• पतझड़ भी हिस्सा है जिंदगी के मौसम का,
    फर्क सिर्फ इतना है कुदरत में पत्ते सूखते हैं और हकीकत में रिश्ते।
  • मुझे हुक्म हुआ है कुछ और माँग उसके सिवा;
    मैं महफ़िल से उठ गया, कि मुझे ज़ुस्तुजू नहीं किसी और की।
  • अल्फ़ाज़ चुराने की ज़रूरत ही ना पड़ी कभी;
    तेरे बे-हिसाब ख्यालों ने बे-तहाशा लफ्ज़ दिए।
  • किस ख़त में लिख कर भेजूं अपने इंतज़ार को तुम्हें;
    बेजुबां हैं इश्क़ मेरा और ढूंढता है ख़ामोशी से तुझे।
  • रात में कौन वहां जाये जहाँ आग लगी,
    सुबह अख़बार में पढ़ लेंगे कहाँ आग लगी;

    आग से आग बुझाने का अमल जारी था,
    हम भी पानी लिए बैठे थे जहाँ आग लगी;

    वो भी अब आग बुझाने को चले आएं हैं,
    जिनको ये भी नहीं मालूम कहाँ आग लगी;

    किसको फुरसत थी जो देता किसी आवाज़ पे ध्यान,
    चीखता फिरता था आवारा धुंआ आग लगी;

    सुबह तक सारे निशानात मिटा डालेंगे,
    कोई पूछेगा तो कह देंगे कहाँ आग लगी।
    ~ Rahat Indori
  • इश्क़ में हमने वही किया जो फूल करते हैं बहारों में;
    खामोशी से खिले, महके और फिर बिखर गए।
  • खुशनसीब हैं बिखरे हुए यह ताश के पत्ते;
    बिखरने के बाद उठाने वाला तो कोई है इनको।
  • नींद आये या ना आये, चिराग बुझा दिया करो,
    किसी की याद में किसी और को जलाना अच्छी बात नहीं।
  • रात ख़्वाबों में आए थे तुम, और देखो;
    अभी तक महक रहा है, तुम्हारी ख़ुशबू से वो सिरहाना मेरा।
  • यूँ तो सिखाने को जिंदगी बहुत कुछ सिखाती है;<br/>
मगर झूठी हँसी हँसने का हुनर तो मोहब्बत ही सिखाती है।
    यूँ तो सिखाने को जिंदगी बहुत कुछ सिखाती है;
    मगर झूठी हँसी हँसने का हुनर तो मोहब्बत ही सिखाती है।