    ~ Akhtar Sheerani
  • कुछ सही तो कुछ खराब कहते हैं;<br/>
लोग हमें बिगड़ा हुआ नवाब कहते हैं;<br/>
हम तो बदनाम हुए कुछ इस कदर;<br/>
कि पानी भी पियें तो लोग शराब कहते हैं।
    कुछ सही तो कुछ खराब कहते हैं;
    लोग हमें बिगड़ा हुआ नवाब कहते हैं;
    हम तो बदनाम हुए कुछ इस कदर;
    कि पानी भी पियें तो लोग शराब कहते हैं।
  • मैखाने मे आऊंगा मगर पिऊंगा नहीं, ऐ साकी;
    ये शराब मेरा गम मिटाने की औकात नही रखती!
  • बैठे हैं दिल में ये अरमां जगाये;
    कि वो आज नजरों से अपनी पिलायें;
    मजा तो तब है पीने का यारो;
    इधर हम पियें और नशा उनको आये।
  • पी के रात को हम उनको भुलाने लगे;
    शराब मे ग़म को मिलाने लगे;
    ये शराब भी बेवफा निकली यारो;
    नशे मे तो वो और भी याद आने लगे।
  • मैं तोड़ लेता अगर तू गुलाब होती;<br/>
मैं जवाब बनता अगर तू सवाल होती;<br/>
सब जानते हैं मैं नशा नही करता;<br/>
मगर मैं भी पी लेता अगर तू शराब होती।
    मैं तोड़ लेता अगर तू गुलाब होती;
    मैं जवाब बनता अगर तू सवाल होती;
    सब जानते हैं मैं नशा नही करता;
    मगर मैं भी पी लेता अगर तू शराब होती।
  • ग़म इस कद्र बढे कि घबरा कर पी गया;
    इस दिल की बेबसी पर तरस खा कर पी गया;
    ठुकरा रहा था मुझे बड़ी देर से ज़माना;
    मैं आज सब जहां को ठुकरा कर पी गया!
    ~ Sahir Ludhianvi
  • नफरतों का असर देखो जानवरों का बटंवारा हो गया;
    गाय हिन्दू हो गयी और बकरा मुसलमान हो गया;
    मंदिरो मे हिंदू देखे, मस्जिदो में मुसलमान;
    शाम को जब मयखाने गया तब जाकर दिखे इन्सान!