• ऐसा नहीं देखा कहीं हाल किसी और का;<br/>
पहलू में कोई और ख्याल और किसी का!
    ऐसा नहीं देखा कहीं हाल किसी और का;
    पहलू में कोई और ख्याल और किसी का!
  • फूल की पती से कट सकता है हीरे का जिगर;<br/>
मर्दे नादाँ पर कलाम-ऐ-नरम-ऐ-नाज़ुक बेअसर!
    फूल की पती से कट सकता है हीरे का जिगर;
    मर्दे नादाँ पर कलाम-ऐ-नरम-ऐ-नाज़ुक बेअसर!
  • कहा से सीखें हुनर उसे मानाने का;<br/>
कोई जवाज़ न था उस के रूठ जाने का;<br/>
हर बात में सजा भी मुझे ही मिलनी थी;<br/>
के जुर्म मैंने किया था उनसे दिल लगाने का!
    कहा से सीखें हुनर उसे मानाने का;
    कोई जवाज़ न था उस के रूठ जाने का;
    हर बात में सजा भी मुझे ही मिलनी थी;
    के जुर्म मैंने किया था उनसे दिल लगाने का!
  • मैं नादान था जो वफ़ा को तलाश करता रहा ग़ालिब;<br/>
यह न सोचा के एक दिन अपनी साँस भी बेवफा हो जाएगी!
    मैं नादान था जो वफ़ा को तलाश करता रहा ग़ालिब;
    यह न सोचा के एक दिन अपनी साँस भी बेवफा हो जाएगी!
    ~ Mirza Ghalib
  • खुशबू की तरह आया वो तेज़ हवाओं में;<br/>
माँगा था जिसे हम ने दिन रात दुआओं में;<br/> 
तुम चाट पे नहीं आये मैं घर से नहीं निकल;<br/>
यह चाँद बहुत भटकता है सावन की घटाओं में!
    खुशबू की तरह आया वो तेज़ हवाओं में;
    माँगा था जिसे हम ने दिन रात दुआओं में;
    तुम चाट पे नहीं आये मैं घर से नहीं निकल;
    यह चाँद बहुत भटकता है सावन की घटाओं में!
  • बहुत मुश्किल से सुलाया था खुद को `फ़राज़` मैंने आज;<br/>
अपनी आँखों को तेरे ख्वाब का लालच दे कर!
    बहुत मुश्किल से सुलाया था खुद को `फ़राज़` मैंने आज;
    अपनी आँखों को तेरे ख्वाब का लालच दे कर!
    ~ Ahmad Faraz
  • तेरा ज़िक्र मेरी हर बात मैं है;<br/>
तुम पास नहीं पर साथ में है;<br/>
मैं तुझसे बिछड़ कर जाऊं कहाँ;<br/>
तेरा इश्क़ तो मेरी जात में है!
    तेरा ज़िक्र मेरी हर बात मैं है;
    तुम पास नहीं पर साथ में है;
    मैं तुझसे बिछड़ कर जाऊं कहाँ;
    तेरा इश्क़ तो मेरी जात में है!
  • देख कैसी क़यामत सी बरपा हुई है आशियानों पर इक़बाल;<br/>
जो लहू से तामीर हुए थे, पानी से बह गए!
    देख कैसी क़यामत सी बरपा हुई है आशियानों पर इक़बाल;
    जो लहू से तामीर हुए थे, पानी से बह गए!
    ~ Allama Iqbal
  • मुहब्बत का खुमार उतरा तो तब साबित हुआ;<br/>
वो जो मंज़िल का रास्ता था, बे-मकसद सफर निकला!
    मुहब्बत का खुमार उतरा तो तब साबित हुआ;
    वो जो मंज़िल का रास्ता था, बे-मकसद सफर निकला!
  • मेह वो क्यों बहुत पीते बज़्म-ऐ-ग़ैर में या रब;<br/>
आज ही हुआ मंज़ूर उन को इम्तिहान अपना;<br/>
मँज़र इक बुलंदी पर और हम बना सकते `ग़ालिब`;<br/>
अर्श से इधर होता काश के माकन अपना!
    मेह वो क्यों बहुत पीते बज़्म-ऐ-ग़ैर में या रब;
    आज ही हुआ मंज़ूर उन को इम्तिहान अपना;
    मँज़र इक बुलंदी पर और हम बना सकते `ग़ालिब`;
    अर्श से इधर होता काश के माकन अपना!
    ~ Mir Taqi Mir